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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

बालाजी भोंसले, 16वीं शताब्दी के में पूना जिले में, पाटस सब-डिविजन, जो उस समय अहमदनगर के निजामशाह के निजामशाह के अधीन था, के निवासी थे। कृषि पर आधारित परिवार था। हिंगानी तथा दीवलगांव नामक ग्रामों के मुखिया (पटेल) के पद से भी आय होती थी। उसके दो बेटों, माहोजी और बिठोजी हुये, ये दौलताबाद की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित वेरूल (एलोरा) गांव में जा बसे। पर कृषि से गुजारा नहीं होने पर, सिंधरेड़ के निजामशाही दरबारी जादवराव के पास समान्य सैनिक के रूप में नौकरी कर ली।

माहोजी के पुत्र शाहजी, जादवराव की पुत्री जीजाबाई की सुन्दरता की प्रशंसा करते हुये, जादवराव ने बचपन में ही उनकी शादी कर दी। एलोरा में गड़े हुये, धन प्राप्ति के बाद उसे चमारगुण्डा में पुंडे नामक एक ईमानदार महाजन के पास जमा करके दोनों भाईयों ने घोड़ों, जीन, हथियार और तम्बू खरीदे। एक हजार खुड़सवारों की सेना सज्जित कर ली। कि पतनोन्मुख निजामशाही सरकार ने उन्हें सम्मानपूर्वंक अपने सेना नायकों में नियुक्त कर लिया। यह 17 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ, जब राजधानी अहमदनगर पर अकबर की जीत से, उस राज्य में खलबली एवं विध्वंस के चिन्ह नजर आने लगे थे। माहोजी ने भाग्यप्रदत्त धन को मंदिर बनवाने, तालाब खुदवाने में व्यय किया, उस पुण्यस्थलि पर एकत्र होने वाले लाखों यात्रियों के लिये वरदान सिद्ध हुआ। माहोजी की मृत्यु के समय उनका सैन्य दल की शक्ति एक हजार से बहुत अधिक हो गई थी। उनके छोटे भाई बिठोजी ने निजामशाही की सेवा में नेतृत्व किया और बिठोजी की मृत्यु के बाद (संभवत: 1623 में) मालोजी के ज्येष्ठ पुत्र शाहजी ने नेतृत्व सम्हाला।

शाहजी भोसलें का उत्थान (1625 से 1636)

भोसलें की प्रथम पत्नी जीजाबाई (जादराव की पत्री) से दो पुत्र शम्भुजी और शिवाजी हुये। ज्येष्ठ पुत्र शम्भुजी की मृत्यु जवानी में ही हो गई। शाहजी के द्वितीय पुत्र शिवाजी का जन्म पूना जिले के पूर्व की ओर में जुभार नगर के पास स्थित शिवनेर के पर्वत दुर्ग (किले) में हुआ। जीजाबाई ने गर्भस्थ शिशु के कुशलता के लिये स्थानीय, शिवाई देवी से प्रार्थना की थी, इसलिये उन्होंने बालक का नाम उनके ऊपर शिवा रखा। शिवाजी के जन्म तिथि में मतेक्य नहीं है, कुछ लोग इसे 10 अप्रैल 1627 मानते हैं, तो कुछ 19 मार्च, 1630।

1636 में शाहजी ने, युद्ध में हार कर संधि के तहत दिये गये, किलों (दुर्गो) के साथ शिवनेर का किला भी मुगलों को सौंप दिया। शिवाजी लगभग 1637 के अन्त में पुना में दादाजी कोणदेव की देखरेख में रहने लगे। शाह जी ने जीजाबाई को उसके पुत्र के साथ त्याग दिया। 1630 के आसपास शाहजी ने तुकोबाई मोहिते से विवाह कर बीजापुर, आदिलशाह के सेवा में नियुक्त होकर, सूदूर दक्षिण में युद्ध के लिये भेज दिये गये। तुकोकबाई मोहिते एवं उसके पुत्र व्यंकोजी को अपनी संगति एवं समस्त आय प्रदान कर दी। पिता के इस व्यवहार ने शिवाजी को माता के प्रति दैवी स्वरूप् एवं स्वयं को आत्म निर्भर, स्वाभिमानी बनाया।

1640 या 1641 में जब शिवाजी 12 वर्ष की उम्र पार कर चुके थे। एक मराठा सरदार के पुत्र की शादी सामान्यत: जिस अवस्था में होती है, उसे पार कर चुके थे। शाहजी जो 1639 युद्ध के (बीजापुर के आदिलशाह की तरफ से लड़ते हुये) बाद बंगलोर के जामींदार बना दिये गये थे, ने जीजा बाई सहित शिवाजी को 1940-41 बंगलोर बुलाया एवं पूना की जागीर अब शिवाजी को प्रदान कर दी। जिसकी वार्षिक आय 40,000 होन अर्थात् 1,50,000 रूपये थी। साई बाई निम्बालकर के साथ शिवाजी का विवाह कर दिया गया। शिवाजी माता सहित बंगलोर से पुणे वापस चले आये। दादा कोंणदेव अभी भी नाबालिग शिवाजी के अभिभावक थे। इस जागीरदारी का कार्यारम्भ 1642 में हुआ जब शिवाजी 16 वर्ष के थे। 7 मार्च सन् 1647 को दादा जी कोंणदेव की मृत्यु के पश्चात पूना जागीर का पूर्ण स्वामित्व शिवाजी ने 20 वर्ष की उम्र में सम्हाली। दादाजी ने शिवाजी को शिक्षित किया, एक श्रेष्ठ अध्यापक नियुक्त कर उन्हें कुश्ती, घुड़सवारी तथा अन्य युद्ध कौशल सिखाया।

पूना जिले की पश्चिमी पट्टी 'मवाल' अर्थात सूर्यास्त भूमि कहलाती है। शिवाजी ने सर्वप्रथम इस प्रदेश में आधिपत्य जमाया, यहां के निवासी कोली, कुनबी और मराठे थे। यह कृषि प्रधान प्रदेश था। मावल देश शिवाजी की शक्ति का उदगम स्थान बना और मावली लोग उसकी सेना की रीढ़ की हड्डी बने। इसी क्षेत्र से शिवाजी को अपने सर्वोत्तम सैनिक एवं परमभक्त अनुगामी मिले। जिनमें यसाजी कंक, बाजी पासलकर, तानाजी मालुसरे एवं भाई सूर्या जी प्रमुख थे। ग्राम कारी का जेघे नायक और हरिदास, मावल का बादल नायक, गुजनमाव के सिलिम्बकर नायक और कानड़ खोड़े के मराल देशमुख।

मराठों की दृष्टि में कुटुम्ब की जायजाद वतन कहलाती हैं। 1642 में शाहजी ने चार अधिकारी पूने के जागीर के साथ शिवाजी को दिये थे। वे बहुत योग्य थे, और शिवाजी के प्रति वफादार एवं श्रद्धालु थे। ये 4 अधिकारी थे, श्यामराज नीलकन्ठ रानझेकर चांसलर (पेशवा) था, बालकृष्ण हनुमन्ते महालेखाकार (मजुमआदार) था, सोनाजीपंत मंत्री (वजीर) था, और रधुनाथ बल्लाल वेतनदाता (सबनिस) था। शिवाजी ने अब उनमें 2 की वृद्धि की, तुकोजी चौर मराठा अश्व स्वामी (सरे-नौबत) नियुक्त किया गया, और नारायणपन्त जिला वेतनदाता।

1646 में बिना लड़े हुये ही कुशल युक्ति द्वारा उन्होंने बीजापुरी सेनापति से तोर्ना का किला छीन लिया। अधिकृत गढ़ का नाम प्रचंडगढ़ रखा गया। इसके पांच मील पूर्व में पहाड़ी के प्रक्षेप की चोटी पर एक नया किला राजगढ़ बनाया, निचले तल पर तीन गढ़ी (माची) और बनाया गया। बीजापुर का सुल्तान इस समय बीमारी की हालत में था, इसलिये निष्क्रिय रहा, प्रशासन का कार्य बेगम साहिबा चलाती रही। उन आक्रमणों की सूचना बीजापुर को दी गई। बारामती और इन्दापुर के अधिकारी शान्तिपूर्वक शिवाजी के आधिपत्य में आ गये। पूना के दक्षिण-पश्चिम में कोन्दाना का गढ़, आदिलशाही गवर्नर को रिश्वत देकर हथिया लिया गया।

1648 में बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के पिता शाह जी को बन्दी बना लिया, यह शिवाजी के बीजापुरी किलों को अपने अधीन करने का परिणाम था। बाद में शाहजी को मुक्त कर दिया गया, क्योंकि बीजापुरी सेना शिवाजी एवं बंगलोर पर कब्जा करने में असफल रही। शिवाजी ने पूना के निकट पुरंन्दर के किले पर अधिकार जमा लिया।

15 जनवरी 1656 को शिवाजी ने जावल को अपने अधीन कर लिया। वहां के शासक चन्द्ररावमोरे की हत्या कर यह काम किया गया। जावली के दो मील पश्चिम में प्रतापगढ़ नामक किला बनवाया। अप्रैल 1956 में रायगढ़ का विशाल पहाड़ी किला चन्द्रराव और उनके परिवार से छीन लिया गया। रायगढ़ आगे चलकर शिवाजी की राजधानी बनी। 24 सितम्बर को पूना से दक्षिण पूर्व 35 मील दूर स्थित सूपा पर अधिकार कर लिया। इस तरह शिवाजी ने सूपा, बारामती और इन्दापुर जो पूना के दक्षिण पूर्व को पुष्ट करता था, पुरंन्दर, राजगढ़, कोंदना, रोहिदा और तोर्ना पर अधिकार कर दक्षिण में पहाड़ी किलों की एक शक्तिशाली श्रृंखला खड़ी कर ली। पूना के उत्तर-पश्चिम में उन्होंने तिकोना, लोहगढ़ और राजमाची के किलों को अधिकृत कर लिया।

    मुगलों और बीजापुर राज्य से शिवाजी का प्रथम युद्ध-

1657 शिवाजी ने मुगलों से शांति बनाये रखा। उस समय बादशाह शाहजहां के राज्य में, 1653 के आगे मुगल दक्षिण, शाहजादा औरंगजेब द्वारा शासित था। औरंगजेब योग्य एवं शूरवीर था। बीजापुर के नवाब मुहम्मद आदिलशाह की मृत्यु 4 नवम्बर 1656 में हुई। आदिलशाह की मृत्यु से उत्पन्न अव्यवस्था का लाभ मुगल एवं शिवाजी दोनों उठाना चाहते थे। शिवाजी ने बीजापुर राज्य में लुटपाट, जुन्नार क्षेत्र में किया, एवं मुगल क्षेत्र चमारगुण्डा और रासीन क्षेत्रों को लुटा। सितम्बर में शाहजहां की बीमारी और उसके बेटों में सिंहासन के उत्तराधिकार के लिये युद्ध की तैयारी से स्थिति जटिल हो गई। अक्टूबर, 1657 को शिवाजी ने कल्याण नगर पर अधिकार कर लिया। शहजादे औरंगजेब के उत्तर की ओर पलायन एवं 1658-59 में उत्तरधिकार की लड़ाई में व्यस्त होने का लाभ उठाकर शिवाजी ने, बीजापुर राज्य के कल्याण, भिवंडी में अधिकार कर लिया। साथ ही सूरगढ़, बीरवाड़ी, तला, घोसालगढ़, भुरप या सुधागढ़, कांगोरी (महाद से 12 मील दूर) और सर्वपरि राइड़ी (रायगढ़) के अज्ञेय दुर्ग पर कब्जा कर लिया। कोलाबा का आधा भाग उन्होंने अबीसिनियाईयों से छीन लिया। 1659 ई. में शिवाजी के किलों की संख्या 40 थी। 14 मई 1657 ई. को शम्भू जी का जन्म हुआ।

बीजापुर नवाब के द्वारा शिवाजी को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने अफजल खां का भेजा जाना:-

सितम्बर 1659 के आरम्भ में अफजल खां ने बीजापुर से कूच किया। उसने भीमा नदी तक 65 मील चलकर फाल्टन जिले में प्रवेश किया, वहां के देशमुख से 2 लाख रूपये लेकर उसकी जान बख्श दी। मलवदी में डेरा डालकर अफजल खां ने अपनी आंतक की नीति जारी रखी। उसने पुना पहुचकर शिवाजी पर आक्रमण करने की नीति बनाई। शिवाजी इसकी भनक पाते ही मावली प्रदेश के जवाली जिले में अपना डेरा जमाया, जो वनाच्छादित एवं उबड़-खाबड़ था। शिवाजी की सारी सैन्य शक्ति, वहां केन्द्रित हो गई। मावल प्रदेश के मोरिया जो, पहले ही शिवाजी से नाराज थे, अफजल खां के सहयोगी हो गये। अफजल खां ने अपना निवास स्थान प्रतापगढ़ में बना लिया था। उसने कृष्णा जी भास्कर को एक आकर्षक संदेशा लेकर शिवाजी के पास भेजा, जो इस प्रकार था, ''तुम्हारे पिता लम्बे समय तक मेरे मित्र रहे हैं, इसलिये तुम मेरे लिये अजनबी नहीं हो। यहां आकर मुझे मिलो और मैं अपने प्रभाव से, आदिलशाह से कोंकण एवं तुम्हारे अधीन किलों, पर तुम्हारे अधिकार को, मान्यता दिलवा दूंगा। मैं अपनी सरकार द्वारा तुम्हें अधिक मान एवं सैनिक सम्मान दिला दूंगा । यदि तुम दरबार में आना चाहो तो तुम्हारा स्वागत है। यदि तुम स्वयं ना उपस्थित होना चाहो तो इसकी भी छूट मिल जायेगी।'' शिवाजी ने कृष्ण जी भास्कर वार्ता का निमंत्रण लेकर आया था। पंताजी गोपीनाथ को शिवाजी ने अपना दूत बनाकर कृष्णा जी के साथ वापस शर्तो के साथ भेज दिया। शर्ते थी, अफजल उनको उनके घर के निकट किसी स्थान पर आकर मिले एवं उनकी सुरक्षा एवं भविष्य की रक्षा के लिये खान स्वयं जिम्मेदारी ले ले, तो वह मिलने के लिये तैयार हैं। अफजल यह रियायत देने के लिये तैयार हो गया। रटोंडी दर्रे से होकर पार (महाबलेश्वर पठार के 'बम्बई पांइट' से नीचे) पहुंचा, जो प्रतापगढ़ के नीचे एक मील, गांव था। उसके साथियों ने कोइनर नदी के उद्​गम के निकट, घाटी की गहराई में, जल के प्रत्येक कुन्ड के निकट, अलग-अलग समुह में डेरा डाला। खान के आने की सूचना पाकर गोपीनाथ पहाड़ी पर भेजा गया। भेंट दूसरे दिन होने वाली थी, स्थान प्रतापगढ़ किले से नीचे थी, जहां से कोइना नदी नीचे की ओर दिखाई देती थी। यहां शिवा ने तम्बू खड़े किये, अत्यंत आकर्षक मंडप बनवाया, जिसमें रंगीनकालीन एवं गद्दे बिछाये गये। परिदृश्य शाही अतिथि के स्वागत सा बनाया गया था।

शिवाजी ने भेंट के लिये तैयार होते वक्त, सिर की रक्षा के लिये, अपने साफे के नीचे लोहे की टोपी एवं चोगे के नीचे जंजीरों का कवच पहन रखा था, जो दिखाई नहीं पड़ता था। उनके रक्षा के हथियार अदृश्य थे, बांये हाथ में दो ऊंगलियों से ''बाघनखा'' (लोहे के नाखून नुमा अस्त्र) पहने हुये, एवं दांयी आस्तीन में 'बिछवा' नामक पतला परन्तु तेजधार छुरा छिपा हुआ था। उनके साथ अंगरक्षक के रुप में केवल 2 आदमी थे। जीव महाला एवं शम्भू जी कावजी दोनों एक तलवार एवं एक ढाल लिये हुये थे। ये उच्चकोटि के हिम्मती एवं फूर्तीले थे।

शिवा - अफजल भेंट - अफजल की हत्या (10 नवम्बर 1659) -

अफजल खां पार नामक गांव से शिवाजी से मिलने चल पड़ा और गोपीनाथ के आपत्ति पर, अपने एक हजार से अधिक अंगरक्षकों को छोड़, केवल अपने दो अंगरक्षकों के साथ, शिवाजी जैसे चल पड़ा एवं शामियाने में प्रवेश कर गया। संयद बांदा को देखकर शिवाजी रुक गये, उसे शामियाने से हटा दिया गया, तब शिवाजी ने शामियाने में प्रवेश किया। दोनों पक्ष के चार आदमी थे - स्वयं अधिपति, दो हथियारबंद अनुचर और एक राजदूत। बाह्मरुप से शिवाजी निहत्थे, उसके विपरीत अफजल ने कमर पर तलवार एवं कटार बांध रखी थी। विजयी एवं विजीत के समान। अनुचर नीचे ही खड़े रहे, शिवाजी ऊंचे मंच पर चढ़े और अफजल को सलाम किया। खान अपने स्थान से उठा, कुछ कदम आगे बढ़ाकर शिवाजी को अपने आलिंगन में बन्द कर लिया। शिवा-अफजल के कंधों तक ही आये। अपनी कटार निकलाकर अफजल ने शिवा के बगल में भोंक दिया, कवच के कारण वार खाली गया। शिवाजी ने खान के कमर के दूसरी ओर बाहें डालकर ''बाघनखा'' से उसकी आंते चीर डाली, दांये हाथ से 'बिछुवा' अफजल के बगल में भोंक दिया। घायल अफजल ने अपनी पकड़ ढीली की, शिवाजी बंधन मुक्त हो अपने आदमियों की ओर भागे।

खान ने शोर मचाया ''गद्दारी! कत्ल! मदद करो! मद्द करो!'' दोनों अनुचर दौड़ पड़े, सैयद बांदा जो खान के रक्षार्थ आया, ने शिवाजी पर सीधे तलवार से वार कर शिवाजी के साफे के दो टुकड़े कर, फौलादी टोपी पर निशान बना दिया। जीव महाला ने आगे बढ़कर, बांदा के दाहिने हाथ को काट दिया और उसे मौत के घाट उतार दिया। इस बीच अनुचरों ने खान को, पालकी में बिठाकर, अपने शिविर की ओर ले जाने की असफल कोशिश की। शम्भु जी, कावजी ने अनुचरों के पैर काटकर, अफजल का सिर धड़ से अलग कर शिवाजी के सामने जयघोष करते हुये ले आये।

खान की हत्या के बाद, प्रतापगढ़ किले में तोपदागा गया जो जीत के संकेत थे। नीचे घाटी में शिवाजी की सेना ने अफजल के मातहत आये' बीजापुरी सेना को युद्ध में हराकर उन्हें लूट लिया। अफजल खान के विनाश पर मराठों में अति हर्षोल्लास मनाया गया, यह उनके राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का आरम्भ था। बीजापुर की पराजय पूर्ण हुई। सेनापति मारा गया, सेना का नाश हो गया।

औरंगजेब द्वारा शाइश्ता खां को शिवाजी के विरूद्ध भेजा जाना -

शिवाजी ने अफजल खां की हत्या कर उसकी सेना का हरा, रुस्तमें-जमां और फजलखां की सम्मिलित सेना को हरा कर कोल्हापुर जिले के पन्हाला एवं रत्नागिरी को अपने अधिकार में कर लिया। शिवाजी को अली आदिलशाह द्वितीय की आज्ञा से सिद्दी जौहार ने, जो कि अबिसीनियाई दास था। 15,000 सैनिकों की सहायता पन्हाला के किले में घेर लिया। शिवाजी ने विलम्ब ना करते हुये, वहां से निकल जाना बेहतर समझा। बीजापुरी सेना से युद्ध करते हुये, हरिदास मावल का देशपांडे बाजीप्रभु शहीद हुये, पर शिवाजी सुरक्षित विशालगढ़ के किले पर पहुंच गये। 

जुलाई 1659 में औरंगजेब ने अपनी दूसरी ताजपोशी के अवसर पर प्रशासनिक फेर बदलकर शाहजादे मुअज्जम की जगह शाइस्ताखां को दक्षिण का वाइसराय बनाया। जो काम उसे सौंपा गया उसमें दक्षिण-पश्चिम में सर उठा रहे मराठा सरदार शिवाजी का दमन भी प्रमुख था। इस कार्य को पूरा करने में शाइस्ताखां को बीजापुर राज्य का भी सहयोग मिला। शिवाजी को अपनी सेना, दो भागों में बांटने के कारण, दोनों ही क्षेत्रों में हार का सामना करना पड़ा। 

पन्हाला किले के बीजापुर द्वारा छीने जाने के एक महीने बाद, 15 अगस्त को मुगलों ने चाकन के किले पर, जो पूना से 18 मील दूर उत्तर में था, अपना अधिकार जमा लिया। 1660 ई. में चाकन के किले को अपने अधिकार में ले लिया। अगले वर्ष शाइस्ता खां ने अपना ध्यान कल्याण जिले या उत्तरी कोंकण की ओर लगाया। मई 1660 में शाइस्ताखां ने पुणे को अपने कब्जे में कर लिया था और अपना शिविर वहां रखा, साथ ही पुणे के सबसे अच्छे घर को अपना निवास बनाया। शिवाजी के शिशुकाल का मामूली सा घर था, शाईस्ताखां का जनानखाना भी उसके साथ था। शिवाजी ने अपने 4200 चुने हुये, आदिमयों के साथ आधी रात को खां के शयनागार में हमला बोल दिया, खां का अंगूठा कट गया, वो घायल हुये। हमले में उसका पुत्र मारा गया। शिवाजी अचानक हमला कर फरार हो गये। यह आक्रमण 5 अप्रैल 1663 को किया गया। औरंगजेब को जब इस हमले का पता चला तो खां को बंगाल भेज दिया गया, बतौर दन्ड के। शहजादा मुअज्जम पुन: दक्षिण का वाइसराय बना उसने अपने प्रिय जसवंत सिंग की नियुक्ति पूना में कर दी। जसवंत सिंह असफल होकर वापस औरंगाबाद चला गया।

सूरत की पहली लूट

6 जनवरी सन् 1664 मंगलवार की सुबह 11 बजे शिवाजी सूरत पहुंचे और बुरहानपुर या पूर्वी द्वार पर अपना डेरा डाला। बुधवार से शनिवार तक घमासान युद्ध होता रहा। मराठा सेना सूरत की बेशुमार दौलत, लुटती रही। मुगल सेना के आगमन का समाचार सुनकर शिवाजी रविवार 10 जनवरी को अपनी सेना लेकर वापस कोंकण की ओर लोट गये। 17 तारीख को मुगल सेना सूरत का डरपोक गवर्नर किले से बाहर निकला। 

शिवाजी के पिता शाहजी की मृत्यु

23 जनवरी 1664 को बासवपत्तन जिले में तुंगभद्रा के तट पर शिकार की एक दुर्घटना के कारण शाहजी की मृत्यु हुई। उसका छोटा पुत्र व्यंकोजी (मां तुकोबाई) उसकी समस्त निजी सम्पत्ति तथा मैसूर और पूर्वी कर्नाटक के इलाके का मालिक हुआ।

जयसिंह की शिवाजी के विरूद्ध नियुक्ति -

शाइस्ताखां की असफलता एवं सूरत की लूट के बाद औरंगजेब और उसके दरबारियों को बहुत शर्म एवं क्लेश हुआ। अपने जन्म दिन पर (30.09.1664) औरंगजेब ने मिर्जाराजा जयसिंह की नियुक्ति शिवाजी को अधीन में करने के लिये की। 10 फरवरी 1665 को जयसिंह औरंगबाद जाकर, शहजादा मुअज्जम से मिला जो उस समय का वाइसराय था। उनसे विचाराविमर्श कर जयसिंह, 3 मार्च को पूना पहुंच, महाराज यसवंतसिंह से चार्ज सम्हाला। इस अभियान के समय जयसिंह की उम्र 56 वर्ष थी। उसने कुटनीति से काम लेते हुये, बीजापुर के सुल्तान को अपनी ओर मिला लिया। गोवा की पुर्तगाल शासन को, शिवाजी के विरूद्ध गुजरात से समुद्री हमला करने राजी कर लिया गया। अफजल खां का पुत्र फज्जलखां, अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने, शिवाजी के विरूद्ध जयसिंह से मिल गया। यहां तक की शिवाजी के मातहतों को घूस और प्रलोभन देकर जयसिंह ने अपने तरफ करने में कामयाबी हासिल की, जिसमें आत्माजी एवं कहरकोली जिन पर पुरंदर किले की रक्षा की जिम्मेदारी थीं रामा एवं हनुमंत नामक सूपा के 2 कप्तानों ने जयसिंह का साथ दिया। जावली के जमींदार चन्द्रराव, अम्बाजी गोविंद राव ने मुगलों का साथ दिया।

जयसिंह का अभियान एवं पुरन्दर की संधि

14 मार्च को जयसिंह ने अपना अभियान प्रारम्भ किया। पुरन्दर किले के माचि (निचले किले) वंज्रगढ़ पर आक्रमण करने का निर्णय लिया। 14 अप्रैल, 1665 को वज्रगढ़ में जयसिंह ने विजय हासिल की। चारों ओर से पुन्दर के किले की घेरेबन्दी कर जयसिंह ने, आसपास के इलाकों में लुटपाट की। मुगलों की इस घेरेबंदी को तोड़ने के प्रयास में मुरारबाजी शहीद हुये। अंत में जयसिंह का लगातार दबाव सफल हुआ, पुरन्दर चारों ओर से घिरा था। वक्त की नजाकत एवं कुटनीति के आधार पर 20 मई को शिवाजी ने मंत्री रघुनाथराव को जयसिंह के पास भेजा। बिना शर्त आत्मसमर्पण का संदेश जयसिंह से मिला। 11 जून को शिवाजी जयसिंह से मिले एवं उनसे संधि हो गई। राजगढ़ सहित 12 किले शिवाजी के साथ इस शर्त पर छोड़ा गया कि शिवाजी बादशाह को सेवा प्रदान करेगा और उनके प्रति स्वामीभक्त रहेगा। 

पुरन्दर संधि के अनुसार शिवाजी ने बादशाह ने औरंगजेब को निम्नलिखित किले सौंपे,
  1. रुद्रमाल अथवा वज्रगढ़
  2. पुरन्दर
  3. कोन्दाना
  4. रोहरा
  5. लोहगढ़
  6. ईसागढ़
  7. टंकी
  8. खडकवासला
  9. टिकोना
  10. मान्हुली
  11. मुरंन
  12. खीरदुर्ग
  13. भंडार-दुर्ग
  14. तुलसी खुल
  15. नरदुर्ग
  16. खैगढ़या अंकोला
  17. मार्गगढ़ अथवा अत्र
  18. कोहज
  19. बसंत
  20. नंग
  21. करनाल
  22. सोनगढ़ और
  23. मानगढ़
शिवाजी - औरंगजेब भेंट, बन्दी बनाया जाना बंदीगृह से निकल भागना

जयसिंह वचनबद्ध था, शिवाजी को बादशाह के सामने पेश करेगा। पुरन्दर की संधि में इसका कोई जिक्र नहीं था। जयसिंह ने शिवाजी के बहुत तरह से प्रलोभन दिये पर वे राजी नहीं हुये। मुगल दक्षिण का, वाइसराय बनाया जाना उनमें से प्रमुख था। राजा मानसिंह का पुत्र रामसिंह जो इस समय बादशाह की राजधानी आगरा में था, ठहरने एवं सुरक्षा व्यवस्था करेगा, इस समझाइश के साथ शिवाजी अपने पीछे राजप्रबन्ध की व्यवस्था कर रायगढ़ से 5 अप्रैल 1666 को आगरा के लिये रवाना हुये। साथ में ज्येष्ठ पुत्र शंभुजी भी था। 11 मई 1666 को शिवाजी, औरगांबाद होते हुये, आगरा के निकट मानकचन्द में पहुंचे। 1658 में शाहजहां को बादशाह की गद्दी से उतार आगरे के किले में कैद कर, औरंगजेब बादशाह बना था। शाहजहां के जीते जी दिल्ली से आगरा कभी नहीं आया। 22 जनवरी 1666 को शाहजहां की मृत्यु हुई, तब औरंगजेब आगरा आया, अपनी राजधानी दिल्ली से आगरा लाया, प्रथम दरबार लगया। 12 मई को औरंगजेब का जन्मोत्सव, बड़े धूमधाम से मनाया गया। 12 मई 1666 को शिवाजी आगरा पहुंचे, जहां उनका डेरा जयसिंह के पुत्र समारोह आम से होकर दीवानेखास में चल रही थी। वहां शिवाजी को घोर अपमान का सामना करना पड़ा, अपमानित होकर शिवाजी दरबार छोड़ चल दिये। दुबारा औरंगजेब से मिलने नहीं गये, शम्भू जी को भेज दिया।

दरबार में जयसिंह से जलने वाले एवं शिवाजी द्वारा पराजित, जसवंतसिंह ने बादशाह को शिवाजी के विरूद्ध उकसाया। शाइस्ताखां की बहन मुख्य वजीर जफर खां की पत्नी थी। अपने भाई के साथ किये गये कृत्य का बदला शिवाजी से लेने कहा। सम्राट की माननीय बहन जहांनारा, जिसे सूरत उपहार स्वरुप शाहजहां ने दिया था, को शिवा ने लूटा था, वह भी उसे उचित दंड दिलवाने भरसक प्रयत्न करने लगी। गुप्त परिषद में निर्णय लिया गया। कि शिवाजी को बन्दी बना लिया जाये। बाद में उसकी हत्या कर दी जाये। शिवाजी अपने डेरे पर ही बन्दी बना लिये गये।

तीन महीने तक कैद में रहने के बाद, बीमारी का बहाना बना, रोज शाम घर से बाहर ब्राम्हणों, साधुओं और दरबारियों को मिठाई भेजी जाने लगी। उन्हीं मिठाई के डलिये में बैठकर, शिवाजी 19 अगस्त 1666 को, आगरा से शम्भु सहित भाग निकले। मथुरा में शंभु जी को छोड़, वे आगे बढ़े। सीधे राजगढ़ पहुंचे। जबकि मालवा खानदेश, गुजरात होते हुये, रायगढ़ की 670 मील की दूरी वक्राकार रास्ते से तय की।

शिवाजी आगामी तीन वर्षो (1666-69) तक अपनी बीमारी की वजह से एवं अपनी शासन - प्रशासन की व्यवस्था सुदृढ़ करने में लगे रहे। जयसिंह की मृत्यु के पश्चात दक्षिण के वायसराय शहदाजे मुअज्जम और उनके सहयोगी जसवंतसिंह से संधि के तहत शंभु को औरंगाबाद भेज उनकी सेवा में लगा दिया।

मुगलों से पुन: युद्ध:-

(1670) इस आक्रमण से शिवाजी ने मुगलों से पुरन्दर की संधि में सौपे गये, किलों में से कुछ किले हासिल किया, जिसमें कौन्दना के किले में कब्जे के समय तानाजी मालसूरे शहीद हुये, उनकी याद में किले का नाम 'सिंहगढ़' का किला रखा गया। शिवाजी ने कहा ''गढ़ आला-पण सिंह गेला''। 8 मार्च 1670 को पुरन्दर का किला वापस ले लिया गया। चन्दौर के किले में कब्जा कर शाही खजाने को लूटा गया। शिवाजी ने कल्याण - भिवंडी के थानेदार ऊजबक खां को मारकर, वहां अपना अधिकार जमा लिया। कोंकण में भी कब्जा कर लिया गया, नांदेड़ का फौजदार शहर छोड़कर भाग खड़ा हुआ। शिवाजी ने दक्षिण के वाइसराय शहजादे मुअज्जम और दिलेर खां के आपसी मतभेद का भारी फायदा उठाया।

सूरत की दूसरी लूट (1670 ई.)

3 अक्टूबर को शिवाजी ने दूसरी बार सूरत को लूटा। वापस लौटते हुये, शिवाजी ने 17 अक्टूबर 1670 को दिन्दोरी में मुगल सेनापति दाऊद खां से युद्ध किया, जो शहजादा मुअज्जम के आदेश पर सूरत की लूट रोकने त्रिम्बक (जिला नासिक) के किले में कब्जा कर लिया। दिसम्बर में मराठा सेना ने खानदेश पर हमलाकर अविंत, माकंड़ा, रावला, बगलाना एवं जावला किलों पर कब्जा कर लिया। सन् 1670-71 में बुंदेलखंड महोबा के सरदार छत्रसाल ने शिवाजी से भेंटकर उसके (शिवाजी के) सेना में रहने का निवेदन किया। लेकिन सम्मान पूर्वक यह निवेदन अस्वीकार कर दिया गया। अप्रैल में बहादुर खां 5000 घोड़ो का रिसाला लेकर सूरत आ गया, क्योंकि नगर पर शिवा के पुन: आक्रमण की आशंका थी।

मुगलों और बीजापुर से संघर्ष - (1670-74)

मराठों ने इस युद्ध में महावत खां और दाऊद खां को जनवरी -1671 में शिकस्त दी। 71-72 में साल्हीर का युद्ध मराठों के पक्ष में गया। 1672 में मराठों ने इखलास खां पर विजय, मुलेर पर अधिकार एवं पूणे से बहादुर एवं दिलेर के निर्वासन से मराठों का मनोबल बहुत बढ़ा। 1672 में कोलि राजा विक्रम शाह को परास्त कर 'जव्हार' किला छीन लिया। रामनगर पर अधिकार किया।
पुरन्दर की सन्धि (1665) में सौंप गये, किलों को शिवाजी ने पुन: अधिकार में ले लिया। दक्षिण में 1673 में पन्हाला और 1675 में कोल्हापुर और फौंदा पर विजय हासिल कर शिवाजी ने अपनी शक्ति मजबूत कर ली।

वाजी का राज्याभिषेक - (1674-76)

शिवाजी अपनी स्वतन्त्र अस्तित्व को स्थापित करने एंव मुगलों एवं बीजापुर की अधिनस्थ ना होने के प्रमाण स्वरूप् अपना राज्यभिषेक चाहते थे। क्योंकि मुगल उन्हें एक जमींदार एवं आदिलशाह (बीजापुर नवाब) उन्हें एक सामन्त, जागीरदार का बागी बेटा समझते थे। शिवाजी किसी राज के साथ राजनैतिक स्तर पर समानता के अधिकारी न थे। उनके प्रतिद्वंदी मराठे भी, उनको अपने शासक के रूप में स्वीकार नहीं करते थे। सम्पूर्ण-प्रभुत्व-सम्पन्न शासक बनने के लिये राज्याभिषेक आवश्यक था।

राजनैतिक समानता के लिये राज्याभिषेक के निर्णय में, हिन्दु धर्म की सामाजिक असामानता आड़े हाथों आ गई। वर्ण व्यवस्था के आधार पर, (जो कि हिन्दु धर्म की रीढ़ की हड्डी है) राज्याभिषेक का अधिकार केवल क्षत्रियों को है। लोकमत के अनुसार भोंसले मराठा न ही द्विज थे, न क्षत्रिय। शिवाजी के पूर्वज भूमि जोतने वाले किसान थे। अर्थात वर्ण व्यवस्था के अनुसार चौथे वर्ण, अर्थात शूद्र थें महाराष्ट्र के ब्राम्हणों ने, शिवाजी का राजतिलक कर उन्हें चक्रवर्ती राजा घोषित करना, इसी आधार पर अस्वीकार कर दिया। शिवाजी जिन्होंने अपनी सारी जवानी घोड़े की पीठ पर (युद्ध करते हुये) बिताई, क्या यह उनके क्षत्रिय होने का पर्याप्त प्रमाण नहीं था ? क्या भूमि जोतने वाले किसान की पत्नियां, एक राजा को जन्म देने योग्य नहीं हैं? लेकिन राज्याभिषेक के लिये हिन्दु मान्यताओं को मानना पड़ा। शिवाजी की वंशावली (गलत) बनाकर रहें, उदयपुर के महाराजाओं एवं रामचन्द्र जी के सूर्यवंश से जोड़ा गया। तब जाकर बनारस के ब्राम्हण विश्वेश्वर तैयार हुये, जिनका उपनाम गागाभट्ट था। इसके बदले गागाभट्ट को मुंहमांगी दक्षिणा (इनाम) दी गई।

गाभट्ट की स्वीकृति के पश्चात, राज्याभिषेक की जोरदार तैय्यारियां प्रारम्भ हुई। शिवाजी ने अपने राज्य की राजधानी रायगढ़ को बना लिया था। इस आयोजन के लिये 50,000 ब्राहम्ण इकट्ठे हुये, साथ ही 50,000 कर्मचारी व्यवस्था के लिये एकत्र हुये, इस तरह रायगढ़ में 1 लाख लोगों ने राज्याभिषेक सामारोह में भाग लिया। जिनमें ब्राम्हण, सरदार, राज्य के रईस, दूसरे राज्यों के प्रतिनिधि, विदेशी व्यापारी एवं आगंतुक, आमजनता, गरीब आदि थे। चार महीने तक ब्राहम्ण भोज का कार्यक्रम चलता रहा।

वाजी ने सर्वप्रथम, अपने गुरु रामदास स्वामी और अपनी माता जीजाबाई को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लिया। राजमाता जीजाबाई उस समय 80 वर्ष की थी। 28 मई 1674 को शिवाजी को 'शुद्ध क्षत्रिय' घोषित करने जनेऊ संस्कार किया गया एवं 21 मई को उनका 2 जीवित पत्नियों के साथ पुन: विवाह कराया गया। ब्राम्हणों को मुंहमांगा दान दिया गया।

6 जून 1674 को शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ। राजतिलक की रस्म मुख्य भाग 'अभिषेक' (जल से स्नान करना) और 'मुकुट' धारण करना है। शिवाजी ने गंगाजल से स्नान किया पत्नी सोयराबाई एवं पुत्र शंम्भाजी के साथ शिवाजी को सिंहासनारूढ़ कर राजमुकुट पहनाया गया। सारा माहौल शिवाजी की जय-जयकार से गुंज उठा। एक साथ अनेक तोपें दागीं गई।

यगढ़ में सार्वजनिक जुलुस निकालकर शिवाजी का स्वागत किया गया। राजतिलक की इस खुशी में एवं अपने पुत्र को राजा बना देख, अपनी जीवन की अभिलाषा पूर्ण होने पर, जीजाबाई का देहान्त 18 जून 1674 को हो गया। शोक समय समाप्त होने के बाद शिवाजी पुन: 24 सितम्बर को सिंहासन पर बैठे।

वाजी का पुन: राजतिलक:-

इसका वर्णन संस्कृत पांडू लिपि शिव-राज-राज्यभिषेक-कल्पतरू में मिला है। तांत्रिक मतावलंबियों ने वैदिक परम्परा से हुये, राजतिलक को गलत समय पर किया हुआ, निरूपित करते हुये कहा, कि गागाभट्ट को ज्योतिष का ज्ञान नहीं था। उसने राज्याभिषेक का समय गलत, एक दिन पहले तय, किया था, जब अशुभ ग्रहों का योग था। दैवीय प्रकोप से ही राजमाता जीजाबाई, महारानी काशी बाई, मुख्य सेनापति प्रतापराव थोड़े समय में ही चल बसे। पुन: राजतिलक पर टिप्पणी करते हुये, प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता सर जदुनाथ सरकार, अपनी पुस्तक में लिखते हैं, कि ''इस घटना से हमको ब्राम्हणों में भिक्षा लोभ, लोलुपता और सामाजिक विषमता का वर्णन मिलता है।'' 24 सितम्बर को पुन: शिवाजी का राजतिलक तांत्रिक मत के, निश्चलपुरी द्वारा किया गया। ब्राम्हणों ने एक बार फिर शिवाजी से खूब धन ऐंठा। शिवाजी के राजतिलक में सभासद के अनुसार 1 करोड़ 42 लाख होन व्यय हुये। राजतिलक के बाद राजकोष खाली हो गया।

शिवाजी और उनकी नौसेना:-

राजमर्मज्ञ के रुप में शिवाजी की प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाण मिलता है, कि उन्होंने नौसेना एवं नौसैनिक अड्डों का निर्माण बड़ी कुशलता से किया। कल्याण एवं भिवंडी की सकरी खाड़ी में अपने स्वयं के जहाज बनाना शुरु कर दिये। पुराने नौसैनिक अड्डों की मरम्मत एं नये बनाने शुरु किये, जो बम्बई से गोवा तक के समुद्र तट स्थापित किये गये। इन अड्डों में विजयदुर्ग, सुवर्ण दुर्ग, सोनगे रत्नगिरी का बन्दरगाह, मालवन का किला (सिंधु दुर्ग) आदि। शिवाजी की नौसेना का प्रथम नौसैनिक मुख्यालय कोलाबा था। जयगढ़ में भी बन्दरगाह था। शिवाजी की नौसेना विदेशियों की लुटमार से अपने प्रजा की रक्षा करते थे। 

कर्नाटक का आक्रमण (1677-78)

हैदराबाद के कुतुबशाह से मिलने, शिवाजी ने जनवरी 1677 में रायगढ़ से प्रस्थान किया। हैदराबाद में शिवाजी ने 50000 सैनिकों के साथ प्रवेश किया। उनका भव्य स्वागत हुआ। जुलुस की शक्ल में शिवाजी का काफिला न्याय भवन (दादमहल) तक आया। जहां अब्दुल शाह कुतुबशाह उन0ण्की प्रतिक्षा कर रहे थे, सुल्तान ने आगे बढ़कर शिवाजी का आलिंगन किया और अपने पास बिठाया। गोलकुंडा के नवाब कुतुबशाह से संधि के पश्चात, शिवाजी को 3,000 होन (4,50,000 रूपये) प्रतिमाह देने तथा कर्नाटक विजय के लिये अपने एक सेनाध्यक्ष के अधीनस्थ 1000 घुड़सवारों एंव 4000 पैदल सैनिकों को भेजने तैयार हो गया। 

कर्नाटक युद्ध में सभासद द्वारा किये गये अनुमान के अनुसार शिवाजी ने लगभग 100 किले जीते थे एंव वार्षिक आय लाखों होन की थी। जिसमें जिंजी और वैलोर प्रमुख थे। कर्नाटक विजय से लगभग नवम्बर 1677 में वापस आते हुये, रास्ते में सारे दुर्ग विजीत करते हुये, जनवरी 1678 में मराठों ने बीजापुर पर कब्जा कर लिया। वापस अप्रैल 1678 को सिंहगढ़ लौटे। 

शंभुजी मुगलों से जा मिला

शिवाजी से उत्तराधिकार की लड़ाई लड़ते हुये, 13 दिसम्बर 1678 को शंभु जी, दक्षिण के मुगल वाइसराय दिलेरखां से मिल गया। लेकिन दिलेरखां की नाइंसाफी से परेशान शंभुजी पन्हाला किले पहुंचा। इससे शिवाजी को बड़ी सांत्वना मिली। लेकिन लाख समझाने के बावजूद शंभुजी ने अपने बर्ताव में कोई परिवर्तन नहीं किया। 

शिवाजी की मृत्यु

दिसम्बर 1678 के बाद शिवाजी का स्वास्थ्य गिरता गया, इसका कारण शंभुजी का वर्ताव एवं उत्तरधिकर की लड़ाई की चिंता थी। 23 मार्च 1680 को राजा को ज्वर हो आया और साथ में खून की उल्टी भी। बारह दिनों पश्चात, अर्थात 4 अप्रैल 1680 को दोपहर के समय मराठा जाति के सृजनकर्ता ने अन्तिम सांस ली और सदैव के लिये संसार में एक महान इतिहास रच गये। उस दिन चैत्र मास की पूर्णमासी थी। शिवाजी की उम्र उस समय 53 वर्ष थी। 

शिवाजी की रानियां
  1. साई बाई (निम्बालकर की पुत्री) (माता शंभुजी - जन्म 14.05.1657)
  2. सोयरा बाई (शिर्के की पुत्री)-(माता राजाराम - जन्म 24.02.1670)
  3. पुतला बाई (मोहित की पुत्री) शिवाजी के साथ सति हो गई।
  4. साकवार बाई (गायकवाड़ की पुत्री)
  5. काशी बाई
संतान:-

1. शम्भु जी 2. राजाराम 3. साखू बाई 4. अम्बिकाबाई 5. राजकुमारी बाई।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ :-

'' शिवाजी और उनका युग'' - लेखक - सर जदुनाथ सरकार

-- इति समाप्तम् --

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