| 21 मार्च 2009
आर. एस. पटेल
प्रधान सम्पादक, कूर्मि क्षत्रिय जागृति
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साधारणत: भारतीय संस्कृति का प्रारम्भ वैदिक काल से माना जाता है । किन्तु सिंधु-घाटी तथा देश के अन्नयान्य स्थानों की अब तक हुई खुदाई से प्राप्त खण्डाव शेषों में इसका प्रारम्भ काल और कई हजार वर्ष पीछे आंका जाने लगा हैं । हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों आदि स्थानों में से अवशेष खुदाई से प्राप्त हुये है उनसे एक बात तो स्पष्ट पता चलती है कि भारतवर्ष में वेदों से पूर्व भी मानवीय सभ्यता काफी विकसित हो चुकी थी। इन खोजों के परिणामस्वरूप भारतीय सभ्यता की गणना विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं जैसे सुमेर, अवकाद, बेबीलोन, मिश्र तथा असीरिया में किया जाता है जबकि वे सभी पुरानी सभ्यतायें प्राय: लुप्त हो चुकी है पर भारतीय सभ्यता में कुछ ऐसी मूलभूत विशेषता रही है कि आज भी वह विद्यमान तथा जीवंत है।
| 20 नवम्बर 2008
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार, गांधीवादी चिंतक समाजसेवी श्री केयूरभूषणजी वर्षों से कुर्मी समाज से जुड़े है और समाज पर अपनी गहरी नजर रखते हैं इस लेख के माध्यम से इनका मानना है कि समाप्त होती पीढ़ी आगामी पीढ़ी को जो कुछ सौंपकर जाती है। जिसे सहेज कर कुछ समेटकर रखने और उस पर निर्वहन करने व बताये मार्ग पर चलने का दायित्व इस पीढ़ी का हैं।
मानव समाज का विकास विश्व में लगभग एक ही समान हुआ हैं परन्तु भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कुछ विभिन्नता भी आई हैं। वैदिक काल में हम सब एक परिवार की तरह थे। पूरे समाज का एक ही वर्ण था। ज्ञानवर्धन करने वाला ऋषि भी श्रमजीवी थे। वे भी हल चलाते थे, गौ पालन करते थे, मिट्टी के बर्तन बनाते थे, चमड़े के जूता बनाते थे। इसलिए ऋषि श्रमजीवियों को युगदृष्टा के तुल्य माना। उनकी वंदना करते हुए कहते हैं-
चर्मकारो म्या नमः, कुंभकारो म्यो नमः, रथकारो म्यो नमः



















