अपनी छोटी उम्र में ही पति के देहांत हो जाने के बाद अपने एकलौते बेटे को माता-पिता दोनों का प्यार दिया। सन् 1920 में खूबचंद बघेल नागपूर मेडिकल स्कूल में पढ़ाई के दौरान नागपूर अधिवेसन में भाग लिया और लौटकर सम्मेलन की पूरी कहानी अपने मां को सुनाते थे। वे गांधीजी से बहुत प्रभावित हुई।
सन् 1930 में खूबचंद बघेल सरकारी नौकर छोड़ आंदोलन में कूद पड़े और कांग्रेस के माध्यम से देश सेवा में लग गए। सुन्दर लाल शर्मा के साथ वे अस्पृश्यता निवारण कार्य प्रारंभ की तो माता केकती बाई ने भी डॉ.राधाबाई के साथ सफाई कामगारों के बीच जा उनके पखाने की सफाई में हाथ बंटाती, बच्चों को नहलाती।
सन् 1932 के सत्याग्रह में घर के सभी जेल जाने को तैयार थे। सास-बहू के बीच जेल जाने की होड़ होने लगी। अपनी बहू को अपने बुढ़ापे और उनके नाबालिग बच्चों की देखभाल का बहाना बनाकर अपने आप को जेल जाने के लिए तैयार की। बहू ने सास का आदेश इस शर्त पर मान लिया कि दुबारा अवसर आने पर बहू को प्राथमिकता मिलेगी।
सन् 1932 में विदेशी वस्तुओं की दुकान पर पिकेटिंग करते हुए गिरफ्तार हो जेल पहुंची लेकिन उनके बुढ़ापे की लिहाज कर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। तब वे बहुत दुखी हुई और जेल के फाटक पर ही प्रतिज्ञा की जब तक जेल न पहुंच जाऊं तब तक अन्न ग्रहण नहीं करुंगी।
उनका घर सत्याग्रहियों से भरा रहता था। बहू सबके लिए भोजन बनाती थी। सास उन्हें भोजन करातीं और सत्याग्रहियों को देवता मान उनका जूठा पत्तल उठाती थी।
सन् 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में बघेल परिवार के 8 सदस्य जेल गये और वादानुसार सास ने अपने बहू को तिरंगा झंडा देकर विदा किया।




















