| 30 दिसम्बर 2007
18 जनवरी 1921 को ग्राम खोरपा(पाटन, जिला दुर्ग) कृषक परिवार में पिता रामभरोसा खिचरिया, शिक्षक, संगीतज्ञ एवं धार्मिक रूचि के थे। वे रामायण मंडली एवं लीला मंडलियों के आयोजक होते माता गया बाई, मामा दाऊ भोलाप्रसाद (गिरौद वाले) तात्यापारा में भोला कुर्मी क्षत्रिय छात्रावास उन्हीं का दान दिया हुआ है।
प्रायमरी की पढ़ाई पिता के स्थानांतरण होने के साथ-साथ चलती रही। प्रायमरी के बाद मिडिल की पढ़ाई करने अपने मामा के यहां गिरौद चले आए। वहां से नजदीक का ग्राम मांढर था जहां उन दिनों मिडिल स्कूल था। उन दिनों के प्रसिद्ध शिक्षाविद् श्रीमान आजमबेग प्रधान शिक्षक थे। सहायक शिक्षक धनीराम वर्मा थे। दोनों महान शिक्षकों से प्रभावित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े।
उन दिनों ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल डिस्ट्रिक्ट कौंसिल के अंतर्गत आते थे। पं.रविशंकर शुक्ल इसके चेयरमैन थे और दानी शिक्षा विभाग के मंत्री। कांग्रेस का ही तो काम किया करते थे शिक्षक और विद्यार्थी। कांग्रेस भवन के निर्माण के लिए उस स्कूल के विद्यार्थियों और शिक्षकों ने आठ गांवों से छेर-छेरा मांग कर राशि एकत्रित की। जिसे दानी जी को दे दिए। दानीजी कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारी भी थे। जब वे लोग दान मांगने के लिए घर-घर जाते थे तो लेजिम बजाते हुए गीत गाते थे। गीत का पद था “नहिं रखनी, नहिं रखनी, जालिम सरकार नहिं रखनी”।
उनके जीवन का दूसरा मोड़ सन् 1938 में नारमल स्कूल बिलासपुर से प्रारंभ हुआ। गांधी जी रेल से कलकत्ता की ओर जा रहे थे। नारमल स्कूल के बच्चे गांधी दर्शन को गए। बचपन में वे नटखट भी तो थे। उम्र में छोटे, ऊंचाई में कम, दुबले-पतले पर खेल में सब से आगे। बच्चो का पिरामिड बनता तो सबसे ऊपर तिरंगा झंडा लेकर खड़े होते बालक तेजनाथ। दौड़ने में तेज तो थे ही निर्भीक भी थे। गुरूजनों ने राष्ट्रभक्ति की सीख जो दी थी। ऐसे में वे गांधीजी के पास पहुंचने कैसे दूर रह सकते थे। गांधीजी उन दिनों बाढ़ पीड़ितों के लिए सहायता मांग रहे थे। तेजनाथ और उनके साथी बच्चों ने गांधीजी के हाथ पर चार-चार आने रखे। और वहीं चिल्ला पड़े “खोटा सिक्का चांदी का, राज चलेगा गांधी का”।
सन् 1939 में कांग्रेस का 12 वां अधिवेशन जबलपुर के पास त्रिपुरी में हुआ। तेजनाथ भी बिलासपुर जिले के स्वयंसेवकों की टोली में सम्मिलित हो गए उनके सेना नायक थे मुरलीधर मिश्रा। उधर तेजनाथ के माता-पिता भी त्रिपुरी गए हुए थे। तेजनाथ के टोली को काम मिला था सफाई का। रसोड़ा की सफाई, सड़क की सफाई, संडांस सफाई। उनके पास झाड़ू का झंडा रहता। चार लड़के सेनीटरी इंस्पेक्टर बनाये गए थे। कोई भी नेता उधर से गुजरता सड़क साफ रहती तो झाड़ू ऊपर उठा दिया जाता। वर्ना सफाई चालू रहती। एक सेनीटरी इंस्पेक्टर के जिम्मे दो बैरक बंटे हुए थे।
तेजनाथ की तैनाती नेता सुभाषचंद्र बोस के कुटिया की देखरेख की थी। सुभाषचंद्र जब त्रिपुरी आए तब उन्हें 108 बुखार था। उनको किसी प्रकार का कष्ट न हो। कोई भावुकतावश वहां पहुंचकर उन्हें परेशान न करे। यह देखना उनका काम था। नेताजी सुभाषचंद्र बुखार के कारण सम्मेलन के मंच पर भाषण नहीं दे पाए। पर वे स्ट्रेचर पर सोए-सोए सभा का संचालन करते रहे।
उस समय कांग्रेस के 52 वे अधिवेशन के उपलक्ष्य में 52 हाथियों का रथ निकाला गया। 52 फीट ऊंचे खंबे में पं.जवाहरलाल नेहरू ने झंडा फहराया। वहीं तैनाती होने के कारण तेजनाथजी फोटो लेने लगे। कैमरा सेट करने में थोड़ी देर होने लगी तो इंदिरा गांधी उनक हाथ से कैमरा छीन फोटो लेने लगी। नेहरू जी झट डांटकर बोले, इन्हें क्यों फोटो लेने नहीं दे रही हो। तब इंदिराजी ने कैमरा उन्हें वापस दे दिया।
त्रिपुरी कांग्रेस में एक ऐसी घटना हुई जिसे वे अपने जीवन में कभी भूल नहीं पाए। इस बारे में उन्होंने बताया कि त्रिपुरी कांग्रेस के मंच पर ज्यादातर भाषण हिन्दी में ही हुए। दक्षिण का कोई अंग्रेजी में थोड़ा बहुत बोलता तो लोग हिन्दी-हिन्दी कह चिल्लाते थे। जब अणे साहब अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलने लगे तब उपस्थित श्रोता हिन्दी के लिए आग्रह करने लगे। इसी बीच मंच में किसी ने पत्थर फेंक दिया। वह पत्थर सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां की बहिन के बांहों पर पड़ा। पत्थर की चोट से वे वही बेहोश हो गई। पानी-पानी की आवाज आने लगी। पं. नेहरू जीने तेजनाथ को ढकेलते हुए कहा-“जाओ जल्दी पानी ले आओ”। वे दौड़कर रसौड़ा गये वहां से पानी की जगह में एक जग दूध भरके ले आया। खान बहिन दूध पीकर आराम महसूस करने लगी। पंडितजी ने प्रसन्न होकर कहा – देखा हमारे वालियन्टरों का काम। उन्होंने उनकी पीठ ठोंक कर शबासी दी।
त्रिपुरी कांग्रेस में बिहार से स्वयंसेवकों की पैदल टोली आई थी। वह किसानों की थी। उनमें से अधिकांश पढ़े-लिखे नहीं थे। उनके टोली नायक थे राजेन्द्र बाबू। वे उन्हीं के साथ कैंप में रहते थे। उन्हें नार्मल स्कूल के पढ़ने वाले विद्यार्थी जान बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने उनसे पढ़ाने के लिए आग्रह करने लगे। वहीं रात्रिशाला प्रारंभ की गई। लगभग एक माह तक उनके साथियों को पढ़ाते रहे।
सन् 1941 में रायपुर नगर पालिका में शिक्षक हो गए। पर वहां टिक नहीं पाए। गिरौद में ही रहकर प्रतिदिन 10 किलोमीटर का फासला पैदल चलकर पढ़ाने के लिए आते और उसी प्रकार वापस जाते। सन् 1942 में गिरौद में सत्याग्रही पहुंचे। ग्राम कोटवार ने थाने में सूचना दे दी। पुलिस आई और सत्याग्रहियों को गिरफ्तार कर ले गई। उन लोगों ने अपना पर्चा बुलेटिन तेजनाथ जी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में दे दिए। फिर उन्होंने भी सत्याग्रहियों की टोली बना ली। साथी बने गोकुल दुकानदार, मनबोध कृषक, उभाराव मरार पटेल और साथ हुए दो विद्यार्थी द्वारिकानाथ एवं बनवारी प्रसाद। सारी रात कार्बन लगाकर परचा बनाते और मांढ़र जाकर रेलगाड़ी में यात्रियों को बांट आते। बचे परचों के बंडल बनाकर उसी गाड़ी के डिब्बे में छोड़ आते। वह परचा कलकत्ता और बंबई तक पहुंच जाता। पुलिस उन परचों के कारण परेशान रहती। उसके स्त्रोत का उन्हें पता नहीं लग पा रहा था। आखिर एक दिन पता लग गया। साथी सहित तेजनाथ पकड़े गए। 9 माह रायपुर जेल में रहे। इसी बीच उन्हें 6 माह की सजा भी भुगतनी पड़ी।
जेल से निकलने के बाद वे नगरपालिका रायपुर में शिक्षक हो गए। दानीजी के कहने पर अनाथालय में व्यवस्था का काम देखने लगे। वहां की अव्यवस्था अच्छी नहीं लगी। तब डॉ. खूबचंद बघेल के साथ कांग्रेस कार्यालय में कार्य करने लगे। इसी बीच 1950 में आयुर्वेदिक कॉलेज की स्थापना हुई। वहां प्रवेश लेकर वे प्रथम बैच के विद्यार्थी बन गए। वहीं से डिग्री लेकर वे जनपद में डॉक्टरी करने लगे।




















