| 17 जनवरी 2010
आप रामकुमार सिंगरौल के अनुज थे आपका जन्म 15 अगस्त 1921 को हुआ था। 9 अगस्त 1942 को गांधी जी ने अंग्रेजों को ललकारा-अंग्रेजों भारत छोड़ो, और देश वासियों से कहा-करो या मरो। रघुनंदन जी देश सेवा के हित में मरने की सोचने लगे। खुफिया पुलिस की एक देशभक्त सिपाही भखऊदास से शुभ समाचार मिली की मालखाने में बंदूक की 20 हजार गोलियां रखी हुई है। आपने अपने मित्रों मोतीलाल श्रीवास्तव और मनोहर दास के साथ मालखाने में आग लगाने की योजना बनाई। कागज पर संकल्प लिखे और खून से हस्ताक्षर किए।
28 अगस्त 1942 की रात में तीनों ने पुलिस के पहरे से बचते हुए मिट्टी तेल के चार गोले मालखाने में फेंक आए। रघुनंदन दोनों मित्रों को छोड़ एक अन्य मित्र के साथ सीधे शारदा टॉकिज पहुंचे जहां दिलरूबा डांसिग पार्टी का कार्यक्रम चल रहा था वहां पुलिस कप्तान के रीडर अजयसिंह के बाजू में बैठ गये। उनके समीप ही बैठे थे पुलिस इंस्पेक्टर अब्दुल रसीद और सिपाही भखऊदास। रघुनंदन के मित्र ने मंच पर एक सिक्का उछाल दिया। रघुनंदन का सबक नजरों में आने का उद्देश्य पूरा हुआ। रघुनंदन चिंतित था कि धमाका क्यों नहीं हुआ। बाद में पता चला कि मालखाना अंदर से दो भागों में है। जिस भाग में आग लगी वहां गोलियां नहीं बल्कि तंबू आदि रखे हुए थे। लेकिन प्रशासन हिल गयी कलेक्टर, एस.पी., खुफिया अधिकारियों की उसी रात बैठक हुई। दुस्साहसिक कार्य को देखते हुए रघुनंदन पर ही शक किया गया। दुसरे दिन रघुनंदन को गिरफ्तार कर खूब पिटाई की गयी लेकिन उसने मुंह नहीं खोला। जांच, गबहियां, तलाशी ही चल रही थी कि अपने मित्र ठाकुर जसवंत सिंह जो म्युनिसिपल आफिस के कर्मचारी थे कि योजनानुसार उन्होंने म्युनिसिपल आफिस में आग लगा दी। यह आफिस रघुनंदन जी के घर के सामने ही था। आग बुझवाने आए पुलिस अधिकारी मिस्टर लव्हडे के कहने पर आग बुझाने भी जाना पड़ा। म्युनिसिपल सेक्रेटरी उमाशंकर पंडया के कमरे में आलमारी में एक लाख रूपये के वार-वाण्ड ओर जरूरी कागजात थ। पंडया के अनुराध पर रघुनंदन जी जलती भवन की आलमारी से उक्त कागजात निकालकर आए। कुछ ही देर बाद पूरी आफिस जल गई कैसा अनोखा व्यक्त्वि था रघुनंदन जी का। कलेक्टर और पुलिस कप्तान को पक्का विश्वास हो गया कि दोनों जगह आग रघुनंदन ने ही लगाया है। दुसरे दिन प्रात: इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। फिर रोज पुलिस की पिटाई, लात घूंसा, कंबल लपेट कर पिटाई, मियार से लटकाकर पिटाई चलता रहा, लेकिन उन्होंने अपराध स्वीकार नहीं किया। क्योंकि अपराध स्वीकार करने का मतलब केवल फांसी ही था। पिटाई का सिलसिला 8 दिन तक चलता रहा। 14-09-1942 को इन्हें विधिवत गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेज दिया गया।
रघुनंदन प्रसाद सिंगरौल का देहावसान 20-12-1994 को हुआ।





















