| 27 सितम्बर 2009
भारत के आजादी के 'आवा' म, अपन आप ला झोंकइया सेनानी मन के पांत मं, डॉ. खूबचंद बघेल के नांव ह, छत्तीसगढ़ी जमात मं अगुवा हे। ऊंखर त्याग अऊ बलिदान के कहिनी ह आज घर-घर मं सुनाय जाथे।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार, गांधीवादी चिंतक समाजसेवी श्री केयूरभूषणजी
डॉ. खूबचंद बघेल, छत्तीसगढ़ अंचल के जाहिरा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यें। एक पोठहर किसान के बेटा, सरकारी नौकरी के बड़का ओहदादार, नामकड़ी डॉक्टर रहिन। तेन मान-सम्मान के हैसियत ल छोंड क़े, सुराज के लड़ई म कूद परिन। अकेल्ला नहीं माई पिल्ला। घर गोंसईन, दाई, भाई, कका, ममा, सबे मिलाके एक परिवार के आठ झन सुराज के लड़ई म जूझगें। ओखर जनम गांव 'पथरी सुराज के लड़ई के किल्ला बनगे।
अकेल्ला सुराजे भर बर नइ लड़िस। देश ल ठाहिल बनाए बर ओकर जउन कुछु कमजोरी रहिस तेला दुरिहा करब म घलो लगगें। उन जानत रहिन के देश म एकता नइ रइहीं, एक पिलोर बन के नइ रइहीं, तव बिदेसी सरकार ल खेदारे कईसे सकहीं। उन तो हमन म भिन्नाफूटी करके तो राज करथें। हमला धरम के नाव लेके, जात के नाव लेके लड़वावत रथें। छुवाछूत के रोग ह हमरे भाई-बहिनी मन ल जेमन हमर समाज के धारन हें तेही मन ल हमर ले दुरिहा कर देए हें। उंखर बिन हम कइसे सजोर होए सकबो। सबल एक करेके उजोग करिन।
छत्तीसगढ़ के दुखाए मन के पीरा ह उंखर मन म भारी पीरा उपजार देए रहीसे। उन गुनत रहयं, इन कईसे सजोर होही। ईमानदारी के तो इन मूरत हें, कभू लबारी-झबारी तो इन बोलेच नई सकंय। भले उनला भुगते बर पर जय। फेर निच्चट सिधवा हें इन। आज के दुबचल बिच्छल मनखे मन इंखर सरबस लूट लेथें। इन अपने घर म पराए बरोबर रखें। मर-मर के कमाथें फेर पेट भर कभू खाए नई सकयं। ए दसा ह उनला अड़बड़ जियानय। गुनंय ''हे भगवान, हम छत्तीसगढ़िया मन ल कोन माटी म बनाए हस, जेन अपने राज म दुखाए रथें अउ इहें जेन बेपारी हें, रोजगरी हें तेन राज करथे। कभू हमरो दिन लहुटही का। उन इहां के मनखे मन बर हाना जोर डरे हें, 'आगू जूता पीछू बात, तब आवय छत्तीसगढ़ हांत' एहू ल इहां के मनखे मन सहि लेथें। इनला 'स्वाभिमानी' कब बनाबे भगवान, छत्तीसगढ़िया मन म सब गुन गे फेर स्वाभिमान के कमती हे। 'स्वाभिमान' के बिन छत्तीसगढ़ जाग नई सकय। ओला स्वाभिमानी बनाए बर परही। ओह परबुधिया हे। उनला चतुरा किसम के मनखे मन भुलवार के उंखर सरबस लूट डरिन। इन बनिहार भुतिहार बनगें। उन उंखर सब धन दोगानी लेके उंखरे उपर राज करे लगिन।'' ए सब ल गुनके उंखर आंखी ले आंसू टपके लगय। फेर गुनिन, जब हम अपन देश ल अपन बचाए बर अंग्रेज मन संग लड़ेन तव का अपन छत्तीसगढ़ के मनखे मन ल चुहकब ले बंचाए बर नई उम्हिंयाबो। छत्तीसगिढ़या मनके मुक्ति छत्तीसतगढ़ राज बने ले होहय। छत्तीसगढ़ राज पाए ले छत्तीसगढ़िया मन म 'स्वाभिमान' जागही
शोषण मुक्त छत्तीसगढ़ राज बनाए बर, उनला सजोर बनाना जरूरी है, गुनके, इहां के भाई-बहिनी मन ल एक करे के उदिम करिस। सबले पहिली छुवाछूत मेटाए के काम ल लेइस। बिना भेद-भाव के एक पंगत म बईठ के खाब ल अपने घर ले शुरू करिस। घसनिन दाई ओखर घर म रसोई बनावय। ऊंच-नीच मेटाए बर, नाटक लिखिन। ओला खेलिन घलो। छत्तीसगढ़ी नाच-गम्मत ल एक नवा दिशा मिलिस। एखर ले समाज बदले जा सकथे। तेखर ज्ञान होइस। छत्तीसगढ़िया मन म, जवां मर्दी लानेबर 'जनरेल सिंह' नाव के नाटक लिखिन। उंखर कलम अन्याव मेटाए बर तलवार बनके चले लगिस। जेन जात म जनम लेहे रहिन हें, ओला अतका जगइन के ओह, सुराज के लड़ई ले लेके, छत्तीसगढ़ राज बनई तक, आगू बढ़के भाग लेईस। ओतके नहीं छुवाछूत मेटाए के, जात-पात अउ सब धरम के मनखे मन ओखर आन्दोलन म संग देए लगिन। हर जघा ले ''जाग रे छत्तीसगढ़ जाग'' के गोहार परे लगिस। ओखरो बर, सुराज कस लड़ई, जेल घलो गेईस। अतके नहीं मंत्रिमंडल ल छोंड़के फकीरी बाना धरलिस।
मंत्री पद छोंड़िस तेनो ह छत्तीसगढ़ के 'स्वाभिमान' जगाए बर। आज के राजनीतिज्ञ मन टिकिट पाए ले, लेके मंत्रिमंडल म जाए बर कतका कलकुत करथें। अपन स्वाभिमान ल तो उन बेंच खाए रथे। फेर डॉक्टर साहेब ह, अपन बर नहीं, छत्तीसगढ़ के 'स्वाभिमान' जगाए बर मंत्रिमंडल ल अईसे छोंड़िस जईसे, हांत म चटके माटी-धुर्रा होय। ओही बखत, जब ओला ओखरो ले बड़े मंत्री बनाए के लालच देए रहिन।
बात अईसे होइस, के सुराज होए ऊपर ले पहिली मंत्रिमंडल बनिस। तेमा उन पार्लियामेंटरी सेक्रेटरी बनाए गेईन। ओही मौका म इहां के खुशामद करईया मन, बड़का मंत्री ल थईली भेंट करेके उदिम लगईन। ओखर बर गांव-गांव चंदा उकारे बर सरकारी अमला ल लगादिन। गांव वाले मन ल ए गोठ ह भाईस नहीं। काबर के थोरके पहिली अंग्रेजी अमलदारी म ओही सरकारी ओहदादार मन 'वार फंड' बर चंदा उकारे रहिन। उनला लगिस सुराज होए ऊपर ले अईसना काबर। ते उन सरकारी अमला मन के सिकायत करे बर डॉ. बघेल मेर, उनला अपन जान के चल दिन। उंखर कहेले, ओ बात ह डॉक्टर साहेब ल घलो बने नई लगिस। उन गुनिन हमर बड़का मंत्री ह, सरकारी अमला मन मेर पैसा उकरवाव नई कहिस होहय। जानही तव ओला छेक देही। ओही भरोसा देके उन अपन बड़े मंत्री मेर जाके सब गोठ ल गोठियईन। तव उन कहिथें ''भल लगे हव डॉक्टर साहेब, ए सब चलथे'' एह कोनो बड़े बात नोहय। डॉक्टर साहेब उंखर गोठ ल सुनके अकबकागे। सुराजी नेता होके अइसे कईसे कहथें। दुखागें उन। ओतके जुवर ओखर टेबुल म मांडे क़ागज म अपन कलम निकाल के उंखर मंत्रिमंडल ले इस्तीफा देके घर आगें। उनला इस्तीफा वापिस लेये बर समझाए गेईस, बड़का मंत्री बनाए के लालच देए गेईस। ओतको म नइ मानिस तव ओखर राजनीति ल कुचल देए के डर बताए गेइस। तव ओ स्वाभिमानी, देशभक्त के मुंह ले निकरिस- ''मोर गरीबी ल थोरे लुटे सकहीं।'' एही स्वाभिमान ल सब छत्तीसगढ़िया भाई-बहिनी मन म, जगाए खातिर जिंदगी भर लड़त रहिस, ते पाके डॉ. बघेल छत्तीसगढ़ के 'स्वाभिमान' कहे जाथें।





















