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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

1907 में रायपुर के कपसदा गांव में जन्म हुआ। शिक्षा संचालक जैसे महत्वपूर्ण पद से त्यागपत्र देकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे।

9 अगस्त 1942 को गांधीजी ने ज्यों ही ग्वालियर टैंक मैदान, मुम्बई से करो या मरो की घोषणा की, रायपुर में यह खबर आग की तरह फैल गई। 9 अगस्त को ही सायंकाल में औपचारिक जुलूस निकाला गया। रातभर आंदोलनकारियों ने मीटिंग की। सबेरा होते ही लोग इकट्ठा होने लगे। पूरी तैयारियों के साथ 10 अगस्त को इतना विशाल जुलूस निकला कि लोगों के उत्साह को देखते हुए लग रहा था, ‘अंग्रेजों को रायपुर से तो आज ही जाना पड़ेगा’। अब तक के शहर के इतिहास का यह सबसे बड़ा जुलूस था। जुलूस की आक्रामकता को देखते हुए लाठीचार्ज के अलावा गोली चलने की भी पूरी संभावना थी। पर उस समय के देशभक्त कलेक्टर रामकृष्ण पाटिल ने काबिले तारीफ काम किया। जब रायपुर के पुलिस सुप्रिंटेंडेंट ने पाटिल साहब से जुलूस पर लाठीचार्ज करने का आदेश मांगा, तो उन्होंने जुलूस पर किसी भी हालत में बल प्रयोग न करने के आदेश दिए। कलेक्टर साहब जेल में जाकर क्रांतिकारी कैदियों को खाने-पीने की वस्तुएं, जरुरी किताबें वगैरह स्वयं भिजवाते थे। उनकी देशभक्ति से रुष्ट होकर अंग्रेज अधिकारियों ने उनके स्थानांतरण सिवनी कर दिया, जहां उन्होंने सरकारी सर्विस से ही इस्तीफा दे दिया।

1928 में मांढर मिडिल स्कूल में अध्यापक नियुक्त हुए। व्यायाम शिक्षक के रुप में जिले के बाहर भी ख्याति अर्जित करने वाले श्री वर्मा को पं. रविशंकर शुक्ल के ‘डिस्ट्रिक्ट काउंसिल’ की चेयरमैनशिप में व्यायाम प्रशिक्षण हेतु ‘स्वर्ण पदक’ व चांदी का गदा मिला। 1938 से 1940 तक गांधीजी द्वारा वर्धा में संचालित शालेय शिक्षा समिति में अध्यापक रहे हैं। गांधीजी व कस्तूरबा से इनके परिवार की अच्छी खासी अंतरंगता रही।

उनके पुत्र का नाम तुलेन्द्र था जो बाद में स्वामी आत्मानंद के नाम से जाना गया। एकबार तुलेन्द्र की मां ने कस्तूरबा से शिकायत कर दी कि तुलेन्द्र उनकी बात नहीं मानता है। सहयोग से बा ने यह बात गांधीजी को बता दी। रात्रि प्रार्थना के बाद गांधीजी बच्चों को बिठाकर कहानियां सुनाया करते थे। उस रात गांधीजी ने बच्चों को माता-पिता की बात न मानने से संबंधित एक कहानी सुनाई। कहानी समाप्त होते ही तुलेन्द्र ने बापूजी के पैर पकड़ लिए, ‘बापूजी आप मेरे को ही डांट रहे हैं, ऐसा कहकर वह रोने लगा इस पर बापू जी ने बड़े प्रेम से उसे पुचकारा। उसे बापू बहुत चाहते थे। सेवाग्राम में वह बापू की लाठी लेकर आगे-आगे चलता था। सेवाग्राम में अब भी उसके यह छायाचित्र लगे हुए हैं।’

आजादी केवल जोश जुनून या जज्बाती मसला था ऐसा कहना भी ठीक नहीं है। जोश और जज्बात के अलावा गांधीजी ने आजाद भारत के लिए निश्चित प्रोग्राम भी तय कर लिए थे। पूर्ण स्वराज्य का अगला चरण जिसमें रामराज्य की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी, को आजादी के बाद ही क्रियान्वित किया जाना था। पर नेहरु के प्रधानमंत्री बनने से सारा कुछ गड़बड़ हो गया। प्रधानमंत्री बनते ही इन्होंने गांधीजी के साथ विश्वासघात किया। नेहरु जी मूलतः अय्याश एवं सत्तालोलुप प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। सफल कुटनीतिक तिकड़मबाजी के चलते नेहरू जी के व्यक्तित्व के बहुत बड़े हिस्से पर हमारे इतिहासकारों ने पर्दा डाल रखा है। अगर सरदार पटेल को स्वतंत्र भारत का प्रथम प्रधानमंत्री बनाया गया होता तो आज देश की तस्वीर ही कुछ दूसरी होती।

गांधीजी के निधन के बाद कांग्रेस छोड़ दी। उनका कहना था कि कांग्रेस ने देश में सर्वाधिक समय तक शासन किया है, अतः यह सत्य हैकि भ्रष्टाचार, महंगाई, रिश्वतखोरी, कालाबाजारी, नैतिक पतन जैसी समस्याओं की जड़ में कांग्रेस ही है। दरअसल आजादी के बाद देश के लिए लड़ने वालों को तो दरकिनार कर दिया गया और अवसरवादी लोग कांग्रेस में आ गए। वस्तुतः गांधीजी के सुझाव के अनुरूप राजनैतिक पार्टी के रुप में कांग्रेस को 1947 में ही समाप्त कर देना चाहिए था। जो कांग्रेस आजादी के पहले गौहत्या एवं शराबबंदी के प्रस्ताव पारित करती थी, उसी ने अपने शासनकाल में मांस निर्यात और डिस्टलरी प्लांट्स खोलने के लायसेंस बांटे

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