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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

त्तीसगढ की माटी ने राजनीति, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना का संचार करने वाले अनेक महापुरूष पैदा किए हैं किन्तु छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा और साहित्य का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका व्याकरण लिखने का सर्वप्रथम साहसी काव्योपाध्याय हीरालालजी ने ही किया हैं। यही कारण है कि उनकी गणना छत्तीसगढ़ के सप्तऋषियों में होती है।

हीरालालजी का जन्म सन् 1956 में रायपुर के एक सम्पन्न कुर्मी परिवार में हुआ था उनके पिता का नाम बाबू बालाराम तथा माता का नाम राधाबाई था। हीरालालजी की प्राथमिक शिक्षा रायपुर में ही हुई थी। सन् 1874 में उन्होंने जबलपुर से मेट्रिक की परीक्षा पास की। अपने प्रारंभिक जीवन में वे अत्यंत मेधावी छात्र थे। सन् 1875 में उन्होंने सामान्य शिक्षक के रूप में अपनी जीविका आरंभ की किन्तु अपनी योग्यता के कारण शीघ्र ही उन्होंने पदोन्नति की और वे प्रधानाध्यापक के पद नियुक्ति होकर धमतरी चले गए। धमतरी पहुंचने के पश्चात उन्होंने     धमतरी को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। सन् 1885 हीरालाल जी ने छत्तीसगढ़ी व्याकरण नामक ग्रंथ लिखा। छत्तीसगढ़ी का व्याकरण उन्होंने उस समय लिखा जब खड़ी बोली का सर्वमान्य और प्राथमिक व्याकरण उपलब्ध नहीं था। इस ग्रंथ के महत्व से प्रभावित होकर भाषा शास्त्री सर जार्ज ग्रियर्सन ने बंगाल एशियाटिक सोसायटीज् जर्नल में इस ग्रंथ को अंग्रेजी में अनुवाद कर सन् 1890 में प्रकाशित करवाया। जार्ज ग्रियर्सन ने हीरालालजी तथा उनके द्वारा लिखे व्याकरण पर अपनी प्रशंसात्मक सम्मति प्रकट करते हुए लिखा है यह ग्रंथ भारतीय भाषाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास करने वालों के लिये प्रेरणास्पद हैं।

पं.लोचन प्रसाद तिवारी पांडेय ने लिखा कि छत्तीसगढ़ी व्याकरण हीरालालजी को अमरत्व प्रदान कर दिया। हीरालालजी के इस ग्रंथ से जार्ज ग्रियर्सन तथा डा. हार्नेस जैसे प्रतिभा सम्पन्न विद्वानों को भारतीय भाषाओं और बोलियों के अध्ययन तथा पर्यवेक्षण की प्रेरणा मिली। हीरालालजी का यह छत्तीसगढ़ी व्याकरण केवल व्याकरण मात्र नहीं है। इस ग्रंथ में छत्तीसगढ के चुने हुए मुहावरें, कहावतें, पहेलियां, लोक-गीत और लोक-कथाएं भी संकलित है जो छत्तीसगढ़ी के स्वरूप को स्पष्ट करने में सहायता पहुंचाती हैं।

हीरालालजी शिक्षक और व्याकरणकर्ता ही नहीं थे अपितु गणित, संगीत, काव्य के क्षेत्र में उन्होंने अद् भुत प्रतिभा का प्रदर्शन किया था। हीरालालजी ने नौ सर्गो में दुर्गायन काव्य की रचना की थी जिस पर उन्हें बंगाल संगीत अकादमी द्वारा काव्योपाध्याय की उपाधि से विभूषित किया गया था तथा उन्हें स्वर्ण-केयूर प्रदान कर सम्मानित किया गया था। उन्होंने शालोपयोगी गीत नामक पुस्तक बालकों के लिए लिखी थी। इन गीतों को उन्होंने भारतीय शास्त्रीय–संगीत में बांधा था। इस पुस्तक पर बंगाल संगीत अकादमी ने हीरालालजी को रजत-पदक से पुरस्कृत कर अभिनंदन-पत्र प्रदान किया था। हीरालालजी का कुछ कविताएं इटली की सिन्नोर केनिनी द्वारा संकलित काव्य ग्रंथ में सम्मिलित की गई थी। इस ग्रथं में विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं की कविताओं का अनुवाद इटालियन भाषा में संग्रहित किया गया था।

हीरालालजी विद्वान कवि और व्याकरणकर्ता ही नहीं थे अपितु समाजसेवी और योग्य प्रशासक भी थे। उनकी बहुमुखी प्रतिभा एवं सद्व्यवहार से प्रभावित होकर उन्हें धमतरी नगर-पालिका का अध्यक्ष चुना गया था। यह उनके सार्वजनिक जीवन में लोकप्रियता का प्रमाण है। छत्तीसगढ़ के इस उज्जवल नक्षत्र का अचानक ही सन् 1890 में 34 वर्ष की अत्यंत अल्प आयु में देहावसान हो गया। हीरालालजी ने अपनी छोटी सी आयु में न केवल छत्तीसगढ़ी बल्कि हिन्दी साहित्य की भी उल्लेखनीय सेवायें की।

-- इति समाप्तम् --

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