| 30 दिसम्बर 2007
छत्तीसगढ की माटी ने राजनीति, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना का संचार करने वाले अनेक महापुरूष पैदा किए हैं किन्तु छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा और साहित्य का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका व्याकरण लिखने का सर्वप्रथम साहसी काव्योपाध्याय हीरालालजी ने ही किया हैं। यही कारण है कि उनकी गणना छत्तीसगढ़ के सप्तऋषियों में होती है।
मनुष्य के पुनर्भव एवं जीवन की नित्यता के संबंध में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है - बहूनि में व्यतीतानि जन्भानि तवचार्जुन । इसलिए मानव - जीवन में जो कुछ व्यक्त और मूर्त दिखाई पड़ता है, वह प्रस्तुत जन्म के विचारों ,सांस्कृतियों और कार्यों का परिणाम नहीं होता, प्रत्युत अनेकानेक जन्मों का ठाट है - सजावट है, उसकी सृष्टि मनुष्य के मन, प्राण और शरीर के दीर्घकालीन प्रयत्नों और साधनों के फलस्वरुप हुई है। मनुष्य के जीवन में एक नैरतयं है, अव्याहतता और धारावाहिकता है - वह कभी रुकता नहीं, पीढ़ी दर पीढी आगे बढ़ता जाता है। वह अज नित्य, शाश्वत और अपुराण होता है। महादेवी वर्मा के शब्दों में –
प्रलय में मेरा पता पदचिन्ह जीवन में।
शाप हूँ जो बन गया वरदान बँधन में।
कपिलनाथ कश्यप का जन्म 6 मार्च, 1906 को ग्राम पौना, जिला-बिलासपुर में हुआ। कश्यप जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा पास की पं. रामचंद्र शुक्ल, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ.रामकुमार वर्मा आदि उनके शिक्षक थे। पटवारी पद से नौकरी प्रारंभ कर सहायक अधीक्षक भू-अभिलेख पद से सेवानिवृत हुए। नौकरी के दौरान वे लगातार साहित्य साधना में लगे रहे। वे हिन्दी तथा छत्तीसगढ़ी में समान अधिकार के साथ साहित्य रचना करते थे।



















