| 17 जनवरी 2010
रामप्रसाद देशमूख जी स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम पीढ़ी के सेनानी हैं। आपका जन्म ग्राम पिनकापार में सन 1878 में एक सामान्य कृषक परिवार में हुआ था। आप प्रखर बुध्दि के छात्र थे। आपने 9 वर्ष की उम्र में ही अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर ली थी किंतु धनाभाव के कारण आगे नहीं पढ़ सके लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति सुधरते ही अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के लिए राजनांदगांव गये और मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। नागपुर से हिस्लाप कालेज से बी.ए. पास कर आप नांदगांव में शिक्षक बन गये लेकिन उसे भी छोड़कर वकालत की पढ़ाई करने इलाहाबाद गये और 1914 में 35 वर्ष की उम्र में वकालत पास की। आपने सन् 1914 में दुर्ग में वकालत प्रारंभ की।
आपने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार की और सहकारिता आंदोलन में रूचि लेना शुरू कर दिया। देशमुख जी दुर्ग जिले में सहकारिता आंदोलन के पुरोधा थे। दुर्ग सहकारी समिति के प्रारंभिक 4 वर्षों तक आप सचिव रहे और इसके पश्चात लगातार 11 वर्षों तक इसके अध्यक्ष रहे। आपके ही प्रयासों से ही सन् 1935 मे दुर्ग जिला भूमि विकास बैंक की स्थापना हुई। आप अनेक वर्षों तक इसके अध्यक्ष रहे। आप प्रांतीय सहकारी बैंक के कई वर्षों तक अध्यक्ष रहे। इसी समय आप दुर्ग डिस्ट्रीक्ट काऊंसिल से जुड़े और सन् 1924 में डिस्ट्रीक्ट काऊंसिल के चेयरमेन चुने गये। सन् 1927 तक आप इस पढ़ पर बने रहे। एक बार आप दुर्ग म्युनिसिपल कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।
सन् 1930 के अक्टूबर माह में गांधी चौक में कांग्रेस द्वारा आयोजित जनसभा में आपने भाषण दिया आपको धारा 117 में गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेज दिया गया। एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। किंतु गांधी-इरविन पैक्ट के अनुसार 6 माह 17 दिन बाद छोड़ दिये गये। सन् 1932 के प्रारंभ में आपकी आंखे चली गयी। किंतु फिर भी एक वर्ष तक चेरमेन का कार्यभार संभालते रहे। आंखें खो देने के बाद आपने अन्न खाना छोड़ दिया। केवल मौसमी फल एवं दुध ही लेते थे। देशमुख जी गांवों में जाकर आजादी के लड़ाई के साथ ही नशाबंदी का चर्चा भी करते थे। आपकी स्वदेशी भावना इतनी दृढ़ थीं कि आप हाथ कुटे चावल का उपयोग करने का आग्रह करते थे, आपने जब तक भोजन किया, हाथ का कुटा चावल ही खाया।
सन् 1940 के 8 अगस्त से प्रारंभ व्यक्तिगत आंदोलन में नेत्रहीन होने के कारण आपको (प्रदेश कांग्रेस कमेटी से) भाग लेने की अनुमति नहीं मिली। व्यक्तिगत आंदोलन की यही विशेषता थी कि जिसे कांग्रेस हाई कमान से अनुमती मिलेगी, वहीं इस आंदोलन में भाग लेगा। अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया था। आजादी के लाखों दिवाने जेलों में बंद थे तब बेचैन देशमुख जी ने नवम्बर 1942 में एक दिन लक्ष्मण साव नामक कांग्रेस कार्यकर्ता की सहायता से दुर्ग के गांधी चौक पर पहुंचे और अपना भाषण प्रारंभ किया, उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर जेल भेज दिया गया। उन पर न तो कोई मुकदमा चलाया गया और न ही सजा हुई। जेल में पूरे समय तक डिटेन्सन में रखा गया। लगभग एक वर्ष के कारावास के बाद सन् 1943 में आपको जेल से रिहा किया गया।
आंखों से लाचार रामप्रसाद देशमुख जी पिनकापार में शराब दुकान होने के कारण व्यस्थित मन से अपने दूसरे गांव खमतराई में रहते थे, वही 11 जनवरी 1944 को आपकी मृत्यु हुई। रामप्रसाद जी देशमुख स्वतंत्रता सेनानियों की पंक्ति में अलग दिखाई देते थे। उनके प्रखर व्यक्तित्व का पता इसी बात से चलता है कि आंखे खोने के बाद भी उन्होंने प्राणपन से देश की आजादी के लिए अपने आपको होम कर दिया।





















