आपसे आग्रह

हमें अपने लेख आलेख, कविता, कहानी, सामाजिक गतिविधियां, सामाजिक युवा पीढ़ी की उपलब्धियां, कृषि के क्षेत्र में किए गए हमारे मूलभूत उपलब्धियां, ऐसी हर वो जानकारी जो आप अपने साथ-साथ समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाना चाहते है, सहर्ष आमंत्रित है

हमारा उद्​देश्य

सारे कुर्मी समाज को इंटरनेट के माध्यम से एक मंच पर लाना और समाज की जानकारी कम समय में अधिक लोगों तक पहुंचाना।

हमारा सम्पर्क सूत्र

हमारा ई-मेल - info+kurmisamaj.com
[+ के स्थान पर @ चिन्ह लगायें]

जरूरत है

The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

रायपुर से मन्दिर-हसौद मार्ग के 16वें मील पर चन्दखुरी गांव है। इसी छोटे से गांव में एक छोटे से किसान परिवार में 28 अगस्त 1890 को बालक नन्दा का जन्म हुआ। नन्दा के पिता का नाम हिंछाराम और माता का नाम दसोदा बाई था। हिंछाराम के पास केवल 15 एकड़ जमीन थी। घर की आर्थिक स्थिति बड़ी शोचनीय थी। अत: बालक नन्दा को चौथी हिन्दी पास करके पाठशाला छोड़ देनी पड़ी और इस छोटी सी उम्र से ही जीविकोपार्जल के कार्य में लग जाना पड़ा। अभी नन्दा का बचपन बीता भी न था कि पिता की मृत्यु हो गई। घर का सारा बोझ इस छोटे से बालक के कन्धों पर आ पड़ा। नन्दा ने इस बोझ को सहर्ष हिम्मत के साथ स्वीकार कर लिया। कौन जानता था कि नियति अनागत के चरित्र निर्माण में संलग्न है। नन्दा ने अपनी पैतृक खेती में परिश्रम करना प्रारंम्भ किया। थोड़ी जमीन और सीमित साधनों के कारण नन्दा को खेती में सरलता नहीं मिल सकी। जिसे देश के लिये अनेक महत्व के लिये अनेक महत्व के काम करने हों, अनेक परीक्षाएं देनी हों वह भला इस छोटी सी असफलता से क्यों घबराता? नन्दा ने दूकान शुरू कर दी। प्रारम्भ में वह स्वयं अपने कन्धे पर कांवर ले गांव-गांव घूम-घूमकर सामान बेचा करता।

परिश्रम करना, पूरा तोलना, सच बोलना ये नन्दा के व्यापारिक सिद्धांत थे। ईमानदारी और परिश्रम के कारण दूकान उन्नति करती गई। अब उसके अपने गांव के ही नहीं अपितु आस-पास के गांव वाले भी उसकी दूकान पर सामान लेने आने लग। कुछ ही समय में यह छोटी सी दूकान एक प्रतिष्ठित और बड़ी दूकान माना जाने लगी। नन्दा भी अब सेठ अनन्तराम कहलाने लगे। अनन्तराम जी ने लाखों रुपये कमाये। समाज में प्रतिष्ठा व सम्मान प्राप्त किया। लेकिन धन और प्रतिष्ठा उनकी आत्मा को सन्तुष्ट न कर सके। देश की परतन्त्रता, परतन्त्र देशवासियों की गरीबी, उनके कष्ट देखकर वे व्याकुल हो उठते। जैसे ही महात्मा गांधी ने आजादी का बिगुल फूंका आपने क्रियात्मक रूप से देश की आजादी की लड़ाई में हिससा लेना प्रारम्भ कर दिया। उस समय के प्रसिद्ध नेता पंडित रविशंकर शुक्ला के साथ आपने 1919 में झण्डा सत्याग्रह में भाग लिया और छ: महीने की जेल की सजा भी पाई।

अनन्तराम जी का सम्बन्ध अब काँग्रेस से हो गया। झन्डा सत्याग्रह के पश्चात असहयोग आन्दोलन में आपका योगदान महत्वपूर्ण रहा। आपने पैदल गांव-गांव जाकर ग्रामवासियों को जगाया। उन्हें आन्दोलन का महत्व बताया, परिणाम स्वरूप उन्हें फिर एक वर्ष की सजा भुगतनी पड़ी।

1930 में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार-आन्दोलन में आपने सक्रिय रूप से भाग लिया। दूकानों पर पिकेटिंग करना, विदेशी वस्तुओं के खरीदने एवं बेचने वालों के सम्मुख धरना देना, सब कार्यों में आपने भाग लिया। सरकार ने फिर आपको जेल की कोठरी में बन्द कर दिया। लगातार संघर्ष, अनवरत परिश्रम, सक्रिय देश सेवा-कार्य से यद्यपि आपका शरीरक्षीण हो गया, लेकिन मुख पर वैसा ही उत्साह तथा मन में वैसी ही लगन बनी रही।

एक बार एक पुलिस अफसर ने जो चन्दखुरी ग्राम में आया हुआ था आपसे बेगार में कुछ सामान देने को कहा। आप तो पक्के देश-भक्त और स्वाभिमानी थे। अतएव आपने पुलिस अफसर के पास सन्देश भिजवाया ''यदि आप मेरे यहां मेहमान बनकर आवें जो आपकी सेवा करने को तैयार हूँ लेकिन हुक्म, जूल्म और बेगार के रूप में कुछ भी नहीं दे सकता।'' पुलिस अधिकारी चिढ़ गया। सरकार पहिले से ही चिढ़ी बैठी थी। आप पर झूठे-सच्चे आरोप लगाये गये और वारंट निकालकर आपको गिरफ्तार कर लिया गया साथ ही दूकान और घर की अधिकांश सामग्री लूट ली गई। यह लूटमार किसी डाकू द्वारा की गई लूटमार से भी बर्बर एवं निर्दय थी। सब सामान लूट लेने एवं लुटवा देने से भी जब सन्तोष नहीं हुआ तो आदेश निकाला गया कि सेठ अनन्तराम का रुपया जिस पर भी निकलता हो, वह न दे। इस प्रकार आपको लाखों रुपयों की हानि उठानी पड़ी। आपके गाढ़े पसीने की कमाई देश के निमित्त स्वाहा हो गई। किन्तु आप झुके नहीं सन् 1932 में विदेशी वस्त्रों के बहिस्कार आन्दोलन में भाग लेने के कारण आपको पुन: जेल के सींखचों में बन्द कर दिया गया। आपके साथ डॉ. खूबचन्द बघेल, नन्दकुमार दानी, मास्टर गोपाल राव आदि भी थे। यह समय ही ऐसा था जहां एक ओर देशभक्त मातृ-भूमि की स्वतन्त्रता के लिये अपना सब कुछ न्योछावर करने की होड़ कर रहे थे वहां दूसरी ओर विदेशी सरकार अपनी पूर्ण शक्ति के साथ अपना दमन चक्र चला रही थी। राजनैतिक कैदियों के साथ चारी, डकैती, खून आदि जुर्मों में पकड़े गये कैदियों से भी बदतर व्यवहार किया जाता। आपने इस दुर्व्यवहार के विरोध में आवाज उठाई। आप तो खादी पहनते थे। जेल में आपके कपड़े उतरवाकर कैदियों की पोशाक दी गई तो आपने इसे पहिनने से इन्कार कर दिया। आपने कहा- ''हम अपराधी नहीं, राजनैतिक बन्दी हैं, हम घर के कपड़े पहिनेंगे।'' मांग स्वीकृत न होने पर आपने नितान्त नंगा रहने का निश्चय कर लिया। आपके साथी लोकलाज वश आपको जबरदस्ती कम्बल ओढ़ा देते। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार आन्दोलन के बाद आप अपना अधिकांश समय हरिजन सेवा में देने लगे। सन् 1933 में महात्मा गांधी रायपुर आये। उन्होंने देशवासियों को चेतावनी दी ''अगर छूआछूत जिन्दा रही तो हिन्दू धर्म मरेगा। यदि हिन्दू धर्म को जीवित रखना है तो छूआछूत को मिटाना होगा।'' सामाजिक क्रान्ति के मतवाले युवकों ने यह घोषणा सुनी। इस कुरीति एवं समाज के कलंक को दूर करने अनेक समाज सेवी आगे आये। सेठ अनन्तराम बर्छिहा इस सेवा कार्य में अग्रनण्य साबित हुए। उन्होंने अपने गांव में हरिजन भाइयों की हजामत बनाई। अंग्रजी शासन की कूटनीति में पले गांवों के मुखियों को यह अच्छा न लगा। आपके इस सेवा-कार्य से अप्रसन्न होकर स्व-जातियों ने आपका ही जातिच्युत कर दिया। आपके सम्बन्ध में छत्तीसगढ़ के परम सेवक डॉ. खूबचन्द बघेल ने लिखा है-''गांव की परिस्थिति विस्फोटक हो गई। पांचों-पवनी ने सेठजी से असहयोग कर दिया, नाई, धुरवों, रावत, मेहर और लोहार ने इनके सारे काम बन्द कर दिये। बहिष्कृत होने पर भी बर्छिहा जी गांधी के आशीर्वाद के बल पर प्रसन्न थे। उनका उत्साह अदम्य और हृदय ग्राही था।''

उस समय हरिजनों को सार्वजनिक कुओं, तालाबों और मन्दिरों में नहीं घुसने दिया जाता था। गांवों में तो यह स्थिति और भी विकट रूप से विद्यमान थी। आपने इस कार्य को पूरा करने का निश्चय किया। आपने अपने गांव के मन्दिर में हरिजन प्रवेश की मांग को लेकर आठ दिन का उपवास किया। अंत में गांव वालों को आप के उपवास के कारण झुकना पड़ा। हरिजनों को मन्दिर प्रवेश का लाभ मिला।

सन् 1936 में आपकी सुपुत्री की शादी थी। चूंकि आप जाति-च्युत हो चुके थे। अतएव न आपके यहाँ नाई काम करने आता न धोबी कपड़े धोता। समस्याएं वैसे ही कम न थीं। लेकिन आपकी जिद से एक और समस्या उत्पन्न हो गई। आपने स्पष्ट कह दिया ''दहेज प्रथा बन्द होना चाहिये-अंत में दहेज न तो लूंगा और न दूंगा ही।'' भला इतने बड़े घर की लड़की खाली हाथ कैसे जाये? घर के बुजुर्गों ने समझाया, भाइयों ने सलाह दी, पुत्रों ने निवेदन किया कि साधारण गृहस्थों-जैसा कुछ तो होना चाहिये। लेकिन आप अडिग रहे। विवाह सम्पन्न हुआ। दहेज के नाम पर दिया गया केवल एक चर्खा।

कुर्मी, समाज में घुसी 'यादवी-फूट' को आपने दूर किया। कुर्मी-समाज मे अन्तर उप जातियां थी। इन अन्तर उपजातियों में आपस में विवाह सम्बन्ध नहीं होते थे एवं एक उपजाति दूसरी उपजाति से स्वयं को ऊॅंचा समझती थी। आपने इन उपजातियों को एक करने के उद्देश्य से कई ऊंचे-घरानों में विवाह सम्बन्ध कराये और इस बढ़ती हुई फूट को रोका। मनुवा कुर्मी समाज इस समन्वय प्रयत्न के लिये आपका चिर ऋणी रहेगा।

आप छत्तीसगढ़ के अनन्य सेवक थे। आप तहसील काँग्रेस कमेटी, शिक्षक समिति तथा अन्य कई सामाजिक संस्थाओं के अध्यक्ष रहे। आपने हमेशा निष्पक्ष निर्भीक एवं सत्यवादी रहकर दूसरों के लिये उदाहरण प्रस्तुत किया। न्यायप्रियता और समझबूझ की याद दिलाते हैं। सन् 1937 में जनता ने आपको एम. एल. ए. चुन कर भेजा। विधानसभा में आपने छत्तीसगढ़ का वास्तविक प्रतिनिधित्व किया। छत्तीसगढ़ी जनता के दु:ख-दर्द दूर करना ही आपका लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न यह महामानव 22 अमस्त 1958 को हमें छोड़ कर चला गया।

-- इति समाप्तम् --

टिप्पणियां 

 
0 #1 इस बहुमूल्य जानकारी के लिए साभारsumit verma 2011-04-06 16:18
मेरा नाम सुमित वर्मा,ग्राम-नगपुरा(चंदखुरी) का निवासी हूँ|मैं शायद अनंतराम जी के वंश से ही हूँ और आज भारत स्वाभिमान से जुड़कर देश कि सेवा कर रहा हूँ|
मेरा मोबाइल-७४१५५४३८०१
मैं NIT से MCA कर रहा हूँ|
Quote
 

टिप्पणी जोड़े

:

:

:

:


Security code
नया कोड प्राप्त करें

The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

Raipur City

हमारे अतिथि

KurmiKurmiKurmiKurmiKurmiKurmi
Kurmiआज48
Kurmiकल202
Kurmiइस सप्ताह1356
Kurmiपिछले सप्ताह1386
Kurmiइस माह3847
Kurmiपिछले माह6393
Kurmiकुल136838

हमारा रैंक