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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

Nikhilatmanand निखिलात्मानंदत्तीसगढ़ अंचल में अध्यात्म की चेतना फूंकने वाले छत्तीसगढ़ के महान तीर्थ-स्थल विवेकानंद आश्रम के संस्थापक और प्रवर्तक स्वामी आत्मानन्दजी के अनुज देवेन्द्र का जन्म 24 नवम्बर, सन् 1936 को रायपुर जिले के ग्राम अभनपुर में हुआ था। पिता प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम वर्मा तथा माता भाग्यवती देवी थी। धनीराम जी के पांच पुत्रों व एक पुत्री में इनका स्थान द्वितीय है।

प्रारंभिक शिक्षा रायपुर में हुई। सन् 1961 में उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से M.Sc. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शासकीय विज्ञान महाविद्यालय रायपुर में 10 वर्षों तक गणित के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहे। बड़े भाई स्वामी आत्मानंद जी के पुनीत जीवन से प्रेरणा पाकर इन्होंने शासकीय विज्ञान महाविद्यालय की नौकरी का परित्याग कर दिया और रामकृष्ण संघ के रायपुर केन्द्र में सम्मिलित हो गये।

सन् 1978 में स्थानान्तरित होकर रामकृष्ण संघ के रहड़ा(पश्चिम बंगाल) पहुंच गये जहां 1984 तक विवेकानन्द शताब्दी महाविद्यालय में कार्यरत रहे। उसके बाद एक वर्ष रामकृष्ण मिशन देवधर (बैद्यनाथ धाम) में विद्यापीठ का संचालन किया।

सन् 1985 में इन्होंने स्वामी आत्मानन्दजी के द्वारा बस्तर जिले के नारायणपुर नामक स्थान में प्रारम्भ किये गये “अबूझमाड़ वनवासी सेवा प्रकल्प” के संचालक के रूप में कार्यभार सम्भाला। जंगल और पहाड़ों से घिरे हुए अबूझमाड़ के वनवासियों के बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा का प्रबंध किया। वहां इनके द्वारा रामकृष्ण मिशन के अनेक केन्द्र खोले गये। जहां आदिवासियों के विकास के लिए अनेक योजनाएं जारी की गई। स्वामी निखिलात्मानन्द जी ने इन सभी योजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी। इनके अथक प्रयासों का भरपूर लाभ वहां के वनवासियों को मिल रहा है।

वहां के आदिवासी बालक जिनके पूर्वजों ने कभी पढाई-लिखाई नहीं की थी, स्कूल की सम्भागीय परीक्षाओं में प्रावीण्य सूची में सर्वोत्तम स्थान पाने लगे हैं। जीवन विकास के सभी क्षेत्रों में यथा खेल, वक्तृता, अध्यात्म और सामान्य ज्ञान आदि क्षेत्रों में भी इन बालकों का ऐसा विकास हुआ है जिसे देखकर सबको आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है।

मई सन् 1990 में स्वामी निखिलात्मानन्द जी रामकृष्ण मठ इलाहाबाद के अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित हो गये हैं। वहीं से देश के सभी भागों में धर्म के प्रचार के लिए प्रवास करते हैं।

-- इति समाप्तम् --

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