| 27 सितम्बर 2009
मैं ह जब ले होस सम्हालेंव तब ले एकेच्च ठक प्रसन उठीस मोर मन में के छत्तीसगढ़ के भाई मन दूसर प्रांत के आए भाई मन ले काबर अपमानित अउ निरादित होथें। हमर मन में बल, बुद्वि अउ योग्यता नइये। काय कारन हें के छत्तीसगढ़िया मन ल सब बेवकूफ समझथें। दूसर प्रांत के मनखें मन नानकून बेपार चालू करके धन्ना सेठ बन जथें। छत्तीसगढ़ के हर सपूत के मन में ये प्रसन ह उठत होही अउ पीरा पहुंचत हो ही के ये छत्तीसगढ़ ह पिछड़े काबर हे असिक्छा, रूढ़िवाद भाग्य ऊपर भरोसा मूर्खता अउ आलस यही ह हमार पिछड़ेपन के कारण आय। सबोझन सोचत होहू के येखर निदान हो सक थें। संगठन ले एखर निदान हो सक थें। संगठन ले एकता पैदा करके कोनों भी काम ल जीते जा सकत हें। संगठन ले छत्तीसगढ़ के उध्दार होही। मै छत्तीसगढ़ महासभा के तरूण तेजस्वी युवक मन से कहना चाहत हों के बाहरी चमक ल छोड़ के साधना, कर्तव्य, आत्मबल के सहारा लेके आगे बढ़ ले परही तभें संगठन मजबूत होहीं। जाति बंधन ल तोड़े ले परही, ऊंच जाति के मन के कर्तव्य हें के पिछड़े अउ दलित मन आगू बढ़य तभे समाज बदलही।
ये पवित्र काम ल राजनीति के दलबंदी ले दूर रहि के करे ले परही। सबो क्षेत्र के रचनात्मक प्रवृत्ति ल जगाए ले परही, असली नकली ल चिन्हें बर जनता ल मसाल देय बर परही। यही साल हे ऊंखर जागरिति ये, छत्तीसगढ़ ह करवट बदलही, अंधियार ह अइसने भाग जाही। छत्तीसगढ़िया भाई बहन मन भोला भाला अउ गरीब हे, छत्तीसगढ़िया म समय के साथ चले के सक्ति नइये यही कारन से आमन ल कुली कबाड़ी समझे जाथें। नौकरी म घलो बाहरी मन ल भरे जाथें। छत्तीसगढ़िया मन अपनेच्च घर म सरनार्थी होगे हांवय।
हमर भासा के कोनों साहित्य अउ इतिहास नइये, छत्तीसगढ़ कृसि प्रधान प्रदेश हे फेर इहां कृसि कालेज नइयें। (कृसि विश्वविद्यालय उस समय नहीं था ) छत्तीसगढ़िया के परिभासा ल घलों सुग्घर ढंग ले समझइन कें इंग्लैड में रहइया सभों मनखें अंग्रेज नोहय, मद्रास के सबे मनखे मद्रासी नोहय वइसने छत्तीसगढ़ में रहइया सबो मनखें ल छत्तीसगढ़िया नहीं कहे जा सकय, जेन मनखें ह छत्तीसगढ़ी कहलाये म संकोच नइ करय, छत्तीसगढ़ के भलाई ल अपन भलाई समझथें तेने ह सही छत्तीसगढ़िया ये। अइसन मनखे उही ह हो सकथें जेखर जनम छत्तीसगढ़ म होय हे, जेखर परिवार अउ सुआरथ इहां हे, जेन ह वेसभूसा, विवाह, रहन सहन से छत्तीसगढ़ी हे उही ह सही म छत्तीसगढ़िया आय। छत्तीसगढ़ के विकास तभे होही जब जागृति आही। जागृति तभे आही जब अपन छोटे छोटे सुवारथ अउ संकुचित भावना ले छोड़े जाय।
दू करोड़ आबादी वाला छत्तीसगढ़ संगठन अउ जागरन के अभाव म समस्या के जाल म फंसगे हावय। किसान के समस्या, आदिवासी मन के समस्या, दलित के समस्या, मजदूर के समस्या, बेरोजगारी के समस्या ह आगू म खडे हे छत्तीसगढ़ के सर्वागीण विकास बर संगठन अउ जागृति जरूरी हे। गांधी ह संघर्स के कई ठन मार्ग बताए हें। असहयोग अहिंसात्मक विरोध, हड़ताल, अनसन, परदरसन ये ह अस्त्र हे। ये अस्त्र के अविस्कार गांधी जी ह आजादी के बेरा म करे रहिनि हें। येखर से सफलता नइ मिलय त करो या मरो अस्त्र ह अंतिम अस्त्र ये जेखर ले सफलता मिलही।
छत्तीसगढ़ के भविस्य ल संवारे के जिम्मेदारी तरून मन के कंधा म हे, छत्तीसगढ़ के नेतृत्व करे बर संगठित होके आना चाही, अउ वोमन चाही तइसने छत्तीसगढ़ बना सकत हें। छत्तीसगढ़ के तीन महापुरूष गुरू गोसाई महात्मा घासीदास, कर्मयोगी पंडित सुंदरलान शर्मा, न्यायमूर्ति ठाकुर प्यारेलाल सिंह मन जेन छत्तीसगढ़ निरमान के दिसा देय हें, तेमा चलके छत्तीसगढ़ म नवा सुरूज ल ला सकथें । छत्तीसगढ़ ल अंधियार के मुंह ले निकाल के छत्तीसगढ़ के पवित्र धरती ल समृद्वि के हरियाली परदान कर सकथें अउ बीरनारायण सिंह के वीरता के ओखर सरकछन कर सकथें।
डॉ. बघेल के राजनांदगाव म 28जनवरी 1956 के दिन छत्तीसगढ़ी महासभा के अधिवेशन के उदघाटन भासन ले पता चलथें 1956 म घलो साम दाम अउ सिफारिस ले नौकरी मिलय। ये समय म घलो शासन के योजना के लाभ छत्तीसगढ़ निवासी मन नइ उठा सकाय। छत्तीसगढ़ आजो ओतके गरीब हें जतका गुलामी के समय म रहिस हे ऊंखर उद्बोधन म छत्तीसगढ़ के प्रति चिंता ह दिखथें के कइसे छत्तीसगढ़ ह सोसन, दमन अउ उपेक्छा मुक्त होवय।





















