| 30 अप्रैल 2009
छत्तीसगढ़ अंचल
में अध्यात्म की चेतना फूंकने वाले छत्तीसगढ़ के महान तीर्थ-स्थल विवेकानंद आश्रम के संस्थापक और प्रवर्तक स्वामी आत्मानन्दजी का पूर्व नाम तुलेन्द्र सिंह वर्मा था। पिता प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम वर्मा तथा माता भाग्यवती देवी थी। दोनों ही ईश्वर भक्त और कर्तव्यपरायण दम्पत्ति थे। इसी भक्त दम्पत्ति के यहां राष्ट्र में अध्यात्म की चेतना का मंत्र फूंकने वाले महामानव का जन्म रविवार दिनांक 6 अक्टूबर सन् 1929 के सूर्योदय के समय ग्राम बरबन्दा में हुआ था। नाम रखा गया रामेश्वर। इसी वर्ष उनके पिता को जिले में सर्वोत्तम आदर्श अध्यापक के रूप में पुरस्कृत किया गया।
रामेश्वर की डेढ़ वर्ष की उम्र से रामनाम का संकीर्तन करना प्रारंभ कराया गया। अढ़ाई वर्ष की अवस्था में वर्माजी ने रामेश्वर को हारमोनियम बजाना प्रारम्भ करवाया। बालक रामेश्वर भी आसानी पूर्वक सभी प्रकार की शिक्षा ग्रहण करता गया। थोड़े ही समय में रामेश्वर ने हारमोनियम बजाकर गीत गाना सीख लिया। सन् 1933 में जब रामेश्वर की उम्र 4 वर्ष की थी, तब रायपुर के टाऊनहाल के सम्मेलन में रामेश्वर ने स्वयं हारमोनियम बजाकर गाना सुनाया था, जिसे देखकर सभी सभासद मंत्रमुग्ध हो गये थे। उसी वर्ष रामेश्वर के पिता श्री धनीरामजी को सर्वोत्तम पुरस्कार स्वर्णपदक और 187 तोले की चांदी की भीमायुध गदा प्राप्त हुई थी।
रामेश्वर मेघावी बालक था। उसने स्वेच्छा से 4 वर्ष की उम्र में अपनी माताजी के द्वारा कहलाकर शाला में पढ़ना आरम्भ कर दिया। पाठशाला में उनका नाम जन्म कुंडली के अनुसार तुलेन्द्र सिंह रखा गया। नौ वर्ष की अवस्था में जब तुलेन्द्र ने प्रायमरी सर्टिफिकेट सर्वोत्तम नम्बर से प्राप्त किया तब उसी वर्ष इनके पिताजी को महात्मा गांधीजी के सानिध्य में वर्धा के विद्या मन्दिर ट्रेनिंग स्कूल में अध्यापक के पद पर नियुक्त करके बुलवा लिया गया। सन् 1938 में तुलेन्द्र अपने माता-पिता के साथ वर्धा गये और वहां श्रीमन्न नारायणजी के नवभारत विद्यालय में भरती हो गये। महात्मा गांधीजी के सानिध्य में दो वर्ष का जीवन तुलेन्द्र और उनके परिवार के लिए अत्यंत प्रेरणादायक प्रमाणित हुआ था।
सन् 1940 में तुलेन्द्र वापस रायपुर आने के बाद सेन्टपॉल स्कूल में भरती हो गये। सन् 1945 में मेट्रिक की परीक्षा में तीन विषयों में विशेष योग्यता का प्रमाण-पत्र प्राप्त करके प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो गये।
सन् 1945 में तुलेन्द्र साइन्स कॉलेज, नागपुर में पढ़ने चले गये। वहां रामकृष्ण आश्रम के वरिष्ठ स्वामी श्री भास्करेश्वरानन्द जी के सानिध्य सत्संग से तुलेन्द्र में आध्यात्मिक भावना विशेष रूप से जागृत हो गई।
सन् 1951 में तुलेन्द्र M.Sc. की परीक्षा में सर्वोत्तम अंक से उत्तीर्ण होकर स्वर्ण पदक और अन्य पुरस्कार से सम्मानित हुए तथा I.A.S. की परीक्षा में चयन के बावजूद त्याग कर वापस रायपुर आ गये।
गृहस्थी मायाजाल से मुक्त होने के लिए तुलेन्द्र एक रात्रि को घर से निकलकर सन्यास लेने के लिए बाहर चले गये। नागपुर के रामकृष्ण आश्रम में पहुंचे। वहां ब्रह्मचर्य दीक्षा से दीक्षित हो गये। तब उनका ब्रह्मचारी नाम तेज चैतन्य रखा गया। ब्रह्मचारी तेज चैतन्य ने नागपुर आश्रम में 8 वर्षों तक शास्त्रों का बारीक अध्ययन जब कर लिया तब तपस्या के लिए हिमालय चले गये। हिमालय में गंगाजी के किनारे वशिष्ट गुफा में वहां के प्रसिद्ध महात्मा स्वामी पुरूषोत्तमानन्द जी के सानिध्य में रहकर कठिन साधन तपस्या की। उसके बाद तपोभूमि अमरकण्टक चले आये। वहां नर्मदा जी के उद्गम स्थान पर सन्यास दीक्षा ग्रहण की। उसी समय से स्वामी आत्मानन्द जी के नाम से प्रसिद्ध हो गये।
रायपुर वासियों के आग्रह पर स्वामीजी वापस रायपुर आये और सन् 1961 में विवेकानन्द आश्रम की स्थापना कर दी। स्वामी जी अलौकिक प्रतिभा और प्रभावोत्पादक प्रवचन भाषण के कारण विवेकानन्द आश्रम के भवनों का निर्माण कार्य थोड़े समय में तीव्र गति से बढ़ता चला गया। अल्प समय में ही विवेकानन्द आश्रम के निर्माण में विद्यार्थी भवन, साधु निवास, अस्पताल, पुस्तकालय, सत्संग भवन और श्री रामकृष्ण देव का भव्य मंदिर बनकर तैयार हो गये।
बस्तर जिले के अबूझमाड़ में पहाड़ों और बीहड़ जंगलों से घिरे हुए भीतरी भागों में बसने वाले वनवासी आदिवासियों की दुर्दशा देखकर स्वामी आत्मानन्दजी के मन में भारी दुख हुआ। उनके दुख को दूर करने के विचार से नारायणपुर को केन्द्र मानकर सेवा-कार्य प्रारम्भ कर दिया। वहां की सेवा-सहायता-कार्य के संचालन के लिए बेलुड़मठ (कलकत्ता) की ओर से स्वामी निखिलात्मानन्द जी (स्वामी के छोटे भाई) को नियुक्त किया गया। स्वामी निखिलात्मानन्द जी के द्वारा आदिवासियों को सभी प्रकार से सहायता-सेवा करने के विचार से अस्पताल, बालकों के लिए विद्यालय, छात्रावास, निःशुल्क भोजन, सस्ते अनाज और सस्ते सामानों की दूकान आदि करोड़ों की लागत से कई भवनों का निर्माण किया जा चुका है। अबूझमाड़ के भीतर पहाड़ों और जंगलों के बीच 5-6 शालाएं और धर्मार्थ औषधालय, सस्ते अनाज और सामान के वितरण केन्द्र खोलकर सेवा-सहायता कार्य तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है।
देश-विदेश में स्वामी आत्मानन्द जी की प्रतिभा और प्रभावोत्पादक ओजस्वी भाषण से लोग मंत्र-मुग्ध हो जाया करते थे। भारत वर्ष के विभिन्न भागों में स्वामी जी ने लगभग 20 आश्रम खोलकर भारतीय समाज के समुचित कल्याण करने के लिए अनेक उपाय किये हैं।
स्वामी आत्मानंदजी राष्ट्र और विश्वव्यापी प्रभावशाली महात्मा थे। जब स्वामीजी इन्दौर और भोपाल में प्रवचन देकर जीप द्वारा रायपुर आ रहे थे, तब दिनांक 27 अगस्त, 1989 को राजनांदगांव के पास जीप पलटकर स्वामी जी की छाती के ऊपर गिर पड़ी, जिससे स्वामी जी को प्राणान्तक गहरी चोट लगने से ओऽम् ओऽम् ओऽम् का उच्चारण करते हुए स्वामी आत्मानन्द जी ब्रह्म में विलीन हो गये। राष्ट्र धर्म की यह अपूर्णीय क्षति पूरी नहीं हो सकती है।

महात्मा गांधी जी के साथ बालक तुलेन्द्र





















