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बालाजी भोंसले, 16वीं शताब्दी के में पूना जिले में, पाटस सब-डिविजन, जो उस समय अहमदनगर के निजामशाह के निजामशाह के अधीन था, के निवासी थे। कृषि पर आधारित परिवार था। हिंगानी तथा दीवलगांव नामक ग्रामों के मुखिया (पटेल) के पद से भी आय होती थी। उसके दो बेटों, माहोजी और बिठोजी हुये, ये दौलताबाद की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित वेरूल (एलोरा) गांव में जा बसे। पर कृषि से गुजारा नहीं होने पर, सिंधरेड़ के निजामशाही दरबारी जादवराव के पास समान्य सैनिक के रूप में नौकरी कर ली।

भारतीय इतिहास के पन्ने सदियों से अपनी दासता की गाथा प्रस्तुत करते हैं। भारत सदियों से विदेशियों के अधीन रहा। आर्यो के पश्चात शक-हुण-कुषाण; शिया-सन्नी-मुगल-पठान एवं अन्त में डच-पुर्तगीज-फ्रेन्च-अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन स्थापित कर सतत शोषण किया। विदेश आक्रमणकारियों एवं भारतीय शासकों के काल में राजतन्त्र स्थापित रहा। अंग्रेजों ने इस देश में प्रजातन्त्र की नींव रखी। भारतीय मूल के निवासियों में छत्रपति शिवाजी महाराज ने भारतीय राष्ट्र की पुन: स्थापना की कोशिश की। उनका यह सपना उनकी मृत्यु के पश्चात छिन्न-भिन्न हो गया।

भारत की आजादी के आंदोलन में सक्रीय योगदान देकर एवं तत्कालीन भारत में चल रहे राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन Dr.Khoobchand Baghel(डॉ.खूबचंद बघेल)तथा आर्थिक मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेकर जिन्होंने इतिहास रचा है, उनमें एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. खूबचंद बघेल जी का भी है। छत्तीसगढ़ राज्य जो अस्तित्व में 1 नवम्बर 2000 से आया है, उसके प्रथम स्वप्न दृष्टा, डॉ. खूबचंद बघेल जी ही थे। आज भले ही उन्हें इसकी मान्यता देने में उच्च वर्ण एवं वर्ग के लोगों को हिचकिचाहट  होती है, लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य/तथ्य है ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था को विछिन्न कर समस्त मानव जाति को एक जाति के रूप् में देखने की चाहत रखने वाले डॉ. बघेल के व्यक्तित्व में छत्तीसगढ़ की खुशबू रची-बसी थी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिये त्याग और बलिदान करने वालों में डॉ. साहब का नाम अग्रिम पंक्ति पर है

Dr.Durgasingh Sirmourफल व्यक्तियों के जीवन में सहयोगियो का कितना महत्व होता है इस बात को अगर करीब से देखना और समझना हो तो प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और छत्तीसगढ़ राज्य के स्वप्नदृष्टा डॉ. खूबचन्द बघेल के अनयय भक्त और पथगामी डॉ. दुर्गासिंह सिरमौर के जीवन दर्शन को देखकर जाना और समझा जा सकता है। आज 92 वर्ष की अवस्था पार कर लेने के बाद भी डॉ. बघेल के प्रति डॉ. सिरमौर का समर्पण देखने को मिलता है, उनकी धुधंलती स्मतियों में डॉ.बधेल के साथ बितायें पलों, उनसे जुडी बातों और घटनाओं की ऐसी छवि रची बसी है जिन्हें सुनकर मन पुलकित हो उठता है सामाजिक सरोकार होने के कारण प्रायः उनसे मिलने और वार्तालाप करने का सौभाग्य प्राप्त होता है इस दौरान हर बार उनसे डॉ. बघेल से जुडी हुई नई बातों की जानकारी प्राप्त होती है। स्वतंत्रता संग्राम के समय महात्मा गांधी के साथ उनके आश्रम में बिताए दिनों, जेल में भोगे पलों और उस दौर के महान स्वतंत्रता सेनानियों के सानिध्य में गुजरे क्षणों को भी वे याद करने से नहीं चूकते।

Keyur Bhushan At Kurmi Samaj भारत के आजादी के 'आवा' म, अपन आप ला झोंकइया सेनानी मन के पांत मं, डॉ. खूबचंद बघेल के नांव ह, छत्तीसगढ़ी जमात मं अगुवा हे। ऊंखर त्याग अऊ बलिदान के कहिनी ह आज घर-घर मं सुनाय जाथे।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार, गांधीवादी चिंतक समाजसेवी श्री केयूरभूषणजी

डॉ. खूबचंद बघेल, छत्तीसगढ़ अंचल के जाहिरा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी यें। एक पोठहर किसान के बेटा, सरकारी नौकरी के बड़का ओहदादार, नामकड़ी डॉक्टर रहिन। तेन मान-सम्मान के हैसियत ल छोंड क़े, सुराज के लड़ई म कूद परिन। अकेल्ला नहीं माई पिल्ला। घर गोंसईन, दाई, भाई, कका, ममा, सबे मिलाके एक परिवार के आठ झन सुराज के लड़ई म जूझगें। ओखर जनम गांव 'पथरी सुराज के लड़ई के किल्ला बनगे।

मैं ह जब ले होस सम्हालेंव तब ले एकेच्च ठक प्रसन उठीस मोर मन में के छत्तीसगढ़ के भाई मन दूसर प्रांत के आए भाई मन ले काबर अपमानित अउ निरादित होथें। हमर मन में बल, बुद्वि अउ योग्यता नइये। काय कारन हें के छत्तीसगढ़िया मन ल सब बेवकूफ समझथें। दूसर प्रांत के मनखें मन नानकून बेपार चालू करके धन्ना सेठ बन जथें। छत्तीसगढ़ के हर सपूत के मन में ये प्रसन ह उठत होही अउ पीरा पहुंचत हो ही के ये छत्तीसगढ़ ह पिछड़े काबर हे असिक्छा, रूढ़िवाद भाग्य ऊपर भरोसा मूर्खता अउ आलस यही ह हमार पिछड़ेपन के कारण आय। सबोझन सोचत होहू के येखर निदान हो सक थें। संगठन ले एखर निदान हो सक थें। संगठन ले एकता पैदा करके कोनों भी काम ल जीते जा सकत हें। संगठन  ले छत्तीसगढ़ के उध्दार होही। मै छत्तीसगढ़ महासभा के तरूण तेजस्वी युवक मन से कहना चाहत हों के बाहरी चमक ल छोड़ के साधना, कर्तव्य, आत्मबल के सहारा लेके आगे बढ़ ले परही तभें संगठन मजबूत होहीं। जाति बंधन ल तोड़े ले परही, ऊंच जाति के मन के कर्तव्य हें के पिछड़े अउ दलित मन आगू बढ़य तभे समाज बदलही।

1907 में रायपुर के कपसदा गांव में जन्म हुआ। शिक्षा संचालक जैसे महत्वपूर्ण पद से त्यागपत्र देकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कूदे।

रायपुर से मन्दिर-हसौद मार्ग के 16वें मील पर चन्दखुरी गांव है। इसी छोटे से गांव में एक छोटे से किसान परिवार में 28 अगस्त 1890 को बालक नन्दा का जन्म हुआ। नन्दा के पिता का नाम हिंछाराम और माता का नाम दसोदा बाई था। हिंछाराम के पास केवल 15 एकड़ जमीन थी। घर की आर्थिक स्थिति बड़ी शोचनीय थी। अत: बालक नन्दा को चौथी हिन्दी पास करके पाठशाला छोड़ देनी पड़ी और इस छोटी सी उम्र से ही जीविकोपार्जल के कार्य में लग जाना पड़ा। अभी नन्दा का बचपन बीता भी न था कि पिता की मृत्यु हो गई। घर का सारा बोझ इस छोटे से बालक के कन्धों पर आ पड़ा। नन्दा ने इस बोझ को सहर्ष हिम्मत के साथ स्वीकार कर लिया। कौन जानता था कि नियति अनागत के चरित्र निर्माण में संलग्न है। नन्दा ने अपनी पैतृक खेती में परिश्रम करना प्रारंम्भ किया। थोड़ी जमीन और सीमित साधनों के कारण नन्दा को खेती में सरलता नहीं मिल सकी। जिसे देश के लिये अनेक महत्व के लिये अनेक महत्व के काम करने हों, अनेक परीक्षाएं देनी हों वह भला इस छोटी सी असफलता से क्यों घबराता? नन्दा ने दूकान शुरू कर दी। प्रारम्भ में वह स्वयं अपने कन्धे पर कांवर ले गांव-गांव घूम-घूमकर सामान बेचा करता।

चंदूलाल चन्द्राकर जी का जन्म 1 जनवरी 1920 को ग्राम अछोटी, जिला राजनांदगांव में हुआ था।

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