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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

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आचार्य नरेन्द्र देव वर्मा
आचार्य नरेन्द्रदेव की कृतियां
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Dr.Narendradev Vermaनुष्य के पुनर्भव एवं जीवन की नित्यता के संबंध में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है - बहूनि में व्यतीतानि जन्भानि तवचार्जुन । इसलिए मानव - जीवन में जो कुछ व्यक्त और मूर्त दिखाई पड़ता है, वह प्रस्तुत जन्म के विचारों ,सांस्कृतियों और कार्यों का परिणाम नहीं होता, प्रत्युत अनेकानेक जन्मों का ठाट है - सजावट है, उसकी सृष्टि मनुष्य के मन, प्राण और शरीर के दीर्घकालीन प्रयत्नों और साधनों के फलस्वरुप हुई है। मनुष्य के जीवन में एक नैरतयं है, अव्याहतता और धारावाहिकता है - वह कभी रुकता नहीं, पीढ़ी दर पीढी आगे बढ़ता जाता है। वह अज नित्य, शाश्वत और अपुराण होता है। महादेवी वर्मा के शब्दों में –
प्रलय में मेरा पता पदचिन्ह जीवन में।
शाप हूँ जो बन गया वरदान बँधन में।

धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य, कला और विज्ञानादि का मानव - व्यक्तित्व में अनवरत संश्लेष्ण होता रहता है। पूर्ण , विराट, अपरिमेय और अरिभाषेय की ओर युग - युगान्तर से बढ़ता हुआ मनुष्य चिरन्तन है - अमरता की ओर सतत गतिमान वह स्वयं विभु है। ऐसा प्रतीत होता है कि नरेन्द्र देव के घटना - संकुल पुरुषार्थी जीवन में इन्हीं नैसर्गिक, शाश्वत संस्कारों और परम्पराओं का प्रवाह अत्यंत प्रबल , ओजस्वी और ऋतंभर था। अन्यथा 39 वर्षों की अत्यल्प जीवनावधि में उनके व्यक्तित्व का इतना सुघड़ एवं चिन्ताकर्षक श्रृंगार संभव न होता । जीवन की अपराजेयता का राग अलापने  वाले, मंजरित आम्र-कानन में कोकिला के दिगन्त-व्यापी-कूजन के सदृश मधुर-कांत प्रभाववाले, वन्य-निर्झर के समान उन्मुक्त, उच्छ्वसित गति, लय और ताल युक्त व्यक्तित्व् की गरिमा से नरेन्द्र देव का जन्म पुराने मध्यप्रांत के वर्धा नगर में 4 नवम्बर सन् 1939 को हुआ।

उस समय आसेतु-हिमाद्रि भारत की स्वातन्त्र्य-चेतना उद्​भूत और जागृत होकर व्यापक आंदोलन का रुप ग्रहण कर जन्म-मेदिनी को आप्लावित कर रही थी। स्वातन्त्र्य-देवी की नीराजना में कोटि-कोटि  कल-कंठों से फूटती-निनादित होती समवेत रागनियों में एक स्वर नरेन्द्र देव के पिता श्री धनीराम जी, वर्मा का भी था - वंदना के उन स्वरों में एक स्वर वे भी मिला रहे थे। बुनियादी - शिक्षा कार्यक्रम के प्रसार-प्रचार और प्रशिक्षण के लिए बापू ने उन्हें वर्धा बुला लिया। तब वर्धा तो मानो भारत का प्राण केन्द्र ही था । पूज्य महात्मा गांधी के रुप में भारत की मूर्तिमान आत्मा  वहां  निवास करती थी। वंदिनी भारत माता की कारा को तोड़ने के लिए चल रहे राष्ट्रीय-यज्ञ के अनेकविध अनुष्ठानों में धनीराम जी, गांधी जी के अनन्य सहकर्मी के रुप में आहुतियाँ दे रहे थे।पिता के अंतरतम में रुप रहा राष्ट्रीय - भावनाओं का व्याकुलित संसार ही शिशु नरेन्द्र के भीतर एक विद्रोही कवि का तेजस्वी किंतु रंगमय संसार सृजन करता है। पिता के हृदय में धधकती क्रांति की वही चिनगारिंया आगे चलकर नरेन्द्र की जीवन - ज्वाला बन गई। आनुवांशिक - आभिजात्य और छत्तीसगढ़ की सजल - स्नेह - सिक्त आत्मीय संस्कृति का अवदान तो शिशु की रक्त - वाहनियों में अनुधावमान था ही।

नरेन्द्र देव की माता पुण्यवती भाग्यवती देवी (अमरनाथ - यात्रा के समय जिनका स्वर्गवास पंचतरणी में रक्षाबंधन के दिन सन् 1976 को उसी उष: वेला में हुआ, जिस उषवेला में ठीक 66 वर्ष पूर्व श्रावण - पूणमा रक्षाबंधन के दिन ही उनका जन्म हुआ था। सरल और मृदु स्वभाव की पति-परायणा और वत्सला स्त्री थी। वह ईश्वर भक्त दयामयी  जननी, करुणा, स्नेह और सेवा की मानो त्रिपगथा थी। जिसमें बार-बार अवगाहन कर नरेन्द्र देव ही नहीं समस्त परिजनों और परिचितों का जीवन निर्मल और पवित्र होता रहा। वे सावन-भादो की जल-संपृक्त घटा के समान थीं जो पुत्रों पर करुणा की धारासार वर्षा करती थी।
तुम सृजन-मंथन-जनित विगलित विमल नवनीत,
चलित प्रजनन-चक्र की स्निग्ध बॅूद अतीत।
तुम जगत-नीरस मरुस्थल के बरसते मेह,
तुम तड़ित विद्युच्छटा, तुम सरसता के मेह।
तुम विराम-विकार में अनुरागिनी मनुहार,
राग तुम, सुविचार तुम, मृदु प्यार प्रज्ञाधार।

नरेन्द्र देव की कविताओं, नाटय गीतों एवं आञ्चलिक कथा - सृष्टियों में जो राग-विराग, कारुण्य और स्नेह की मधुर-मोहक झॉकियाँ है, विपदग्रस्त छत्तीसगढ़ के भविष्य के लिए जो टीस, दर्द और कशिश है - वह सच माँ का ही अमूल्य अवदान है।

नरेन्द्र देव के पिता 19 अप्रेल सन् 1938 से 30 अप्रेल सन् 40 तक की दो वर्षों की अवधि में, अनथक-अविश्रांत स्वधर्म-अनुष्ठान करते हुए महात्मा जी और पं. जवाहरलाल नेहरु के द्वारा अभिशंसित हुए और बापू की आज्ञा से 1 मई सन् 40 को रायपुर को कर्मक्षेत्र बनाने के लिए लौट आए। फिर आया सन् 42 का महत्वपूर्ण वर्ष  - भारत छोड़ो  आंदोलन ने निद्रायमान भारत की तन्द्रा जाग उठा- लुटे हुए वैभव, खोई हुई  अस्मिता और प्राचीन गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए देश भर में अनेक नेता बंदी बना लिए गए ब्रितानी साम्राज्य का सिंहासन डगमगाने लगा। रायपुर के अग्रणी नेता महंत लक्ष्मीनारायण दास और पं. रविशंकर शुक्ल सहित अनेक पुराने योद्धा बंदीगृह में डाल दिये गये। फिर 10 अगस्त सन् 42 को गांधी चौक की सभा की अध्यक्षता करते हुए श्री धनीरामजी भी बंदी बनाकर जेल भेज दिए गए। उस समय नरेन्द्र मात्र 3 वर्ष का अबोध बालक था। उसके अबोध मन पर स्नेहिल पिता की अनुपस्थिति का क्या प्रभाव पड़ा होगा। इसका पता लगाना तो शिशु मनोविज्ञान का विषय हो सकता है। फिर भी अनुमान किया जा सकता है कि नरेन्द्र देव के साथ ही उसके बड़े भाई श्री तुलेन्द्र और श्री देवेन्द्र पर उस घटना को अवश्यमेव विशिष्ट छाप पड़ी होगी। आज हम उन दोनों अग्रज बंधुओं में जिस स्वराष्ट्रभिमान और ईश्वर-भक्ति तथा संत के लक्षण तरंगायित और वलयित देखते है - वह सब पिता के पुण्य-चरित का ही प्रभाव  होना चाहिए।

पांच भाइयों और एकाकिनी बहिन में नरेन्द्र तृतीय था। अग्रज श्री तुलेन्द्र वर्मा (स्वामी आत्मानंद महाराज) उससे 10 वर्ष बड़े थे। श्री देवेन्द्र (स्वामी निखिलात्मानंद) दूसरे ,श्री राजेन्द्र (ब्रम्हचारी प्रीति चैतन्य) चौथे, बहिन प्रा. डा. लक्ष्मी पंचम और आयुष्मान डा. ओमप्रकाश वर्मा कनिष्ठ है।

अनंत श्री विभूषित स्वामी आत्मानंद जी महाराज रामकृष्ण मठ नागपुर में रहते हुए विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे। उन्हीं दिनों वे रामकृष्ण और विवेकानंद के महान विचारों से परिचित हुए। गणित की एम. एस. सी. की परिक्षा प्रथम श्रेणी और प्रावीण्य के साथ पास करने वाले युवा तुलेन्द्र के स्वागतार्थ अखिल विश्व मोहिनी माया अपना पाश फैलाने बैठी थी। किंतु जिस माया शक्ति को भगवान स्वयं –‘मम माया दुरत्त्यया कहते है, और जिस माया शक्ति के द्वारा ईश्वर अशेष भूत-संघात को विभ्रमित करते है-
ईश्वर सर्वभूतानां हद्देशेर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि भायया।

उसी की कृपा और भगबदेच्छा से विविध-विपुल सांसारिक आकर्षणों को क्षण भर में ही उच्छिन्न कर पुण्यवती भाग्यवती ओर धनीराम जी के मस्तक का यह चंदन, यह उनके नंदन-विपिन का अनाघ्रात पारिजात पुष्प तुलेन्द्र परिव्राजक हो गया - आत्मनों मोक्षार्थ जगद्विताय च। आज उन स्वामी जी महाराज के पावन - चरित की खुशबू और मृदुगंध से भारत का वायुमंडल सुरभित है। सवामी जी महाराज का सुयश अब भारतेतर राष्ट्रों में भी फैल रहा है। शंकराचार्य, कबीर, सूर, मीरा, तुलसी, ज्ञानदेव, नानक, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद ,गांधी, यीशू एवं प्रेमावतार श्रीचैतन्य महाप्रभु के  साथ ही तिलक और सुभाष्  बाबू के जीवन से प्रभावित स्वामी जी वेद - वेदांगों पुराणों और स्मृतियों तथा संस्कृति के गंभीर अध्येता और भाष्यकार है। वह जितने उद्​भट विद्वान है, उतने ही नम्र भी है।  उच्चकोटि की साधुता उनकी विशिष्टता है। वे  इतने सहज-सरल है कि अपरिचित व्यक्ति भी उनके पास पहुंच कर ऐसा अनुभव करता है कि जैसे वर्षों से उनके बीच संबंध रहा हो। स्वामी जी महाराज पर ऋषि की निम्न उक्ति चरितार्थ होती है-
कुलं पवित्रं जननी कृतार्थ,
वसुँधरा पुण्यवती च तेन
अपारसंवित्सुंख सागरेस्मिन,
लीनं परे ब्रहम्णि यस्य चेत:।

पिता को अपने चरित्र से प्रभुदित करने वाले ऐसे महापुरुषों का पृथ्वी में जन्म धन्य है-
धन्य जनम जगतीतल तासू
पितहिं प्रमोद चरित सुनि जासू।

ऐसे संत पुरुष का अनुज होना नरेन्द्र देव का सौभाग्य था अथवा पूर्व-जन्म के संचित पुण्यों का उदय कौन जानता है ?

नरेन्द्र का प्रारंभिक बचपन घटना-शून्य था। वह एक सामान्य विद्यार्थी था। स्थानीय माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययन करने वाले उस किशोर के संबंध में उसके तत्कालीन गुरु श्री शमसुद्यीन और श्री कीर्तिनाथ ठाकुर से सामान्य घटनाओं की ही जानकारी हुई। जो मुझे विशिष्ट अथवा उल्लेखनीय नहीं लगी। हाँ, बचपन की चंचलता के साथ गाँभीर्य का संयोग उसके स्वभाव की विचित्रता अवश्य थी - वही व्यक्ति-वैचित्र्य कालान्तर में स्वामी जी की चरित-गंगा में डूबकर, उससे अभिसिंचित होकर लता सी लहलहा उठी।
स्कूल के दिनों में नरेन्द्र देव यदा-कदा बड़े भाई से मिलने नागपुर जाया करता था। वहाँ उनकी सन्निधि और मौन-व्याख्यान का गुप्त प्रभाव उस पर शनै: शनै: पड़ रहा था। उसी बीच नरेन्द्र को मां शारदा और स्वामी रामकृष्ण देव की जन्मस्थली जाने का अवसर मिला। शारदा तो वरदा सरस्वती ही है। नरेन्द्र ने उनसे याचना की - मां तुम्हारे अगणित कृति पुत्र है, एक इस अकिंचन-अकृति  को भी पुत्र बना लो ना। और आश्चर्य ! नरेन्द्र बदल गया। करुणामयी ने उसे स्वीकार कर लिया था। कल का चंचल, अल्हड़ सामान्य युवक धीर-शांत  गंभीर और विशिष्ट तथा विद्यानुरागी हो गया। फिर तो अंधेरे मिटते गए, मन और हृदय के द्वार खुलते गये - और शुरु हुआ एक भव्य जीवन इतिहास। नरेन्द्र अपनी संज्ञा के अनुरुप सचमुच ही नरेन्द्र  देव बन गया ......... एक  धुँधवाने वाली लघु दीपशिखा नहीं, एक ज्वालवाही धधकता शोला।

अभी वह  10 वीं का छात्र था और द्वितीय भाई श्री देवेन्द्र नागपुर विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे। श्री तुलेन्द्र के साधु बन जाने से स्तंभित और आशंकित माता पिता ने बिना बड़े भाई को बताये देवेन्द्र और नरेन्द्र के परिणय की तैयारी कर ली। जब नरेन्द्र ग्रीष्मावकाश में घर आये तब उन्हें वातावरण में गोपनीयता और रहस्य की अनुभूति हुई। देवेन्द्र ने नरेन्द्र से पूछा - क्या रे, तेरा विवाह हो रहा है? हाँ क्योंकि तुम्हारा हो रहा है। देवेन्द्र सन्न रह गया, उसने भावी कर्तव्य का तत्काल निश्चय कर लिया, वह इन प्रपंचों के लिए नहीं बना है, वह तो अपने सन्यासी भाई के जीवन को ध्रुवतारा मान चुका था, वह केवल अवसर की प्रतीक्षा में था - वही अवसर अकस्मात उपस्थित था - उधर वरयात्रा की तैयारी हो रही थी और इधर देवेन्द्र नई राहों की खोज में घर से दूर जा चुका था। पाठक जानते होंगे कि वही गृहत्यागी युवक सुदीर्ध अवधि तक विवेकानंद आश्रम के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान देकर संप्रति रामकृष्ण मिशन में स्वामी निखिलात्मानंद के नाम से विख्यात हो चुका है। मेधावी, प्रखर पाण्डित्य से विभूषित गणित के आचार्य देवेन्द्र की सेवाओं को उनके विद्यार्थी अभी भूले नहीं होंगे। विवेकानंद आश्रम में भी संतोष भैया भी प्रमुख है। रामानुज सौमित्र की तरह बड़े भाई स्वामी आत्मानंद महाराज के चरणरजानुचर स्वामी निखिलात्मानन्द नरेन्द्र के लिए एक खुले हुए सद्ग्रंथ सिध्द हुए । जिन सबके स्वामी निखिलात्मानंद और तब के देवेन्द्र तथा स्वामी सत्यरुपानन्द के मधुर स्वभाव की याद, उनके संपर्क में आए मेरे जैसे व्यक्तियों के लिए अमूल्य धरोहर है, उन्हीं देवेन्द्र के सहोदर और संतोष के कृपा-पात्र नरेन्द्र के लिए नियति एक भिन्न कर्म-क्षेत्र की संरचना कर रही थी।

देवेन्द्र तो संसार की झंझटों, झंझावातों से बच गये। किंतु नरेन्द्र! वह तो अभी छोटा था, कार्याकार्य विवेक उसे अभी नहीं था। वह केवल इतना ही समझ सका कि माता-पिता की आज्ञा अननुलंघनीय होती है। इस प्रकार अल्प वय में ही विवाहित होकर वह संसार-सिंधु की उत्ताल तरंगों में हिचकोले खाने लगा। शैशव और यौवन के संधिस्थल पर खड़ा हुआ वह स्वयं प्रवृत्ति और निवृत्ति परक भावों का प्रयोग स्थल बन गया। गृहस्थाश्रम का मुग्ध आकर्षण और सन्यस्थ भाइयों का निर्धूम वैराग्य दोनों अद्​​भुत। युवक ने दोनों को समेटना शुरु किया। दूर गगन में उड़ने वाले पक्षी का मन जैसे कोटरस्थ शावक के ध्यान में डूबा रहता है - दूरातिदूर उडडायमान वह जैसे क्षण भर के लिए भी नीड़ के शिशु का विस्मरण नहीं करता, जैसे मंझधार में पड़े नाविक की दृष्टि अपलक किनारों पर टिकी रहती है, वैसे ही नरेन्द्र घोर कर्म-चक्र में पड़ा हुआ भी संसार की लक्ष्मण रेखा को लाँघकर वैराग्य की रेखाओं को छूने की चेष्टा करता रहता था- शायद जीवन को समेट लेने की उसे शीघ्रता थी।

इसीलिए निरंतर अध्यवसाय करता हुआ नरेन्द्र शैक्षणिक और साहित्यिक क्षेत्रों में ही नहीं, सेवा के अनेक क्षेत्रों में भी नवीन क्षितिजों का उद्धाटन करता रहा। वह अचिरात् विभिन्न सभा  - सम्मेलनों के लिए अपरिहार्य व्यक्ति बन गया।सभी कर्तव्यों का निर्वहण कौशल पूर्वक करता हुआ, वह आश्रम कार्य के लिए समय निकाल ही लेता था। धार्मिक, सांस्कृतिक और छत्तीसगढ़की जन-मेदिनी की सेवा-कार्य में किसी भी प्रकार का व्यवधान उसे असहय था। इंटर स्नातक  तथा स्नातकोत्तर हिंदी एवं भाषा-विज्ञान में प्रथम श्रेणी और प्रावीण्य प्राप्त करने के बाद उसने दोनों विषयों में डाक्टरेट की उपाधि भी अर्जित की।

विद्याध्ययन और लोक संग्रह के उसके अभिनिवेश में - उसके भीतर सोये हुए साहित्यकार को उसके समग्र व्यक्तित्व को तराशने और प्रभादीप्त करने में गुरुवर आचार्य पं. नन्ददुलारे बाजपेयी का योगदान विशिष्ट था। डा.गजानन शर्मा, डा. गंगाधर झा, आचार्य डा. प्रेम शंकर, आचार्य डा. राममूर्ति त्रिपाठी के समान गुरुओं की कृपा उसके नित्य संबल थे।  सन् 1962 में सागर विश्वविद्यालय से हिन्दी की स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के तुरंत बाद नरेन्द्र देव शासकीय सेवा में आ गये। 17 वर्षों के अध्यापकीय जीवन में बालाघाट, दमोह, दुर्ग और रायपुर के विज्ञान, संस्कृत और कन्या- महाविद्यालयों के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करते हुए उन्होंने शिक्षकीय मूल्यों  के कई मानदंड स्थापित किये। अनेकों पुस्तकों के लेखन के साथ ही शोधर्थियों का उन्होंने मार्गदर्शन भी किया।

भारत, भारती और छत्तीसगढ़ की सेवा में अपने जीवन का अर्थ खोजता हुआ, जीवन रस से भरपूर हमारा यह दुलारा प्रोज्वल सितारा 8 सितम्बर सन् 1979 को डूब गया, फिर अधिक उष्मा से जलने के लिए, पुनर्भव के लिए पुन: किसी वत्सला जननी भाग्यवती की कोड़ में शिशु रोदन कर मचलने के लिए! और पुन: यौवन प्राप्त कर संस्कृति और सभ्यता की नई पगडंडियों का निर्माण करने के लिए ! हे प्रिये वयस्क एक बार फिर आओ और -
स्वर - लय, यति - गति, ताल राग- रति,
यह जग, जन - जीवन की सदगति।
हुई विकृत - विभ्रमित, अनृति अति,
इसे उदात ऋतंभर स्वर दो,
मन - मन में गायन स्वर भर दो।



-- इति समाप्तम् --

टिप्पणियां 

 
0 #2 Kurmi samaj ko aage lanaGhanshyam SIngroul 2011-05-20 19:01
Aap sabhi ko sabse pahle der sari subhkamnaye, ki aap logo ne, Kurmi samaj ko Net ke madhyam se aage lane ki koshik ki hai,
Quote
 
 
+1 #1 RE: आचार्य नरेन्द्र देव वर्माRicha Nayak 2011-04-26 21:17
Thank you!!!
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