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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

भारत की आजादी के लिए पूरी क्षमता से लड़ाई लड़ने वाले वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हृदयराम कश्यप कथनी और करनी में एक थे। कठिन समय में भी वे देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करने के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी निभाते रहे। गांधीजी से प्रभावित स्व.कश्यप् ने समाज में जागृति लाने एक जमादारिन को बहन बनाया जो उनको जीवनभर राखी बांधती रही। देशप्रेम उनके रग-रग में भरा था।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हृदयराम कश्यप का जन्म ग्राम पाटन जिला दुर्ग में 19 अप्रैल सन 1919 को एक संपन्न कृषक परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम गनपत राव एवं माता का नाम बहुरा बाई था। जिनकी कुल 4 संतान थी। 3 भाई व एक बहन। श्री कश्यप सबसे बड़े थे। इनकी पढ़ाई मिडिल तक ग्राम पाटन में पूरी हुई। देशभक्ति तथा अन्याय के विरूद्ध लड़ना उन्हें, पाटन की मिट्टी तथा पारिवारिक संस्कार से मिला। इनके चाचा स्व.लखनलाल कश्यप भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। जमीन जायजाद होने के बाद भी स्वतंत्रता की चिंगारी इनके मन में प्रज्वलित थी अत: वे दुर्ग चले गए, जहां उन्होनें किराना दूकान में नौकरी की तथा साथ में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। इस दौरान वे जेल भी गए। अंग्रेजों के भय से आंदोलन में भाग लेने के कारण सेठ ने उन्हे नौकरी व आंदोलन दोनों में से किसी एक को चुनने को कहा, अत: वे नौकरी छोड़कर पाटन वापस आ गए। जहां 1936 में ग्राम मोहरेंगा जिला रायपुर के संपन्न मंडल परिवार की कन्या सूरजबाई के साथ इनका विवाह हुआ।

उन्होनें इसके पश्चात 1936 में सपरिवार रायपुर में आकर सेठ थोभनदास परमानंद की दुकान में नौकरी की तथा स्वतंत्रता संग्राम की विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया। इन्हे आयुर्वेदिक जड़ी -बूटियों का भी अच्छा ज्ञान था। इसी बीच गांधीजी के सेवाश्रम में वर्धा गए और एक माह वही रहे तथा गांधीजी की भी सेवा की। वे पूर्ण रूप से स्वराज आंदोलन में जुड़ गए तथा 1942 के भारत छोडों आंदोलन में भाग लेने के कारण 6 माह 19 दिन सेंट्रल जेल रायपुर में रहे। जेल में उपवास एवं अहिंसा से लड़ाई लड़ी। स्व. ठा.प्यारेलाल सिंह एवं स्व.खूबचंद बघेल इनके मार्गदर्शक रहे। इनके घनिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में कमलनारायण शर्मा, केयूर भूषण, मोतीलाल त्रिपाठी, भुजबल सिंह, दुर्गा सिरमौर आदि प्रमुख रहे।

श्री कश्यप ने परिवारीक जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई। भाई-बहनों की शिक्षा-दीक्षा तथा विवाह की जिम्मेदारी भी पूरी की। इन्हें शिक्षा के प्रति विशेष लगाव था अत: परिवार के अन्य बच्चों तथा समाज के प्रतिभावान बच्चों को अपने घर रखकर शिक्षा प्राप्ति में सहयोग दिया। जिनमें से आज कुछ इंजीनियर तथा कुछ डॉक्टर व प्रशासनिक पदों पर है। सेठ थोभनदास के स्वर्गदास के समय उनके पुत्र की आयु मात्र 5 वर्ष की ही थी। इस कठिन समय में उन्होनें उनके परिवार तथा व्यवसाय की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से सम्हाली और उस परिवार के एक अंग बन गए। वे समाजवादी डॉ. लोहिया के विचारों से प्रभावित थे। महाप्रभु चैतन्य तथा स्वामी विवेकानंद के ग्रंथों का नियमित अध्ययन करते थे। स्व. कश्यप् जातिवाद, क्षेत्रीयवाद छुआछुत में विश्वास न रखते हुए पूरे भारत वर्ष को एक मानते थे। अपने जीवनकाल में उन्होनें एक जमादारिन हीराबाई को बहन स्वीकार किया, जिनसे वे प्रतिवर्ष रक्षाबंधन में राखी बंधवाते रहे तथा तीजा पर्व पर भाई की जिम्मेदारी पूरी की। उन्होंने अपनी एकमात्र संतान पुत्री कल्पना का अतंरजातीय विवाह डॉ. ए.के.कुलश्रेष्ठ से किया, जो जिला आयुर्वेद अधिकारी रहे। यह विवाह पूरी सामजिक परम्पराओं के साथ संपन्न हुआ।

हृदयराम कश्यप सर्वधर्म समभाव रखते थे। अनेक मुस्लिम परिवारों से उनके पारिवारिक संबंध रहे। वर्तमान राजनीतिक गतिविधियों से वे प्रसन्न नही थे। देश की चिंता उन्हे हमेशा रहती थी तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संघ के विभिन्न आंदोलनों में नियमित रूप से भाग लेते रहे। उन्होंनें कभी राजनीतिक लाभ नहीं लिया। मृत्यु के एक माह पूर्व भी उन्होंनें पृथक छत्तीसगढ़ आंदोलन में भाग लिया। वे अपने साथियों व विभिन्न राजनीतिक नेताओं के बीच हमेशा निर्विवाद रहे। उनकी मृत्यु 19 दिसम्बर 19?? को दोपहर 2.30 हुई। प्राण त्यागने के पूर्व उन्होनें गांधीजी की प्रतिमा को प्रमाण किया। वे आदेश देशभक्त थे देशप्रेम उनमें कूट-कूटकर भरा था।

-- इति समाप्तम् --

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