| 30 दिसम्बर 2007
छत्तीसगढ की माटी ने राजनीति, सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना का संचार करने वाले अनेक महापुरूष पैदा किए हैं किन्तु छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा और साहित्य का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका व्याकरण लिखने का सर्वप्रथम साहसी काव्योपाध्याय हीरालालजी ने ही किया हैं। यही कारण है कि उनकी गणना छत्तीसगढ़ के सप्तऋषियों में होती है।
| 30 अप्रैल 2009
छत्तीसगढ़ अंचल
में अध्यात्म की चेतना फूंकने वाले छत्तीसगढ़ के महान तीर्थ-स्थल विवेकानंद आश्रम के संस्थापक और प्रवर्तक स्वामी आत्मानन्दजी का पूर्व नाम तुलेन्द्र सिंह वर्मा था। पिता प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम वर्मा तथा माता भाग्यवती देवी थी। दोनों ही ईश्वर भक्त और कर्तव्यपरायण दम्पत्ति थे। इसी भक्त दम्पत्ति के यहां राष्ट्र में अध्यात्म की चेतना का मंत्र फूंकने वाले महामानव का जन्म रविवार दिनांक 6 अक्टूबर सन् 1929 के सूर्योदय के समय ग्राम बरबन्दा में हुआ था। नाम रखा गया रामेश्वर। इसी वर्ष उनके पिता को जिले में सर्वोत्तम आदर्श अध्यापक के रूप में पुरस्कृत किया गया।
| 30 अप्रैल 2009
दानवीर श्री भोला प्रसादजी वर्मा रायपुर जिले के गिरौद ग्राम के पुराने मालगुजार थे। वे यद्यपि मांढर स्कूल से प्रायमरी तक की शिक्षा प्राप्त थे। तथापि उनकी विलक्षण, बुद्धि और कलाप्रियता तथा राष्ट्रीय भावना के कारण गिरौद गांव आदर्श ग्राम माना जाता था। गांव के लोगों को अनेक प्रकार से प्रेरणा देकर समाज सेवा के लिए प्रेरित करते रहते थे। श्री भोला प्रसाद जी भोलाशंकर के समान बड़े दानी थे। इन्होंने कुर्मी क्षत्रिय समाज के छात्रों के लिए तथा अतिथियों के लिए अपना बड़ा बाड़ा छात्रालय और धर्मशाला के लिए सहर्ष दान में दिया है। जहां के छात्रों को सबसे कम खर्च में भोजन और निवास पाकर पढ़ाई करने का सुअवसर मिलता है। ये औघडदानी भी थे। राजिम मेले में एक गरीब ब्राम्हण को उसकी कन्या के विवाह के लिए याचना करने पर बड़े बैलो की जोड़ी समेत बैलगाड़ी उसे दान में दे दी थी। ब्रम्हाचर्य आश्रम राजिम को दान द्वारा हमेशा सहायता पहुंचाते थे। आश्रम के संचालक पं. सुंदरलाल जी शर्मा ने इनके दान की और समाज सेवा तथा राष्ट्रीय भावना की बहुत प्रंशसा की थी।
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कपिलनाथ कश्यप का जन्म 6 मार्च, 1906 को ग्राम पौना, जिला-बिलासपुर में हुआ। कश्यप जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. की परीक्षा पास की पं. रामचंद्र शुक्ल, डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ.रामकुमार वर्मा आदि उनके शिक्षक थे। पटवारी पद से नौकरी प्रारंभ कर सहायक अधीक्षक भू-अभिलेख पद से सेवानिवृत हुए। नौकरी के दौरान वे लगातार साहित्य साधना में लगे रहे। वे हिन्दी तथा छत्तीसगढ़ी में समान अधिकार के साथ साहित्य रचना करते थे।
| 04 अक्टूबर 2009
बालाजी भोंसले, 16वीं शताब्दी के में पूना जिले में, पाटस सब-डिविजन, जो उस समय अहमदनगर के निजामशाह के निजामशाह के अधीन था, के निवासी थे। कृषि पर आधारित परिवार था। हिंगानी तथा दीवलगांव नामक ग्रामों के मुखिया (पटेल) के पद से भी आय होती थी। उसके दो बेटों, माहोजी और बिठोजी हुये, ये दौलताबाद की पहाड़ियों की तलहटी में स्थित वेरूल (एलोरा) गांव में जा बसे। पर कृषि से गुजारा नहीं होने पर, सिंधरेड़ के निजामशाही दरबारी जादवराव के पास समान्य सैनिक के रूप में नौकरी कर ली।
| 30 अप्रैल 2009
छत्तीसगढ़ अंचल में अध्यात्म की चेतना फूंकने वाले छत्तीसगढ़ के महान तीर्थ-स्थल विवेकानंद आश्रम के संस्थापक और प्रवर्तक स्वामी आत्मानन्दजी के अनुज देवेन्द्र का जन्म 24 नवम्बर, सन् 1936 को रायपुर जिले के ग्राम अभनपुर में हुआ था। पिता प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम वर्मा तथा माता भाग्यवती देवी थी। धनीराम जी के पांच पुत्रों व एक पुत्री में इनका स्थान द्वितीय है।
| 30 अप्रैल 2009
दानवीर श्री तुलारामजी परगनिहा दुर्ग जिले के भिंभौरी ग्राम के पुराने मालगुजार थे। इनके पिता श्री पीताम्बर सिंह परगनिहा बड़े सहृदय व्यक्ति थे। अकाल के समय में तालाब और कुएं खुदवाकर हजारों लोगों को काम दिया और अपाहिजों के लिए भोजन की व्यवस्था कर देते थे। उनकी जन-सेवा के कारण वे अंग्रेज सरकार के द्वारा राय साहब की पदवी से सम्मानित किये गये।
मनुष्य के पुनर्भव एवं जीवन की नित्यता के संबंध में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते है - बहूनि में व्यतीतानि जन्भानि तवचार्जुन । इसलिए मानव - जीवन में जो कुछ व्यक्त और मूर्त दिखाई पड़ता है, वह प्रस्तुत जन्म के विचारों ,सांस्कृतियों और कार्यों का परिणाम नहीं होता, प्रत्युत अनेकानेक जन्मों का ठाट है - सजावट है, उसकी सृष्टि मनुष्य के मन, प्राण और शरीर के दीर्घकालीन प्रयत्नों और साधनों के फलस्वरुप हुई है। मनुष्य के जीवन में एक नैरतयं है, अव्याहतता और धारावाहिकता है - वह कभी रुकता नहीं, पीढ़ी दर पीढी आगे बढ़ता जाता है। वह अज नित्य, शाश्वत और अपुराण होता है। महादेवी वर्मा के शब्दों में –
प्रलय में मेरा पता पदचिन्ह जीवन में।
शाप हूँ जो बन गया वरदान बँधन में।
| 04 अक्टूबर 2009
भारतीय इतिहास के पन्ने सदियों से अपनी दासता की गाथा प्रस्तुत करते हैं। भारत सदियों से विदेशियों के अधीन रहा। आर्यो के पश्चात शक-हुण-कुषाण; शिया-सन्नी-मुगल-पठान एवं अन्त में डच-पुर्तगीज-फ्रेन्च-अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन स्थापित कर सतत शोषण किया। विदेश आक्रमणकारियों एवं भारतीय शासकों के काल में राजतन्त्र स्थापित रहा। अंग्रेजों ने इस देश में प्रजातन्त्र की नींव रखी। भारतीय मूल के निवासियों में छत्रपति शिवाजी महाराज ने भारतीय राष्ट्र की पुन: स्थापना की कोशिश की। उनका यह सपना उनकी मृत्यु के पश्चात छिन्न-भिन्न हो गया।








तथा आर्थिक मुक्ति आंदोलन में हिस्सा लेकर जिन्होंने इतिहास रचा है, उनमें एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ. खूबचंद बघेल जी का भी है। छत्तीसगढ़ राज्य जो अस्तित्व में 1 नवम्बर 2000 से आया है, उसके प्रथम स्वप्न दृष्टा, डॉ. खूबचंद बघेल जी ही थे। आज भले ही उन्हें इसकी मान्यता देने में उच्च वर्ण एवं वर्ग के लोगों को हिचकिचाहट होती है, लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य/तथ्य है ब्राम्हणवादी जाति व्यवस्था को विछिन्न कर समस्त मानव जाति को एक जाति के रूप् में देखने की चाहत रखने वाले डॉ. बघेल के व्यक्तित्व में छत्तीसगढ़ की खुशबू रची-बसी थी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिये त्याग और बलिदान करने वालों में डॉ. साहब का नाम अग्रिम पंक्ति पर है














