| 13 अक्टूबर 2006
भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रीय योगदान देकर एवं तत्कालीन भारत में चल रहे राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन
तथा आर्थिक मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेकर जिन्होंने इतिहास रचा है, उनमें एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. खूबचंद बघेल जी का भी है। छत्तीसगढ़ राज्य जो अस्तित्व में 1 नवम्बर 2000 से आया है, उसके प्रथम स्वप्न दृष्टा, डॉ. खूबचंद बघेल जी ही थे। आज भले ही उन्हें इसकी मान्यता देने में उच्च वर्ण एवं वर्ग के लोगों को हिचकिचाहट होती है, लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य/तथ्य है ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था को विछिन्न कर समस्त मानव जाति को एक जाति के रूप् में देखने की चाहत रखने वाले डॉ. बघेल के व्यक्तित्व में छत्तीसगढ़ की खुशबू रची-बसी थी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिये त्याग और बलिदान करने वालों में डॉ. साहब का नाम अग्रिम पंक्ति पर है
छत्तीसगढ़ के संस्कृति कला एवं रीति रिवाजों की महक, उनमें रची बसी थी जो उनके द्वारा लिखित जनरैल सिंग नामक नाटक के इस कविता में झलकती है :-
बासी के गुण कहुं कहां तक, इसे ना टालो हांसी में
गजब बिटामिन भरे हुये है, छत्तीसगढ़ के बासी में।
नदानी से फूल उठा मैं, ओछो की शाबाशी में,
फसल उन्हारी बोई मैंने, असमय हाय मटासी में
अंतिम बासी को सांधा, निज यौवन पूरन मासी में,
बुद्ध-कबीर मिले मुझको, बस छत्तीसगढ़ के बासी में
बासी के गुण कहुं, कहां तक .................................
विद्वत जन को हरि दर्शन मिले, जो राजाज्ञा की फांसी में,
राजनीति भर देती है यह, बुंढ़े में सन्यासी में
विदुषी भी प्रख्यात यहां थी, जो लक्ष्मी थी झांसी में,
स्वर्गीय नेता की लंबी मुंछे भी बढ़ी हुई थी बासी में।
गजब बिटामिन भरे हुये है ...........................................
डॉ. खूबचंद बघेल का जन्म छत्तीसगढ़ राज्य (तत्कालीन सी.पी.एवं बरार) के रायपुर, जिले के ग्राम पथरी में 19 जुलाई सन् 1900 ईस्वी में हुआ था। ग्राम पथरी रायपुर-बिलासपुर (मुम्बई-हावड़ा रेल लाईन व्हाया नागपुर) रेल मार्ग पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 15 किलो मीटर दूर मांढर (द.पु.रे.) सीमेंट फैक्टरी से 10 कि.मी. पूर्व में स्थित है पिता का नाम जुड़ावन प्रसाद एवं माता का नाम केतकी बाई था। जुड़ावन प्रसाद पथरी के माल गुजार परिवार से थे। ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था के तहत कुर्मी जाति के होने के नाते खेती किसानी ही उनका पुश्तैनी पेशा था। पिता की मृत्यु डॉ. साहब के बाल्यकाल में ही हो गई थी। प्राथमिक शिक्षा डॉ. साहब ने अपने चाचा नकुल एवं सहदेव प्रसाद बघेल के कुशल निर्देशन में गांव के प्राथमिक शाला में पायी प्राथमिक शिक्षा समाप्त करने के बाद गवर्नमेंट हाई स्कूल, रायपुर में भर्ती हो गये। वे एक मेघावी छात्र थे, उन्हें छात्रवृत्ति मिलती थी। छात्र जीवन में ही देश सेवा के कार्य में जुड़े रहे देशभक्ति एवं राष्ट्रीयता की भावना ने हृदय में जगह बना लिया था।
डॉ. साहब का विवाह लगभग दस वर्ष की उम्र में अपने से तीन वर्ष छोटी राजकुंवर से, प्राथमिक शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही हो गया था। उनकी पत्नी राजकुंवर से उनकी तीन पुत्रियां क्रमश: पार्वती, राधा एवं सरस्वती का जन्म हुआ। राजकुंवर बाई निरक्षर थी। कालान्तर में डॉ. भारत भूषण बघेल को पुत्र के अभाव में डॉ. साहब ने गोद लिया।
सन् 1920 में जब नागपुर के राबर्टसन मेडीकल कालेज में डाँ. साहब शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब नागपुर में विजय राघवाचार्य की अध्यक्षता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में मेडीकल कोर के सदस्य के रूप् में सम्मिलित हुये थे। सन् 1921-22 के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर डाक्टरी की पढ़ाई छोड़ आंदोलन का प्रचार-प्रसार, रायपुर जिले के, गांवों में घूम-घूमकर करने लगे विशेषकर डाक्टर साहब ने छात्रों को संगठित कर, उनमें राष्ट्रीय चेतना के बीज बोने का बीड़ा उठाया डाक्टरी की पढ़ाई अधुरी छोड़ नागपुर से लौट आने एवं स्वतंत्रता के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रीयता को देख, माता एवं परिवारजनों को बड़ी निराशा हुई थी लेकिन सबके समझाने बुझाने के बाद, पुन: नागपुर एल.एम.पी. की डिग्री हासिल करने पहुंचे, तभी झंडा सत्याग्रह प्रारंभ हो गया छत्तीसगढ़ से सैकड़ों की संख्या में स्वयंसेवकों ने झंडा-सत्याग्रह में डॉ. साहब के नेतृत्व में भाग लिया।
सन् 1923 में एल.एम.पी. (लजिसलेटिव मेडीकल प्रेक्टिशनर) की परीक्षा पास कर ली, कालान्तर में एल.एम.पी. को एम.बी.बी.एस. में परिवर्तित किया गया। एल.एम.पी.की परीक्षा पास कर स्वास्थ्य विभाग में नौकरी कर ली। डॉ. साहब की प्रथम पोस्टिंग रायगढ़ शासकीय अस्पताल में हुई।
1931 में जंगल सत्याग्रह प्रारंभ हो गया, इसमें शामिल होने डॉ. साहब ने शासकीय सेवा से त्यागपत्र दे दिया और संपूर्ण भारत में चल रहे स्वतंत्रता प्राप्ति के आंदोलन के प्रति पूर्णतया समर्पित हो गये दलितों एवं शोषितों के समाजिक अपमान, छूआछूत, भेदभाव के विरूद्ध संगठन की शुरूआत की एवं 1932 में तत्कालीन मध्यभारत एवं बरार प्रांत (सी.पी. एंड बरार प्रोविन्स) के हरिजन सेवक संघ ईकाई के मंत्री नियुक्त किये गये। मिनीमाता एवं छत्तीसगढ़ के अन्य दलित नेताओं के साथ मिलकर शैक्षणिक, सामाजिक, राजनैतिक स्तर में सुधार के लिये काम किये।
सन् 1932 के विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलन में पुन: जेल गये उनके साथ उनक 18 सहयोगियों में एक उनकी माता श्रीमती केतकी बाई भी थी। सन् 1932 के बाद रायपुर जिला कांग्रेस कमेटी के साथ, डिस्ट्रिक्ट कौसिल रायपुर में फिजिकल इंस्ट्रक्टर के पद पर कार्य किया।
सामाजिक कार्य - ऊंच-नीच, छूआछूत के चलते छत्तीसगढ़ के चलते छत्तीसगढ़ के गांवों में नाई, सतनामी समाज के भाईयों का बाल नहीं काटते थे उनके मुहल्ले की सफाई भी नहीं होती थी ग्राम-चन्दखुरी, मंदिर हसौद, ब्लाक-आंरंग जिला रायपुर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जो आगे चलकर विधायक भी चुने गये, जिन्हें दुकान का धंधा करने के कारण लोग सेठ कहकर पुकारते थे- स्व. अंतराम बर्छिहा ने सतनामी समाज के लोगों को बाल काटने, दाढ़ी बनाने (सांवर बनाने) एवं उनके मुहल्ले की सफाई करने का काम किया। इससे उनका अपना कुर्मी समाज नाराज हो गया, उन्हें कुर्मी जाति से बहिष्कृत कर दिया। डॉ. साहब ने इस कार्य के महत्व बताने एवं नाराज समाज को अपने गलती का एहसास करवाने के लिये ऊंच-नीच नामक नाटक लिखकर उसका सफल मंचन करवाया। इस नाटक का असर हुआ, बर्छिहा जी का सामाजिक बहिष्कार रद्द हुआ एवं उनके कार्य की सर्वत्र प्रशंसा हुई।
भारतीय मानव समाज के वर्ण से वर्ग, वर्ग से जाति, जाति से उपजाति एवं उपजाति से गोत्र के टूटने को उन्होंने अंतरआत्मा तक महसूस किया। और इस सड़ी-गली जाति प्रथा को तोड़ने का संकल्प ले, सर्वप्रथम उपजाति बंधन को तोड़ा। 1936 में उपजाति बंधन तोड़कर स्वयं मनवा कुर्मी उपजाति के होने के बावजूद, दिल्लीवार कुर्मी मा. रामचन्द्र देशमुख (संस्थापक-चंदैनी गोंदा) ग्राम-बघेरा जिला-दुर्ग वाले के साथ अपनी द्वित्तीय पुत्री राधाबाई का विवाह सम्पन्न किया। उपजाति बंधन तोड़ने पर उनके स्वयं के मनवा कुर्मी समाज ने उन्हें मनवा कुर्मी उपजाति से बहिष्कृत किया, उन्हें सजा मिली। अपने मनवा कुर्मी उपजाति से बहिष्कृत होने पर उन्होंने कहा, 'आप भले ही मुझे छोड़ दे, लेकिन मैं आप लोगों को नहीं छोड़ सकता' इस अवसर पर अपनी बात उन्होंने कवि अतीश की एक कविता के माध्यम से कही जो निम्नलिखित है:-
ये हो बिटप (वट-वृक्ष), हम पुहुप (फुल) तिहारो है।
राखिहौ तो रहेंगे, शोभा रावरी (तुम्हारी) ही बढ़ायेंगे॥
बिलग किये ते, बिलग ना माने कछु,
चढ़ेगे, सुर सिर न चढेगें जाय
सुकवि अतीश हाट बाटन बिकायेंगे।
देश हुं रहेंगे, परदेश हुं रहेंगें जाय,
जऊन देश हुं रहे, पर राउरे (आपके ही) कहायेंगे।
डॉ. बघेल ने अपने लेख में उपजातीय शादियों के संबंध में लिखा है, कि ''जो अन्तर उपजातीय विवाह को टेढ़ी नजर से देखते हैं, यह तो संजीवनी बुटी को 'चरौटा-भाजी' समझने के समान मूर्खता हैं। जो हमें संकीर्णता से विशालता की ओर, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जावे, ऐसे कदम का विरोध करने वाले लोगों के लिये हृदय में एक भारी वेदना पैदा होती है।''
उपजाति शादी की मान्यता के लिये, वर्षो तक संघर्ष कर, अंतत: विजयी हुये। इसी का परिणाम है, कि आज छत्तीसगढ़ के कूमियों में अन्तर उपजातिय शादियों को मान्यता प्राप्त है, कुर्मियों के अखिल भारतीय स्वरुप को उन्होंने सामने लाया पटना (बिहार) के राजेश्वर पटेल (जो सांसद भी रहे एवं 1953 'प्रथम राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग' जिसके अध्यक्ष काका कालेलकर को नियुक्त किया गया था, के पटेल जी सदस्य रहे।) के साथ अपनी तृतीय पुत्री सरस्वती का विवाह किया। ''आखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा'' के 24 वें अधिवेशन जो कि दिनांक 7,8 एवं 9 मई 1948 यू.पी. कानपुर के जनपद हारामऊ ग्राम पुखराया में एवं 28 वां अधिवेशन जो महाराष्ट्र, नागपुर में दिनांक 10,11 एवं 12 को आयोजित था। इन दोनों अधिवेशनों की अध्यक्षता की।
कानपुर के अध्यक्षीय भाषण का यह अंश उनके समस्त मानव जाति को एकजूट करने की इच्छा को प्रदर्शित करता है, ''उपजातियों का भेदभाव मिटाना इस युग का छोटे से छोटे, हल्के से हल्का कदम होगा। सही मायने में तो हमको और आपको समस्त मानव जाति के अन्दर रहने वाली ब्राम्हणवादी जाति-पाति की सड़ी एवं खड़ी व्यवस्था को ही पहले दूर करना होगा। वर्ण व्यवस्था रुपी शरीर में जाति व्यवस्था एक कोढ़ है, जो सारे भारतीय मानव समाज को नष्ट कर रहा है।'' सामाजिक परिवर्तन की दिशा में उनके उपर्युक्त उद्गार आज भी प्रासांगिक है। क्योंकि शोषित एवं पिछड़ा अपने हित की जब बात करता है, तो उच्च वर्ण के लोग उन्हें जातिवादी करार देते हैं। क्या अपने-अपने परिवार के, जाति के, वर्ग के एवं वर्ण के हित में कार्य करना जातिवाद है? यदि ब्राम्हणवादियों का आरोप सही है, तो वे स्वयं, वहीं कार्य क्यों करतें हैं?
जाति प्रथा के आधार पर छत्तीसगढ़ में एक रिवाज प्रचलित था, जिसके तहत्, किसी बारात में उपस्थिति भिन्न-भिन्न जाति के लोगों को अलग-अलग पंक्ति में बैठाकर भोजन करवाया जाता था। अर्थात व्यक्ति के जाति के, आधार पर उसकी पंक्ति तय होती थी। कुर्मी व्यक्ति तेली के साथ एक 'पक्ति' में बैठकर भोजन ग्रहण नहीं कर सकता था। यह व्यवस्था डॉ. साहब को भेदभाव पूर्ण लगी और उन्होंने इसे तोड़ने के लिये 'पंक्ति तोड़ो' आंदोलन चलाया, अर्थात् कोई व्यक्ति किसी के भी साथ एक पंक्ति में बैठकर भोजन कर सकता है। जाति के आधार पर पंक्ति नहीं होनी चाहिये। इस आंदोलन में वो सफल रहे।
सन् 1952 में होली त्यौहार के समय कराये जाने वाले 'किसबिन नाच' बन्द कराने के लिये ग्राम महुदा (तरपोंगी) ब्लाक - तिल्दा, जिला-रायपुर में सत्याग्रह किया पूर्णतया सफल रहे। किसबा जाति जिनका पुश्तैनी धंधा ही अपनी बहन-बेटियों को तवायफ की तरह नाच-गाने में लगाने का था, उनमें यह चलन बन्द करने के लिये आपने 'भरत वंशी, जातिय सम्मेलन का व्यापक प्रभाव उक्त जाति पर पड़ा और किसबिन जातीय जातीय जीवनधारा में परिवर्तन आया। सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में उनके आदर्श महात्मा कहते थे। डॉ. साहब बताते थे कि महात्मा गांधी, फुले को असली महात्मा कहते थे। शैक्षिणिक एवं सामाजिक रुप से पिछड़ों के आर्थिक मुक्ति के लिये सिलयारी में 'ग्राम उद्योग संघ' का निर्माण, तेल पेराई उद्योग घानी निर्माण, हाथ करघा, धान कुटाई कार्य और साबुन साजी के गृह उद्योग का प्रशिक्षण और उत्पादन तथा मार्केटिंग कार्य का संचालन आपने किया।
सन् 1958-59 में सिलयारी में 'जनता हाई स्कूल' की स्थापना की। जो आज उनके नाम पर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय है। यह कदम उन्होंने आसपास के गांवों के शैक्षणिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिये किया। इस स्कुल को खोलने का दूसरा कारण था, प्रदेश शासन द्वारा धरसीवां विधानसभा क्षेत्र की उपेक्षा। चूकिं 1952 एवं 57 में डा. बघेल, यहां से विरोधी दल के प्रत्याशी की हैसियत से कांग्रेस के प्रत्याशी को हराकर एम.एल.ए. बने थे।
राजनैतिक कार्य:-
डॉ. साहब सन् 1931 तक शासकीय अस्पताल में डाक्टर रहे, शासकीय सेवा से त्यागपत्र दे पूरी तरह से स्वाधीनता आंदोलन में कूद गये। 1931 में ''जंगल सत्याग्रह'' में भाग लेकर साथियों सहित जेल गये। 1932 में ''विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलन'' में पुन: जेल गये, कांग्रेस के पूर्णकालिक सदस्य बन, स्वतन्त्रता संग्राम के लिये, महात्मा गांधी द्वारा चलाये जाने वाले आंदोलन में शामिल हुये, 1932 में रायपुर जिला कांग्रेस कमेटी के डिस्ट्रिक्ट कौंसिल रायपुर में फिजिकल इन्सट्रक्टर के पद पर नियुक्त किये गये। ''भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस'' द्वारा चलाये जा रहे, स्वाधीनता संग्राम में समय-समय पर आयोजित विभिन्न आंदोलनों में सक्रियता से भाग लिया। 1932 में 'द्वित्तीय सविनय अवज्ञा आंदोलन '' में शामिल हुये। सन् 1935 के अधिनियम ‘The Govt. of India Act’ के आधार पर भारत में संघात्मक प्रणाली स्थापित की गई, जिसके फलस्वरुप 1937 में निर्वाचन हुये कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली। डॉ. साहब ने कांग्रेस कार्यकर्ता के रुप में सक्रियता से इन चुनावों में हिस्सा लिया। ग्यारह प्रांतों में से 8 प्रांतों में कांग्रेस को बहुमत मिला, जिसमें ''सी.पी. एवं बरार'' भी शामिल था। द्वित्तीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार को सहयोग कर, पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्ति का प्रस्ताव कांग्रेस द्ववारा 1940 में पास किया गया। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के बाद 1942 में भारत को आजाद करने से इंकार कर दिया। जिसके फलस्वरुप गांधी जी ने 1941 में सत्याग्रह आंदोलन शुरु किया। ''करो या मरो आंदोलन'' ‘Do or Die’ में सक्रियता से भाग लिया और जेल गये। 8 अगस्त 1942 में शुरु ''भारत छोड़ो आंदोलन'' में अपने साथियों सहित 21 अगस्त 1942 को जेल गये एवं ढाई वर्षो तक जेल में रहें।
जून 1946 में प्रांतीय व्यवस्थापिका सभा के निर्वाचन हुये सी.पी. एवं बरार में कांग्रेस को 112 स्थानों में से 92 स्थान मिले। रविशंकर शुल्क के प्रधानमंत्रित्व (तब मुख्यमंत्रियों को इसी नाम से जाना जाता था) में सी.पी एवं बरार, प्रांत में सरकार बनी। डॉ. साहब इस चुनाव में धरसीवां विधानसभा से विधायक चुने गये। कांग्रेस की अंतरिम सरकार में संसदीय सचिव के रुप में कार्य किया। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हसन के साथ, उनहोंने स्वास्थ्य विभाग का भी काम सम्हाला। तत्कालीन मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल से ''किसानों से प्रशासन द्ववारा चन्दा वसुली''के प्रकरण में मतभेद हो गये, और अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 19 मई 1951 में आचार्य कृपलानी के नेतृत्व में बने 'किसान मजदूर प्रजा पार्टी' में शामिल हो गये। सन् 1952 का आम चुनाव हुआ, डॉ. खूबचन्द बघेल ''किसान मजदूर प्रजा पार्टी'' से पुन: धरसीवां विधानसभा क्षेत्र क विधायक चुने गये, उन्होंने कांग्रेस को 53.21% मत प्राप्त कर हटाया था। सन् 1952 में जयप्रकाश नारायण के समाजवादी पार्टी एवं आचार्य कृपलानी के ''किसान मजदुर प्रजा पार्टी'' को मिलाकर ''प्रजा शोसलिस्ट पार्टी'' प्रसोपा (झोपड़ी छाप) के बैनर तले पुन: धरसीवां विधानसभा से निर्वाचित घोषित किये गयें सन् 1954 में ठाकुर प्यारेलाल सिंह के निधन के पश्चात छत्तीसगढ़ में समाजवादी आंदोलन एवं प्रसोपा का कमान डॉ. खूबचंद बघेल के हाथों सौंपा गया।
राजनीति के महत्त्व को बताते हुये डॉ. साहब ने सन् 1965 की अपनी डायरी में लिखा है, कि - ''राजनीति को रचनात्मक कार्यकर्त्ता पाप समझते हैं, किन्तु आज राजनीति राष्ट्र की दिशा-निर्देश, नीति निर्धारण करती हैं। क्या इसे ऐसे लोगों के हाथ सौंपकर निश्चिंत हो जाया जाय जो जाने-अनजाने रचनात्मक कार्यो का नाश कर देगें? ऐसी स्थिति में क्या मात्र निष्ठा से काम चल जायेगा? अत: राजनीति का समर्थक हूं, जिसका प्रभाव आप जनता के जीवन की जड़ों तक पहुंचता है। अत: चुनौती देने वाली समस्याओं को राजनीति का नाम देकर, उससे पिंड छुड़ाने का प्रयास सामाजिक कार्र्यकत्ता ना करें यही मेरी उनसे अपेक्षा है।''
भारत के राजनैतिक परिदृष्य पर, इतिहास के पन्नों से सन् 1955 की डायरी में लिखते हैं - ''मुट्ठी भर लोगों की जगह 'बहुजन समाज' का राज पहिले आदिम काल में सहज स्वभाविक रुप से स्वतन्त्र था।''
सन् 1951 में कांग्रेस से त्यागपत्र देकर जब आचार्य कृपलानी के साथ 'किसान मजदूर प्रजा पार्टी'' में आये तो पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने उन्हें धमकाते हुये, कहा था - ''डाक्टर सोच लो तुम्हें मिटा दिया जायेगा।'' इसका जवाब डॉ. साहब ने कुछ इस तरह दिया था- ''आप मुझसे मेरा सब कुछ छीन सकते हो, मेरी गरीबी नहीं छीन सकते। मेरी बूची टांडी के पसिया को नहीं छीन सकते।'' आचार्य कृपलानी के साथ कांग्रेस त्यागने वाले छत्तीसगढ़ में ठाकुर प्यारेलाल सिंह (रायपुर), ज्वाला प्रसाद मिश्र(अकलतरा) विश्वनाथ यादव, तामस्कर वकील(दुर्ग) आदि थे। ये सभी नेता अपने समय के प्रखर स्वतन्त्रता सेनानी एवं गांधीवादी थे।
छुईखदान तहसील कार्यालय हटाये जाने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे, निहत्थे लोगों पर शासन द्वारा गोली चलाई गई। जिसमें कुछ महिलायें भी शहीद हुई, अनेक घायल हुये। इस गोली चालन के विरुद्ध में उन्होंने ठा. प्यारेलाल सिंह के साथ मिलकर प्रांतव्यापी आंदोलन चलाया। इसी प्रकार लोहांडीगुड़ा, जिला-बस्तर में आदिवासियों पर दिनांक 31.03.1961 में हुये अत्याचार गोली चालन का उन्होंने प्रभावी ढ़ंग से विरोध किया।
डॉ. बघेल ने रायपुर का कुप्रसिद्ध तकाबी कांड, जिसमें किसानों को लूटा गया था, के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की। तकाबी कांड में फंसे अधिकारियों को अंत में सजा मिली, सजा से बचने, संबंधित व्यक्तियों ने डॉ. बघेल की अनुपस्थिति में, उनके घर डाका डलवाकर, कांड से सम्बन्धित कई फाइलें गायब करवा ली थी।
बैतुल जिले के कुछ लोगों ने डॉ. बघेल को ''सायना बांध'' में हुये घपले की खबर दी, डॉ. साहब ने वहां पहुंचकर घपले की पुरी फाइल बनाई। मुख्यमंत्री काटजू के पास चर्चा के लिये पहुंच गये। पूरी के बाद कैलाशनाथ काटजू, मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश ने प्रदेश ने पूछा ''डॉ. बघेल आखिर आप सायना गये क्यों थे ? क्या वहां आपकी कोई रिश्तेदारी है? डॉ. बघेल बोले - डॉ. काटजू आप ठीक-ठीक बतायें की आप जांच कराने तैयार हैं, कि नहीं? अन्यथा मैं इस घपले को आम जनता तक ले जाऊंगा, और वह स्वयं निर्णय लेगी। एक उच्च पुलिस अधिकारी ने रायपुर के अपने कार्यकाल में किसी मामले की डाक्टर साहब द्वारा आलोचना किये जाने को लेकर इंदौर में उन पर मुकदमा चलाया। डॉ. साहब इंदौर जाकर मुकदमा लड़े और विजयी हुये।
डॉ. कैलाशनाथ काटजू के मुख्यमंत्रित्व के दौरान सन् 1960-61 में विंध्यप्रदेश, मध्यभारत एवं छत्तीसगढ़ में अकाल पड़ा विंध्य एवं मध्यभारत को गेहूं निर्यात की छूट और छत्तीसगढ़ के धाननिर्यात पर पाबंदी लगा दी गई। डॉ. साहब ने मुख्यमंत्री से, छत्तीसगढ़ के किसानों के हित में प्रतिबन्ध हटाने की अपील की मुख्यमंत्री नहीं माने। डॉ. साहब ने इस तुलगकी आदेश का उल्लंघन करते हुये, अपने साथियों के साथ 'धान सत्याग्रह' आन्दोलन चलाया। महाराष्ट्र मध्यप्रदेश सीमा पर स्थित बाघ नदी से 1 बोरा धान को स्वयं नाव द्वारा निर्यात कर (म.प्र. से महाराष्ट्र ले जा कर) आंदोलन की शुरुवात की और जेल गये। इस आंदोलन में स्व. बृजलाल वर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री हरिप्रेम बघेल, पूर्व विधायक एवं अन्य साथीगण शामिल थे।
सन् 1962 में विद्याचरण शुक्ल के विरुद्ध ''महासमुन्द लोक सभा'' सीट से चुनाव लड़ा, जिसमें विद्याचरण 2,500 मतों से विजयी हुये थे। इस लोकसभा चुनाव में (आमचुनाव) महासमुन्द लोक सभा के अन्तर्गत आने वाले, सारंगढ़ विधानसभा से, वहां के राजा साहब ने चुनाव लड़ा। उनके विरुद्ध केवल प्रसोपा का एक प्रत्याशी ही था, जिसकी उम्मीदवारी वापस लेने से, वे निर्विरोध निर्वाचित हो सकते थे।
इसके लिये राजा साहब ने डॉ. बघेल को 30,000/-रूपया (तीस हजार) घूस के रूप में देने की पेशकाश की। सिद्धांत के पक्के डॉ. बघेल ने राजा साहब के प्रस्ताव को ठुकराकर हारना पसन्द किया। डॉ. बघेल देवभोग से सराईपाली तक विद्याचरण से आगे रहे पर सारंगढ़ में 12,000 मतों से पिछड़कर 2500 (ढाई हजार) मतों से हार गये। डॉ. बघेल ने विद्याचरण के विरुद्ध चुनाव याचिका दायर की और विद्याचरण का निर्वाचन रद्द कर दिया गया।
''मांछी खोजे घाव अऊ राजा खोजे दांव'' वाली कहावत चरितार्थ करने, पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र (जिसके विरुद्ध भी 1962 के चुनाव जीतने में कदाचरण की याचिका न्यायालय में दायर कर दी गई थी।) ने कोचककर घाव बनाया एवं समाजवादी पार्टी के मुखिया डॉ. बघेल को घेरा। इस षडयन्त्र में विद्याचरण को भी शामिल किया गया, क्योकि उनके विरुद्ध भी चुनाव याचिका थी, दुश्मन (डॉ. बघेल) का दुश्मन (विद्याचरण) दोस्त बन गये। सिलयारी घानी संघ जो सहकारी क्षेत्र में था, की जांच (ऑडिट) करवाकर कुछ गलतियां निकाली गई। डॉ. बघेल का इसमें कोई हाथ नहीं था, उन्हें तो राजनीति से ही फुर्सत नहीं था। पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र ने डॉ. बघेल को कहा, कि आपके द्वारा संचालित संघ में पैसे की गड़बड़ी है, और इससे आपके प्रतिष्ठा को गहरा आघात लग सकता है। आप कांग्रेस में आते हैं, तो इसे नजर अंदाज किया जा सकता है। डॉ. बघेल ने सोचा जिस छत्तीसगढ़ की सेवा विरोधी पार्टी में रहकर वो नहीं कर नहीं रहें हैं, वह सत्ता के माध्यम से अच्छा हो पायेगा। प्रतिष्ठा भी बची रहेगी। डॉ. बघेल ने कांग्रेस प्रवेश करना स्वीकार कर लिया। लेकिन कभी भी कांग्रेस में चैन से नहीं रह पाये। सन् 1966 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डी.पी. मिश्र थे, बस्तर में राजा प्रवीरचन्द भन्जदेव के कारण बस्तर के 12 विधान सभा सीटों में कांग्रेस की दाल नहीं गलने वाली थी। राजा प्रवीरचन्द भन्जदेव ने न केवल बस्तर जिला कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्याग पत्र दिया था। वरन कांग्रेस भी छोड़ दी। द्वारिका प्रसाद मिश्र बस्तर के 12 सीट कांग्रेस की झोली में डालकर, इंदिरा गांधी को खुश करना चाहते थे। प्रवीर चन्द भन्जदेव एवं 300 आदिवासियों की पुलिस गोली चालन कर हत्या करवा दी गई। इस घटना का मार्मिक चित्रण डॉ. बघेल ने लोगों के सामने रखा, आम जनता को इस काण्ड की बर्बरता का विवरण दिया। इस कांड से दुखी डॉ. साहब ने कांग्रेस इस्तीफा दे दिया।
भिलाई स्टील प्लांट की स्थापना में जिन किसानों की जमीन अर्जित की गई, उनके परिवार से एक व्यक्ति को अनिवार्य रुप से कारखाने में रोजगार दिलवाने श्री तामस्कर जी के साथ मिलकर किसानों एवं मजदूरों का विशाल प्रदर्शन डॉ. बघेल के नेतृत्व में किया गया। शासन ने स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देना स्वीकार किया। हीराकुन्ड बांध निर्माण से जिन किसानों की जमीन डूब में आ गई थी, उसके मुआवजे के लिये आंदोलन चलाया, इस आंदोलन में श्री रामकुमार अग्रवाल रायगढ़ ने साथ दिया। किसानों को उनका हक मिला।
1946 में जब 'सी.पी. एवं बरार' प्रांत के प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री तब इसी नाम से जाने जाते थे।) के चुनाव में बृजलाल बियानी भी एक उम्मीदवार थे, पं. रविशंकर शुक्ला के विरुद्ध, बियानी का समर्थन देने के बदले डॉ. बघेल को 3 लाख रुपये देने का प्रस्ताव गोपाल दास मेहता ने रखा। डॉ. बघेल उसूल के पक्के, निष्ठावान राजनीतिज्ञ थे, यह प्रस्ताव ठुकराकर, पं. रविशंकर शुक्ल के लिये प्रधानमंत्री पद का रास्ता प्रशस्त किया। 1946 में स्वास्थ्य विभाग के सचिव आई.सी.एस., मि. सिन्हा थे, डॉ. हसन, स्वास्थ्य मंत्री (केबीनेट) थे। सचिव की लापरवाही से विधानसभा में डाक्टरों की नियुक्ति को लेकर प्रश्न उठने की नौबत आ गई। मि. सिन्हा को बुलाकर डॉ. साहब ने खरी-खोटि सुनाई, सिन्हा जी ने अपनी पत्नी के माध्यम से काजू-किसमिस, अंगुर, सेबफल से भरी टोकरी राजकुंवर देवी (डॉ. साहब की पत्नी) तक डॉ. साहब की अनुपस्थिति में पहुंचवाई। डॉ. बघेल ने पत्नी से पूछा इसे कौन लाया? तुरन्त अपने चपरासी गोपाल के हाथ उस टोकरी को सिन्हा के घर वापस पहुंचवा दिया।
गांधी जयंती के उपलक्ष्य में चन्दा इकट्ठा करने नेवरा, लखनलाल मिश्र, भुजबल सिंह एवं जगन्नाथ बघेल के साथ गये। एक राइस मील के मालिक ने उनसे कहा, 'आप कोड़हा मध्यप्रदेश से बाहर भेजने का परमिट मुझे दिला दीजिये, मैं अकेला 7,500/- (साढ़े सात हजार रुपये) चन्दा देता हुं। डॉ. बघेल ने इंकार कर दिया। घर-घर जाकर रुपये इकट्ठा कर लाये। गांधी जयंती सम्पन्न हुई।
डॉ. बघेल ने पं. रविशंकर शुक्ल से मतभेद के कारण मंत्रीमंडल से इस्तीफा दिया था। कारण पं. जी के प्रधानमंत्री बनने की खुशी में, महासमुंद के सेठ नेमीचंद श्री श्रीमाल ने उन्हें चांदी से तौलने की योजना बनाई। इसे मूर्तरुप देने के लिये प्रशासन के माध्यम से आदिवासी क्षेत्र पिथौरा, सराइपाली, बसना, महासमुन्द, बागबाहरा के किसानों से चंदा जबरदस्ती वसूल किया जाने लगा। लोगों ने अपना खेती-बाड़ी, गाय-बकरी-मुर्गी यहां तक की घर के जेवर एवं बर्तन बेचकर चंदा चुकाया। इसकी तीखी प्रतिक्रिया की हुई कुछ आदिवासियों ने नागपुर (सी.पी.एवं बरार की राजधानी) जाकर डॉ. बघेल को अपनी व्यथा कथा सुनाई। उन्हें परस्पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने प्रधानमंत्री पं. र. शं. शुक्ल से मिलकर इस विषय में चर्चा की, पंडितजी ने कहा ''राजनीति में यह सब चलता हैं। हालांकि मैने शासकीय कर्मचारियों को ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है, इसलिये रोक लगाने के आदेश की जरुरत नहीं है।'' डॉ. बघेल ने छत्तीसगढ़ के इसी शोषण, पीड़ा, लूट के विरुद्ध व्यथित, दुखी होकर अपना इस्तीफा दिया था।
ग्राम-मौहागांव सिलयारी त. व. जि. रायपुर के एक अनुसूचित जाति के किसान को सरकार द्वारा पंप लगाने के लिये 6,000/- (छै हजार) रुपये मंजूर किया गया। तत्कालीन तहसीलदार ने उसे 4, 000/-(चार हजार) रुपये ही देकर, बांकी अपने पास रख लिया, इसकी शिकायत उक्त किसान ने डॉ. साहब से की। वे उस समय धरसीवां के विधायक थे। तहसीलदार के विरुद्ध मामला दायर किया, रायपुर के वकील डॉ. बघेल के तरफ से खड़ा होने तैयार नहीं हुये, दुर्ग से तामस्कर वकील को लाकर भ्रष्टाचार का मुकदमा जीते। तहसीलदार को बरखास्त कर दिया गया।
डॉ. बघेल का जीवन, ऐसे कितनों ही घटनाओं से भरा पड़ा है। उनहोनें अपने 39 (उन्चालिस) वर्ष (सन् 1931 से 1969) के राजनैतिक जीवन में जीवन पर्यन्त दलित-शोषित, मजदूर, किसानों एवं गरीब जनता की आवाज बुलंद की और बदले में कभी भी कुछ पाने की कामना नहीं की। खासकर आर्थिक लाभ कभी नहीं उठाया। प्रजातंत्र की महत्ता को आम जनता तक पहुंचाने सतत संघर्ष किया।
छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन- वैसे तो सप्रे स्कुल में सन् 1946 में आयोजित 'प्रदेश कांग्रेस कमेटी' की बैठक में तामस्कर वी.वाय. ने, छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्जा दिलाने की बात रखी थी। लेकिन ''प्रदेश कांग्रेस कमेटी'' में, जिसके अध्यक्ष पं. रविशंकर शुक्ला थे, वी.वाय. तामस्कर के प्रस्ताव को अनसुनी कर दी।
डॉ. बघेल के मन में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के मांग ने, तब घर कर लिया, जब सन 1948 में उन्होंने रविशंकर शुक्ल मंत्रीमंडल से, पिथौरा बसना-सरायपाली के पिछड़े, आदिवासियों से जबरन चंदा वसूल की गई थी। डॉ. बघेल इस प्रकरण से इतने द्रवित हुये, कि उन्होंने शुक्ल मंत्रीमंडल से ही इस्तीफा दे दिया। उन्होंने एक लेख लिखा, शीर्षक था ''क्षुब्ध - छत्तीसगढ़'' इस लेख से ''रायपुर -बिलासपुर और दुर्ग ये तीन जिले और हाल के विलीनीकरण से शामिल हुये, 14 रजवाड़े यही छत्तीसगढ़ का इलाका है। सत्ता के मद में माते लोगों को भुलावे में डालने के लिये, छत्तीसगढ़ के परमपुनीत जागरण के कोलाहल को पाकिस्तानी नारा कहकर दफना देना चाहते हैं। वे कहते हैं। ''छत्तीसगढ़िया चेतना की आवाज लगाने वाले देश के दुश्मन है। उनके साथ शासन रियायत ना करेगा। उन्हें कुचल देगा। देखो खबरदार कोई साथ मत देना, नहीं तो आफत मोल लोगे।
छत्तीसगढ़ के हित में जो अपना हित समझते हैं। वे हमारे भाई हैं। जो छत्तीसगढ़ का राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य तरीकों से शोषण करना चाहते हैं। हमारे प्रेम के पात्र नहीं हो सकते। क्या यह विचार देशद्रोह पूर्ण है? यदि हो, तो हम अपना बचाव नहीं करना चाहते। यदि हमारे विचार में भुल हो तो, हमें प्रेम से समझाया जाय। हम वायदा करते हैं, कि समझ लेने पर हम अपनी भुल सूधार लेगें। परन्तु यदि धमकी के बल पर हमें दबाने की कोशिश की गई, तो हमारा हृदय स्वीकार नहीं कर सकेगा।''
डॉ. रामलाल कश्यप जी (पूर्व कुलपति पं. र.वि.वि.रायपुर) ने जब वे जबलपुर कृषि महाविद्यालय में अध्ययनरत थे, तो डॉ. बघेल से पूछा - आप छत्तीसगढ़ी आंदोलन के प्रणेता माने जाते हैं, तो आपके छत्तीसगढ़िया की परिभाषा क्या हैं? डॉ. बघेल ने उत्तर दिया ''जो छत्तीसगढ़ के हित में अपना हित समझता हैं। छत्तीसगढ़ के मान-सम्मान को अपना मान-सम्मान समझता हैं, और छत्तीसगढ़ के अपमान को अपना अपमान समझता हैं, वह छत्तीसगढ़ी हैं। चाहे वह किसी भी धर्म, भाषा, प्रांत जाति का क्यों ना हो।''
ठाकुर प्यारेलाल सिंह द्वारा सम्पादित, प्रकाशित अर्ध-सप्ताहिक पत्र ''राष्ट्र बंधु'' में डॉ. बघेल के लेख प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। उन्होंने आचार्य कृपलानी के लेखों का, अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद भी किया। बालौद की एक सभा में डॉ. साहब ने कहा था- 'आज प्रत्येक छत्तीसगढ़िया समझ रहा हैं, कि आज प्रजातांत्रिक राज्य हो गया है, किन्तु असली स्वराज तो कोषों दूर हैं। वे मानते थे कि छत्तीसगढ़ राज्य के असली शोषक एवं शोषित एवं शोषित कभी एक साथ नहीं रह सकते। शोषण, अन्याय और दमन जहां है, वहां स्वराज्य हो नहीं सकता, यह उनकी निश्चित धारणा थी। उनका तो बस एक ही लक्ष्य था ''छत्तीसगढ़ के सोये स्वाभिमान को जगाना उसके गौरव गरिमा को उजागर करना उसे शोषण, अन्याय और दमन से मुक्त करना।''
सन् 1956 में छत्तीसगढ़ राज्य की कल्पना को साकार रुप देने जुझारु एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं का एक वृहद सम्मेलन राजनांदगांव में आयोजित किया गया। दाऊचन्द्रभूषण दास इसके संयोजक थे। पहले सत्र की अध्यक्षता बैरिस्टर मोरध्वजलाल श्रीवास्तव एवं दुसरे सत्र की अध्यक्षता बाबू पदुमलाल पन्नालाल बक्शी ने की। इसमें सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ से लगभग दो हजार सक्रिय कार्यकर्ता शामिल हुये। सम्मेलन में 'छत्तीसगढ़ी महासभा'' का गठन हुआ और डॉ. खूबचन्द बघेल इस महासभा के सर्वसम्मति से अध्यक्ष निर्वाचित हुये। दशरथलाल चौबे सचिव तथा केयूर भूषण एवं हरि ठाकुर को संयुक्त सचिव के पद पर मनोनित किया गया। डॉ. साहब ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के मांग पर (औचित्य पर) व्यापक प्रकाश डाला फलस्वरुप सर्वसम्मति से ''छत्तीसगढ़ राज्य'' निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया। इतिहास ने एक नया मोड़ लिया। पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना के संघर्ष की नींव डल गई।
25 सितम्बर 1967 को 'छत्तीसगढ़ी महासभा' को पूनर्गठित करने भोला कुर्मी छात्रावास, रायपुर में एक सभा आयोजित की गई। इसमें छत्तीसगढ़ के 500 सक्रीय कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। अध्यक्षता साहित्यकार बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव ने की। डॉ. खूबचन्द बघेल सर्वसम्मति से इसके अध्यक्ष चुने गये। तथा परसराम यदु, रेशमलाल जांगडे, पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र, तथा पं. गंगाधर दुबे उपाध्याय चुने गये। साहित्यकार हरि ठाकुर सचिव तथा रामाधार चन्द्रवंशी कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुये। डॉ. साहब, राज्य सभा सदस्य केन्द्रीय स्टील माइन्स एवं मिनरल समिति एवं नेशनल रेल्वे यूजर्स सलाहकार समिति के सदस्य थे। स्थानीय लोगों को सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाओं के नौकरियों में प्राथमिकता दिलवाने कई आंदोलन छेड़े। दिनांक 8 फरवरी 1967 को दुर्ग जिले के अहिवारा में भातृसंघ का विशाल सम्मेलन बृजलाल वर्मा जी, की मुख्य आतिथ्य में राजा नरेश चन्द्र सिंह ने उद्धाटन किया। छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को लेकर डॉ. साहब ने पूरे छत्तीसगढ़ का सघन दौरा कर प्रचार-प्रसार किया। आज छत्तीसगढ़ में जो जन चेतना दिखाई देती है, उसके पीछे डॉ. साहब का पसीना एवं परिश्रम है। ''छत्तीसगढ़ भातृ संघ'' आगे चलकर इतना प्रभावी हुआ की पं. श्यामाचरण शुक्ल की सरकार ने शासकीय कर्मचारियों को इसकी सदस्यता ग्रहण कर कार्यकलापों में हिस्सा लेने पर पाबंदी, सामान्य प्रशासन विभाग के ज्ञापन क्रं 0527/567/ध/62 दिनांक 23.09.1971 द्वारा लगायी थी। इस ज्ञापन को श्री प्रकाश चन्द्र सेठी की सरकार (म.प्र.शासन) ने दिनांक 19.05.1974 के ज्ञापन क्रं 5-/75/3/1 द्वारा निरस्त किया। आज डॉ. बघेल संपूर्ण छत्तीसगढ़ शासन ने उनके नाम से प्रतिवर्ष 2 लाख रुपये के पुरुस्कार दिये जाने की घोषण की है।
सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्य-
छत्तीसगढ़ी साहित्य के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा है। डॉ. बघेल मौलिक चिंतक थे। नित्य सुबह चार बजे उठकर ध्यान और चिंतन में मग्न हो जाते थे। उनकी लेखनी काफी सशक्त थी। डॉ. बघेल को हर वक्त छत्तीसगढ़ियों की पिछड़ी मानसिकता, दब्बुपन, आर्थिक गुलामी की पीड़ा सताती थी। आखिर मेरे छत्तीसगढ़ में क्या कमी है? यह हमेशा वो चिंतन करते रहते थे। छत्तीसगढ़ी में उन्होंने तीन नाटक लिखे पहला 'ऊंच-नीच' समाज में व्याप्त छुवाछुत और जातिवाद पर करार प्रहार करते हुये। दूसरा 'करम-छड़हा' छत्तीसगढ़ के आम आदमी की गाथा उसकी बेबसी का वर्णन एवं तीसरा ''जनरैल सिंग'' जो छत्तीसगढ़ के दब्बुपन को दूर करने का रास्ता सुझाया। इन नाटकों को मंचित करने का दायित्व भी उन्होंने स्वयं निभाया। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय ''भारतमाता'' नामक नाटक लिखकर मंचित करवाया। मंचन के माध्यम से पथरी, करुद आदि गांवों से धन एवं सहयोग एकत्रित कर प्रधानमंत्री राहत कोष में भिजवाया। रायपुर के समाचार पत्रों अन्य प्रचार माध्यमों में लेख लिखकर हमेशा अपने विचारों से लोगों को अवगत कराते रहते थे। महात्मा ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी एवं डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारधाराओं से ओतप्रोत ये लेख रायपुर से प्रकाशित साप्ताहिक ''राष्ट्रबंधु'' के माध्यम से प्रसारित होते रहते थे।
अपने विचारों को लिपिबद्ध करने के लिये रोज डायरी एवं रजिस्टर का इस्तेमाल किया करते थे। अपने लेखन में डॉ. साहब ने अपने विचारों के अलावा महत्वपूर्ण घटनाओं को भी स्थान दिया हैं। वे सारी घटनायें जो उनके 'सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन एवं राजनैतिक संघर्ष के दौरान घटी का विस्तृत विवरण उनकी डायरी एवं रजिस्टरों में मिलती है। अपने लेखन एवं बातों को लोगों तक रोचक ढंग से पेश करने के लिये शेरों-शायरी, कहावतें, मुहावरों का उपयोग कर चुटीला बनाना उनकी खूबी थी। शेर जो उन्हें प्रिय था, हमेशा युवकों को प्रेरणास्वरुप सुनाया करते थे:-
क्या हुआ मर गये, वतन के वास्ते।
बुलबुले भी होते हैं कुर्बान, चमन के वास्ते॥
खाली न बैठ, कुछ-ना-कुछ किया कर।
कुछ ना मिले तो, पैजामा उधेड़कर सिया कर॥
सांस्कृतिक चेतना फैलाने उन्होंने अपने दामाद दाऊ रामचन्द्र देशमुख को प्रेरित कर ''चंदैनी गोंदा'' नामक सांस्कृतिक संस्था का सृजन करवाया। जिसकी ख्याति ना केवल छत्तीसगढ़ में, बल्कि सम्पूर्ण भारत में फैली। इस सांस्कृतिक संस्था का शुभारंभ एवं समापन डॉ. बघेल के जन्म स्थली ग्राम पथरी से हुआ।
डॉ. बघेल के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुये, छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार मधुकर खेर लिखते हैं - प्रचार तंत्र का स्वन्तत्र एवं जाल न होने के कारण डॉ. बघेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्थान नहीं मिल पाया जिसके वो हकदार थे।
डॉ. खूबचन्द बघेल को प्रोफेसर रंगा, चौधरीचरण सिंह एवं महेन्द्र सिंग टिकैत से कम नहीं आंका जा सकता। 1965 के भीषण अकाल के दौरान 'टाइम्स' अमेरिका की महिला पत्रकार संवाददाता लिखती हैं- मेरे 2 घंटे तक डॉ. खूबचन्द बघेल का इन्टरव्यू लेने के बाद छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े क्षेत्र में ऐसा जुझारु, कर्मठ, नेतृत्व भी हो सकता है, इस बात पर मुझे आश्चर्य है।
ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी जुझारु, जबरदस्त राजनेता, सामाजिक परिवर्तन के प्रणेता, छत्तीसगढ़ राज्य के प्रथम स्वप्न ट्टष्टा एवं महान सपूत जिन्होंने आम जनता को स्वतन्त्रता के बाद भारतीय संविधान के तहत प्राप्त प्रजातांत्रिक अधिकारों की सतत रक्षा के लिये लोगों को जागृत करने का संधर्ष किया। प्रजातंत्र को वीरकाल तक स्थापित रखने के महत्तव और उस पर आघात करने वाले कारणों एवं लोगों के विरुद्ध सतत संघर्ष करते रहने का संदेश दिया। संसद के शीतकालीन सत्र में भाग लेने वे दिल्ली गये हुये थे। इसी दौरान 22 फरवरी सन् 1969 को हृदयकालीन रुक जाने से उनका दिल्ली में निधन हुआ। उनकी अंत्येष्टी रायपुर के महादेव घाट में की गई। ऐसे महान व्यक्तित्व को उनके ही प्रेरणा वाक्य से श्रद्धांजली अर्पित करते हैं:-
दिये बिना संताप किसी को,
झुके बिना यदि खल के आगे।
संतो का कर सकुं अनुसरन,
तो थोड़े में ही सब कुछ जागे॥




















