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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

Dr.Durgasingh Sirmourफल व्यक्तियों के जीवन में सहयोगियो का कितना महत्व होता है इस बात को अगर करीब से देखना और समझना हो तो प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचन्द बघेल के अनयय भक्त और पथगामी डॉ. दुर्गासिंह सिरमौर के जीवन दर्शन को देखकर जाना और समझा जा सकता है। आज 92 वर्ष की अवस्था पार कर लेने के बाद भी डॉ. बघेल के प्रति डॉ. सिरमौर का समर्पण देखने को मिलता है, उनकी धुधंलती स्मतियों में डॉ.बधेल के साथ बितायें पलों, उनसे जुडी बातों और घटनाओं की ऐसी छवि रची बसी है जिन्हें सुनकर मन पुलकित हो उठता है सामाजिक सरोकार होने के कारण प्रायः उनसे मिलने और वार्तालाप करने का सौभाग्य प्राप्त होता है इस दौरान हर बार उनसे डॉ. बघेल से जुडी हुई नई बातों की जानकारी प्राप्त होती है। स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गांधी के साथ उनके आश्रम में बिताए दिनों, जेल में भोगे पलों और उस दौर के महान स्वतंत्रता सेनानियों के सानिध्य में गुजरे क्षणों को भी वे याद करने से नहीं चूकते।

1 सितंबर 1915 को कृषक परिवार में जन्में डॉ. दुर्गासिंह को उनके पिता थानूदास ने ग्राम में पड़ रहे लगातार अकाल के बावजूद भी रायपुर पढ़ने के लिये भेज दिया, समाज द्वारा संचालित भोला कुर्मी क्षत्रिय छात्रावास में उन्हें रहने के लिये जगह मिल गई, और विद्याध्ययन के लिये राष्ट्रीय विद्यालय में दाखिला। राष्ट्रीय विद्यालय असहयोग आंदोलन के दौरान शासकीय सेवा और शासकीय स्कूल छोडकर आने वाले विधार्थी एवं छात्रों के दारा संचालित था और इसके संचालक थे प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नंद कुमार दानी।

Dr.Durgasingh Sirmourयह विद्यालय पढ़ाई के साथ-साथ राष्ट्रीय भावना जागृत करने का प्रमुख केन्द्र रहा। इसलिए दुर्गासिंह सिरमौर का स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय भावना के साथ जुड़ गये। सन् 1926 में साईमन कमीशन के बहिष्कार का देशव्यापी आंदोलन हुआ रायपुर भी उससे अछुता नहीं रहा। उस आंदोलन में राष्ट्रीय विद्यालय के दो सौ विद्यार्थियों ने एक जुलूस निकाला। जुलूस राष्ट्रीय विद्यालय से निकलकर गगनभेदी नारे लगाते हुए गांधी चौक की ओर बढ़ रहा था। पं. रविशंकर शुक्ल उसका नेतृत्व कर रहे थे। जुलूस जैसे ही सदर बाजार की पुलिस चौकी के पास पहुंचा, पुलिस ने डंडे से पिटाई शुरू कर दी। बच्चे चिल्लाते रहे। साथ ही भारत माता की जय, गांधीजी की जय, बोलते रहे, लेकिन वे मैदान छोडकर भागे नहीं। उन बालकों में दुर्गासिंह सिरमौर भी थे। यहीं से उनके जीवन में ब्रिटिश सल्तनत के खिलाफ संघर्ष प्रारंभ हुआ।
1930 में गांधी जी द्वारा नमक कानून तोडने के लिए देशव्यापी नमक सत्याग्रह का रायपुर में केंन्द्र बना राष्ट्रीय विद्यालय का मैदान। इसके संचालन के लिए तत्कालीन प्रांताध्यक्ष सेठ गोविंददास जबलपुर से आए। उनकी सहायता के लिए दुर्गासिंह सिरमौर की नियुक्ति हुई। उस सात्याग्रह में सेठ जी की गिरफ्तारी हुई। अंग्रेज दु्र्गासिंह को भी पकड़कर पुलिस चौकी ले गए। वहां उन्हें थप्पड़ मारने के बाद छोड़ दिया गया। यह सत्याग्रह की दूसरी ट्रेनिंग थी। 1932 में विदेशी वस्त्र बहिष्कार का आंदोलन चला। इस आंदोलन का संचालन रायपुर जिले में डॉ. खूबचंद बघेल कर रहे थे। गांव-गांव से आने वाले सत्याग्राहियों की व्यवस्था श्री उदगीरजी किया करते थे। वे सब कीका भाई की दुकान में पिकेटिंग कर गिरफ्तारी दिया करते थे। उसे देखने बालक दुर्गा सिंह सिरमौर भी चले गए। वंहा बक्षीरूल्ला पुलिस इंस्पेक्टर की तैनाती थी। उन्होंने बालक सिरमौर को बेंत मारकर भगा दिया। वह भागकर डॉ. बघेल के यहां चले गए।

डॉ. बघेल की मां दुर्गासिंह सिरमौर के घर से आई थी, उस रिश्ते से डॉ. साहब के पूछने पर उन्होंने सही-सही बता दिया कि मझे मार कर भगा दिया गया। तो वे नाराज होकर बोले, तुम कैसे बालक हो जो पुलिस की मार से भाग कर चले आए। वहीं डटे रहना था। तबसे बालक सिरमौर भी सत्याग्रह की तैयारी में लग गया। उसका नाम भी सत्याग्रहियों की सूची में जोड़ दिया गया। उसके बाद सिरमौर जो अपने चार साथियों के साथ पिकेटिंग करने गए, वहां वे सब के सब गिरफ्तार कर लिए गए। अदालत ने उन चारों को चार-चार माह की कड़ी कैद की सजा सुना दी। वहां कुछ ऐसे भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जो जेल के कानून को मानने तैयार नहीं थें। वे जेल में भी खादी का कपड़ा ही पहने रहना चाहते थे और मात्र कम्बल लपेट कर रहते। उन्हें एक अलग बैरक में रखा जाता था। उनमें थे महंत लक्ष्मीनारायण दास, डॉ खूबचंद बघेल, अनंतराम बर्छिहा, माणिकलाल चतुर्वेदी आदि। बालक दुर्गासिंह सिरमौर को उस बैरक में झाडू लगाने का काम दिया गया। जेल से छूटने के बाद घर न जाकर सिरमौर कांग्रेस भवन में रहकर काम करने लगे। वे कांग्रेस भवन के कर्मचारी बन गए।

सन् 1938 में प्रांतीय विधानसभा चुनाव में पं.रविशंकर के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार का गठन हुआ। श्री शुक्ल के कहने पर वे अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ वर्धा (महाराष्ट्र) गए। उन्होंने यहां हाथ कागज बनाने, तेलघानी से तेल निकालने, मधुमक्खी पालने एवं ताड़ गुड़ बनाना सीखा। इसी दरम्यान उन्हें दो माह बापू के साथ गुजारने का संयोग मिला। दुर्गाजी आश्रम से जब रवाना होने लगे तो उन्होंने बापू का आशीर्वाद के लिए उनके सिर पर हाथ रखा तो दुर्गाजी का पूरा शरीर रोमांचित हो गया। उनका कहना था कि उस समय प्राप्त अवर्णीय सुख आजतक कभी प्राप्त नहीं कर सके। उनकी नजर में बापू भगवान के अवतार थे।

सन् 1940 के व्यक्तितगत सत्याग्रह में सिरमौर को शिरकत का मौका मिला। उनका सत्याग्रह ग्राम बंगोली से प्रारंभ हुआ। विशाल सभा हुई। जिसमें डॉ. खूबचन्द बघेल तथा दाउ तोपसिंह नायक के भाषण हुए। गिरफ्तारी न होने पर सभी सत्याग्रही पैदल दिल्ली के लिए कूच किए। दु्र्गासिंह के साथ भुजबलसिंह, रामगोपाल भारतीय व गिरवर नायक थे उनका माग कवर्घा जबलपुर होकर दिल्ली पहुँचा। कवर्घा के आगे जंगल शुरू हो गये थे जो आगे भुआविछिया तक था, इस दौरान रास्ते में जो तालाब घाट गली-कूचे आते उनकी सफाई में लग जाते, अदिवासी इस टोली का भोजन का प्रबंध करती इस टोली को आगे होशंगाबाद में हिरासत में ले लिया गया, और रायपुर जेल लाकर नौ दिन बाद रिहा किया गया दूसरी बार सत्याग्रह करने पर जबलपुर में गिरफ्तार कर किया गया फिर रायपुर जेल लाकर 15 दिनों बाद छोड़ा गया। उन्होंने जब तीसरी बार सत्याग्रह किया तो उन्हें दो महीने की सजा देकर नागपुर जेल में रखा गया। जहाँ प्रदेश के वरिष्ठ नेता पं. रविशंकर शुक्ल, सेठ बृजलाल बियाणी, किशोरीलाल मसरूवाला, भाई भवानीशंकर, दादा धर्माधिकारी, संत तुकडोजी महाराज, कन्हैयालाल बाजारी, हजारीलाल वर्मा, गिरिजाशंकर मिश्रा, कालूराम चंद्रवंशी, भुजबल सिंह, जगन्नाथ बघेल, महंत वैष्णवदास जी आदि थे। नागपुर जेल से रिहा होने पर सिरमौर महंत लक्ष्मीनारायण दास जी के लिए जेल में बंदी 9 महान नेताओं के पत्र लाए रामचंद्र देशमुख के बुलाने पर सिरमौर जी नागपुर गए। वहां देशमुख जी सांइस काँलेज में बीएससी पढ़ रहे थे। वे क्रांतिकारियों से जुड़े थे। उनका सहपाठी एक बंगाली युवक बम बनाने का प्रयोग करता था। सिरमौर उनसे बम बनाना सीखने लगे। एक दिन बम विस्फोट हो गया। पुलिस चौकन्नी हो गई। सिरमौर जी नागपुर छोड़कर रायपुर आ गए। अब आया 1942 का आंदोलन गांधी जी का करो या मरो का आंदोलन। दुर्गासिंह सिरमौर, जगन्नाथ बघेल और भुजबल सिंह तीनों रणबांकुरे निकल पडे आंदोलन के गति को तेज करने। वे सरकारी मिशनरी को नष्ट करने की योजना बनाने लगे। ब्रिटिश शासन सजग था। रेल की पटरी पर चलने वालों को गोली से उड़ा देने का आदेश था। इनकी योजना कोल्हान नाले पुल को उड़ा देने की।

इसी बीच भुजबलसिंह की गिरफ्तारी के लिए अंग्रेज सार्जेन्ट ने खोज निकाला, दुर्गासिंह रायपुर आने के लिए सिलीवरी स्टेशन आये थे वहीं गिरफ्तार कर लिए गये। रायपुर स्टेशन पर फौज से घिरे रायपुर केस के बंदी भूपेन्द्रनाथ मुखर्जी मिले उन्हीं के साथ उनको भी रायपुर जेल भेज दिया, अदालत में एक वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई। जेल से रिहा होने के बाद दो वर्ष निगरानी कैद के रूप में रहे, गांव छोड़कर जाने पर थाना जाकर जानकारी देनी पड़ती थी। लम्बे संघर्ष के बाद आजादी का सूरज उगा, पर भारत विभाजन और गांधी की हत्या ने डॉ. दुर्गासिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी के दिल को विदीर्ण कर दिया वे चुप कैसे बैठ सकते थे।

गांधी जी रचनात्मक काम में तो शरू से ही लगे रहे इसीलिए रायपुर जिला सर्वोदय मंडल के मंत्री बनाये गये। रामनाथ दुबे अध्यक्ष थे, उनके समय बहनों की एक अखिल भारतीय पदयात्री टोली निकली उसमें असम, बंगाल, सिंध तथा पंजाब की बहनें थी। उनके स्वागत सत्कार यात्रा और प्रबंध की जिम्मेदारी सिरमौर को सौंपी गई थी। सिरमौर गो हत्या बंदी आंदोलन में भी काफी सक्रिय रहे। घाटकोपर में चल रहें देवनार सत्याग्रह में भी वे भाग ले आए। पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन में प्रारंभ से ही सक्रिय रहे। स्वतंत्र भारत में किसानों के हित में उनके उत्पादनों के उचित दाम मिलें, इसके लिए सत्याग्रह कर जेल हो आए, बाबरी मस्जिद एवं रामजन्म भूमि विवाद के हल के लिए भी वे अयोध्या तक यात्रा कर आए। आज 92 वर्ष की उम्र में भी देशहित में कुछ करते रहने की तमन्ना में कोई कमी नहीं आई है इसलिए वे अपने स्तर का रचनात्मक कार्य करते ही रहते हैं।

-- इति समाप्तम् --

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