| 20 नवम्बर 2008
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, साहित्यकार, गांधीवादी चिंतक समाजसेवी श्री केयूरभूषणजी वर्षों से कुर्मी समाज से जुड़े है और समाज पर अपनी गहरी नजर रखते हैं इस लेख के माध्यम से इनका मानना है कि समाप्त होती पीढ़ी आगामी पीढ़ी को जो कुछ सौंपकर जाती है। जिसे सहेज कर कुछ समेटकर रखने और उस पर निर्वहन करने व बताये मार्ग पर चलने का दायित्व इस पीढ़ी का हैं।
मानव समाज का विकास विश्व में लगभग एक ही समान हुआ हैं परन्तु भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कुछ विभिन्नता भी आई हैं। वैदिक काल में हम सब एक परिवार की तरह थे। पूरे समाज का एक ही वर्ण था। ज्ञानवर्धन करने वाला ऋषि भी श्रमजीवी थे। वे भी हल चलाते थे, गौ पालन करते थे, मिट्टी के बर्तन बनाते थे, चमड़े के जूता बनाते थे। इसलिए ऋषि श्रमजीवियों को युगदृष्टा के तुल्य माना। उनकी वंदना करते हुए कहते हैं-
चर्मकारो म्या नमः, कुंभकारो म्यो नमः, रथकारो म्यो नमः
चर्मकार तुम्हें प्रणाम हैं कुंभकार तुम्हें प्रणाम रथकार तुम्हें प्रणाम हैं। तब चर्मकार को अछूत नहीं मानते थे उन्हें ऋषिकार मानते थे। आगे चलकर काम के आधार पर विभाजन हुआ ऊंच नीच के आधार पर नहीं।
कृषि वाणिज्य गौ-पालन जीवन के आधार पर बने। वे ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य कहलाने लगे। प्रारंभ में तीन वर्ण थे जो अपनी जिम्मेदारी के काम को सफलतापूर्वक करते रहे। तीनों के बीच दीवार नहीं थी। योग्यतानुसार परिवर्तन भी कर लेते थे। जैसे परशुराम ब्राम्हण होकर क्षत्रिय का कार्य करते थे उसी प्रकार अनेक क्षत्रिय ब्राम्ह कार्य में लीन रहते थे। वैश्य वाणिज्य कार्य के साथ, ब्रम्हज्ञान की चर्चा में लिप्त रहते थे। व्यक्तिगत सुविधा भोगियों में उनके बीच दीवार खड़ी कर दी। वर्ग के भीतर भी अनेक वर्ग बना दिये। ब्राम्हण पहले ज्ञान फैलाने के साथ गौ-पालन भी करते थे। उनके आश्रमों में सभी वर्णों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते थे। सभी तरह की विद्या उन्हें दी जाती थी। आत्मज्ञान से लेकर आत्मरक्षा तक याने हथियार चलाने से लेकर कृषि वाणिज्य और गौ-पालन तक। सब काम सब करते थे। आगे अधिकार का प्रश्न खड़ा हुआ। सत्ता संघर्ष प्रारम्भ हो गया, प्रथम टकराव ब्राम्हण और क्षत्रिय के बीच हुआ।
परसुराम का मान मर्दन राम ने किया ब्राम्हणों के वर्चस्व के स्थान पर क्षत्रियों का वर्चस्व हुआ। उस टकराव में उनके बीच समझौता का रूप ले लिया ब्राम्हण क्षत्रियों के दिशा निर्देशक बन गये कुशल कर्मी वणिक रूप में स्थापित हो गये उन सबों के सुविधा भोगियों ने आगे चलकर अपने बीच भी वर्गीकरण कर दिये उसके पहले राजा जनक क्षत्रिय होकर स्वयं हल चलाया करते थे बलराम क्षत्रिय थे पर हल चलाया करते थे इसलिए वे हलधर कहलाये उनके छोटे भाई श्री कृष्ण गाय चराया करते थे आगे चलकर उनके वंशज गणराज्य को राज्य में परिवर्तित कर राजा कहलाने लगे तब वे कृषिकर्म छोड़ दिये। कुर्मीयों एवं क्षत्रियों के गोत्रों एवं आदि परूष में कोई अंतर नहीं हैं। कुर्मी सम्पूर्ण भारत में फैले हुए है क्षेत्रिय भिन्नता के आधार पर कहीं पटेल, कहीं पाटीदार, कहीं आंणजा, कहीं रेड्डी, कहीं कुवणी, कहीं कुलमी कहलाते हैं। सत्ताधारी और श्रमजीवियों में दूरी बढ़ती कई, सत्ता के प्रभाव का उपयोग कर सत्ताधारियों ने इस विभाजन का शास्वत बनाने के लिए उसे धर्म के साथ जोड़ दिया, कुशल कारीगर, कृषक, पशुपालक चौथ वर्ग में ला दिये गये, भले वे त्रिवेणियों में से एक है, इस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह हुआ वह करूणामूलक था। उसके पुरोधा थे कुर्मी कुल भूषण भगवान महावीर और भगवान बुद्ध। पर उनके विचारों को भी कुछ वर्षों बाद कर्मकाण्ड तक सीमित रख सुविधाभोगी समाज ने उसे जनजीवन से दूर कर दिया। तब संतों ने जनसामान्य को पीड़ामुक्त होने का मार्ग दिखाया। जिनमें हुए रामानंद, तुकाराम, एकनाथ, गुरूनानक, कबीर, प्रभु प्राणनाथ, मीरा, रसखान, गुरू गोरखनाथ, रविदास, गुरू घासीदास, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद आदि संतों की श्रृंखला चली। उन्होंने कृषि कर्मियों और कुशल कारीगरों को प्रभावित किया। उनमें वैदिक काल की समानता का ज्ञान पुनः जागृत हुआ। उन जागृत समाजों में कृषि कर्मि कुर्मी समाज अग्रणी रहा। वे कृषि कार्य के साथ फौजी सिपाही के रूप में आये। मात्र सिपाही नहीं सिपहसलार के पद पर भी पहुंचने लगे। जहां तहां उनका राज्य भी स्थापित होने लगा।
उन्हीं में छत्रपति शिवाजी भी थे पर वहीं भी वर्गीकृत हो गया, राज्य से जुड़े महाराष्ट्र के अधिपति के नाते अपने को मराठा कहने लगे वहीं कृषक गण कुर्मी या कुणवी हुए। छत्तीसगढ़ में कुर्मी अलग-अलग समय में अलग-अलग स्थानों से सैनिक के रूप में आयें, और यहां कृषि कार्य के आधार पर बस गये। जिन्हें संतों का दर्शन बहुत प्रभावित किया, विशेषकर कबीरपंथ का। इसलिए आज भी कुर्मी समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा कबीरपंथी है, भले ही वे कहीं गभेल, चन्द्रा तो कहीं सिंगरौल, चन्द्रवंशी कहलाते है। उनके सात्विक जीवन ने उनमें सम्पन्नता ला दी। कर्मठ कृषक तो हैं ही कल्चुरी राजाओं के साथ सिपाही के रूप में आये कूर्मियों से लेकर गोड़ों और मराठों के साथ आये सिपाही भी यही बसते गये वापस नहीं गये। दण्डकारण्य को कृषि योग्य बनाने में इनका बहुत बड़ा योगदान हैं। उनके उपाधियों से उनके युग का अनुमान होता है। देशमुख, बेलचंदन, मराठाकाल के जागीरदार हैं तो परगनिहा कल्चुरियों की व्यवस्था से जुड़ा नाम हैं। उसी प्रकार दाउ गोंड राजाओं की दी हुई उपाधि हैं। मराठा काल के जागीरदारों में पिनकापार, दुर्ग का देशमुख परिवार हैं, झोला-तिरगा का बेलचंदन परिवार भी उन्हीं में से हैं। बिलासपुर के रांछापोडी के कश्यप भी उसी समय के हैं। उसी प्रकार मण्डला के गोडों के फौज के साथ आने वाले लोग कवर्धा, पंडरिया के राजाओं के रियासत में बस गये। वे सब चन्द्रवंशी या चन्द्रनाहू कहलाने लगे। बेमेतरा के आस-पास वाले सिंगरौट कहलाते हैं। सिंगरौट(सिंगरौर), कूर्मियों की बस्तियां मध्यप्रदेश के कई जिलों में हैं। जबलपुर, त्रिपुरी से आई शाखा जिसने रतनपुर में अपनी राजधानी बनाई उसके साथ आने वाले कुर्मी रतनपुर के आस-पास बस गये। राजस्थान के राजपूतों के साथ जो आये वे जांजगीर के आस-पास बसे है। वैसे ही कुछ बघेलखण्ड से आये वे शिवनाथ नदी के दोनों किनारों में बस गये वे सब मनवा कुर्मी कहलाते हैं। उनकी आबादी अभी भी बघेलखण्ड में चित्रकूट व बांधवगढ़ के आस-पास हैं। खोज करने पर उनके आदि स्थान का पता लग सकता हैं। संभव है बघेल परिवार भी बघेलखण्ड से आकर यहां बसा हो। वे भी फौजी के रूप में आये होगं मुझे ऐसा लगता है। कठिया, भालेसुर, पथरी, भिंभौरी इनके आदि गांव रहे हैं. वहां के कुछ लोगों की उपाधि अभी भी परगनिहा है। महासमुंद के ज्यादातर गांव चंद्राकर लोगों के है। छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों के आबादी का एक बड़ा हिस्सा कुर्मी समाज का है जो पूर्व में वनांचल था। जिस कूर्मियों ने झाड़-झंकार को काट कर उसे खेती लायक बनाकर बसे हैं इसीलिये यहां के गांवों में कूर्मियों की आबादी सघन रूप से है। अलग-अलग स्थानों से आकर बसने वाले कुर्मी पहले एक दूसरे को अलग मानते रहे है, यहां तक की उनमें एक-दूसरे से रोटी व्यवहार नहीं होता था। सामाजिक चेतना ने आज उन्हें एक रूप दे दिया है।
पहले वे सब वैष्णव पंथ से प्रभावित थे इसलिए उनमें दया और दान की प्रवृत्ति अधिक थी। वे जहां भी रहे मंदिर, तालाब, कुएं का निर्माण किया किए। भिक्षुओं, ब्राम्हणों और पंडे-पुजारियों को दान दक्षिणा देते रहे। इसलिये स्वभावतः कुर्मी किसान उदार होता है। वैष्णव पंथ भी एक समय प्रगतिशील रहा। वैष्णवमति होने के कारण अधिकांश कुर्मी मांस-मदिरा से दूर रहते थे। छत्तीसगढ़ में कबीर पंथ के प्रादूर्भाव ने कुर्मी समाज को पहिले प्रभावित किया। धनी धरमदास के वंशानुक्रम से ही कबीरपंथ उन्हें स्वीकार होने लगा। मांस-मदिरा से मुक्त होने में उनमें सम्पन्नता आई। उनमें से कुछ व्यापार की ओर बढ़े। उन दिनों वे व्यापारी नाईक कहलाते थे। कूर्मियों में आज भी बहुत से लोग नाईक कहलाते हैं। पहिले गांव के मुखिया गौटिया कहलाते थे, यह कलचुरी राजाओं द्वारा दिया गया पद था। वे अंग्रेजी राज के मालगुजारों की तहर नहीं होते थे, गांव में सबके पास खेती हो इसकी व्यवस्था वे करते थे, गांव में रोजगार हो, सिंचाई व पेयजल व्यवस्था हो, गांव में कोई बेरोजगार न रहे, गांव में बाग-बगीचों, तालाब हो व सम्पन्न होता था। गांव में पहले घरों में ताला नहीं लगाया जाता था, कभी चोरी नहीं होती थी। मराठों के साथ पेण्डारे भी आये जो लूटपाट कर भाग जाते थे, पर यहां के सामूहिक शक्ति से उनका मुकाबला होता था, सारा गांव एक परिवार होता था। छत्तीसगढ़ में सतनामी पंथ का उदय उसी समय हुआ। छत्तीसगढ़ में भातृभाव लाने में इस पंथ का भी बहुत बड़ा योगदान है।
छत्तीसगढ़ में अंग्रेजों का आगमन नागपुर के भोंसला राज्य के पराजय के साथ हुआ। अंग्रेजी फौज ने महाराष्ट्र के सरहद से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करना चाहा। उस समय महाराष्ट्र से लगे अबूझमाड़ क्षेत्र के अबूझमाड़ियों ने अपने नेता परलकोट के जमीदार गैंदसिंह के नेतृत्व में उसका मुकाबला किया। अंग्रेजों के आधुनिकतम हथियारों के सामने अबूझमाड़ियों के तीर कमान कारगर सिद्ध नहीं हो सके। सैकड़ों अबूझमाड़िये शहीद हुए। उनके नेता गैंदसिंह को परलकोट में उन्हीं के महल के सामने फांसी पर लटका दिया गया। वे देश में हुए स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद थे। जो 1857 के विप्लव के पूर्व सोनाखान के जमीदार वीरनारायण सिंह से लेकर रायपुर के फौजियों के विद्रोह तक उसी प्रकार छत्तीसगढ़ के बंजारों से मुगलिया खानदान की रानी तक ने अंग्रेजी सल्तनत की मातहती स्वीकार करने से इनकार कर मुकाबला किया। पर संपूर्ण भारत के साथ छत्तीसगढ़ का विद्रोह भी कुचल दिया गया। फूट डालो और राज करो की अंग्रेजों की नीति को सफलता मिली। तब स्थाई रूप से छत्तीसगढ़ को शोषित बनाये जाने के लिए गांवों की गणतांत्रिक व्यवस्था के स्थान पर मालगुजारी प्रथा कायम कर दी। गौटिया के जगह मालगुजार बना दिये गये जिसके द्वारा किसानों का शोषण होने लगा। छत्तीसगढ़ का किसान कराह उठा। गौटिया भी पीड़ित हुए। भूमि पर लगान लगा दिया गया। जिसे दे पाना किसानों के संभव नहीं था। कईयों को गांव छोड़कर पलायन करना पड़ा।
इस अंचल के किसान ही नहीं गौटिया भी लगान देने में असमर्थ हो गये। अंचल में अकाल पड़ा। किसानों के बीच भूख और गरीबी का तांडव प्रारंभ हो गया। कई गांव वीरान हो गये। जो आज भी वीरान गांव के नाम से जाने जाते हैं। उधर अंग्रेजी शासन ने लगान वसूली का अभियान चलाया। यहां के अपने बनाये मालगुजारों एवं असामाजिक तत्वों को छूट दे दी गई कि जो जितने गांवों की मालगुजारी वसूल कर खजाने में जमा करेगा उसे उतने गांवों की मालगुजारी दे दी जायेगी। तब उनके द्वारा निर्दयतापूर्वक मालगुजारी वसूल की गई। मेरे जन्म स्थान जांता के गौटिया डाढाराम जो बहुत ही धार्मिक व तपस्वी थे वे भी कुर्मी थे। उन्हें अपने गांव के लगान नहीं पटा सकने के कारण अपना गांव पड़ोस के गौटिया के पास बेचकर लगान से छुटकारा पाना पड़ा। उसी प्रकार स्वतंत्रता सेनानी डॉ.खिचरिया परिवार जो पहले मांढर के पास के गांव में रहता था वह भी वहां का गौटिया था उसे भी लगान नहीं पटा पाने के कारण गांव छोड़कर पाटन की ओर जाना पड़ा। वही स्थिति पूरे देश की रही। तब इस पीड़ा से मुक्ति के लिए उपाय सोचा गया। उनमें से एक कांग्रेस की स्थापना भी थी। उसके पूर्व देश के समाज सुधारकों ने सामाजिक चेतना जागृत करने और पिछड़ापन दूर करने के लिए समाज सुधार के आंदोलन शुरू किये। जिनमें थे- राजाराम मोहन राय, ज्योतिबा फूले, स्वामी दयानंद सरस्वती, विद्या सागर, सैय्यद अहमद, शाह वलीवुल्ला आदि। जिनका छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था वह था आर्य समाज।
उन्हीं दिनों स्वामी दयानंद सरस्वती का आगमन बिलासपुर हुआ। इसलिए उनके जीवनकाल में ही उनके समाज सुधार का प्रभाव छत्तीसगढ़ में पड़ने लगा। वह बहुत ही व्यापक था। उससे छत्तीसगढ़ का कोई भी जाति या धर्मानुयायी नहीं छूटा। कुर्मी समाज उनमें अग्रणी रहा। उसने अपने समाज से सामाजिक विषमता दूर करना प्रारंभ कर दिया। उच्च शिक्षा, नारी शिक्षा, विधवा विवाह, गोरक्षा, अस्पृश्यता निवारण, यज्ञोपवीत धारण आदि विचारों से प्रभावित हुए। पहले आर्य समाज से वे ही प्रभावित हुए जो धार्मिक दृष्टि से उदार थे। जो छत्तीसगढ़ के कबीरपंथ, सतनामी पंथ तथा वैष्णवपंथ से प्रभावित थे। दीन दुखियों पर दया करते थे। कुर्मी समाज में भी ऐसे महापुरूषों की कमी नहीं थी उनमें से एक थे भिंभौरी के मालगुजार दाउ पिताम्बर सिंह परगनिहा। उनकी करूणा ने न केवल कुर्मी समाज को प्रभावित किया बल्कि अन्य समाज के लोग भी उनकी उदारता से प्रभावित थे। उन्होंने अपने क्षेत्र में अनेक कुएं, तालाब खुदवाये तथा रास्तों पर वृक्ष लगवायें। अकाल पड़ने पर अपने परगना के लोगों की प्राण रक्षा के लिए अपने ढाबों को खोल देते थे। वे कई बार पर्वत दान किये। इसलिए उस समय के ब्रिटिश शासन ने उन्हें राय साहब की पदवी प्रदान की। उन्होंने आर्य समाज से प्रभावित होकर अपने गांव में स्कूल खोला, उनके बेटा तुलाराम परगनिया जबलपुर के राबर्टसन कालेज से बी.ए. करने वाले छत्तीसगढ़ के प्रथम स्नातक हुए। जिन्होंने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलकर शिक्षा सेवा दानशीलता के कारण इस अंचल में कोई दूसरा नहीं हुआ। मालगुजार और तहसीलदार रहे तुलाराम परगनिहा ने समाज सुधार के अलावा राष्ट्रीय चेतना की अलख जलाने में अव्वल रहे। उन्होंने सन् 1904 में मनवा कुर्मि समाज का प्रथम सम्मेलन कर समाज में यज्ञोपवीत धारण कराने की परंपरा प्रारंभ की। अपनी तीनों बेटियों को जांलधर गुरूकुल कन्या आश्रम भेजकर पढ़ाया। सोना खान खरीदने वाले तुलाराम अपनी जागीर को बेटियों में न बांट कर आर्य समाज को सन् 1926 में दान दे दी थी। वर्तमान में दुर्ग में संचालित आर्य कन्या महाविद्यालय उनके दान का एक हिस्सा है, और इस दानशीलता के कारण छत्तीसगढ़ की जनता ने उन्हे नवाजा दानवीर की उपाधि से। दानवीर तुलाराम परगनिया का सबसे ज्यादा असर भोलाप्रसाद पर पड़ा। जिन्हें समाज के सर्वांगीण विकास एवं कुर्मी एकता का जनक कहा गया है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भोलाप्रसाद ने समाज को कला, संस्कृति और शिक्षा की ओर अग्रेषित किया, सन् 1924 में जब जमीन की कीमत 25 रुपये एकड़ थी तब दानवीर भोलाप्रसाद ने 7 हजार रूपये का बाड़ा समाज को दान में दे दिया। रायपुर के तात्यापारा स्थित भोला कुर्मी छात्रावास आज उनकी दानशीलता की एक मिशाल है। देश सेवा समाज सेवा और जाति सेवा करने वाली कोई भी संस्था उनके अनुदान से वंचित नहीं रही। स्वतंत्रता संग्राम में कुर्मी समाज की जो भूमिका रही उसमें भी उनकी भागीदारी महत्वपूर्ण रही। वे किससे प्रभावित रहे कहा नहीं जा सकता उनका युग गांधी युग के पहले आता है, सम्भव हो कि वे लोकमान्य तिलक से प्रभावित हो, वह युग कला और साहित्य की दृष्टि से नवजागरण युग था। जिसे हम भारतेन्दु युग कहते है। अंग्रेजी राज की दासता से मुक्ति का संदेशवाहक। अंगड़ाई लेते छत्तीसगढ़ में उनकी मंडली में सुन्दरलाल शर्मा भी शामिल रहे जिनका राजनैतिक जीवन तिलक युग से प्रारंभ होता है, यही से कला एवं साहित्य स्वांतः सुखाय से दिशा बदलकर बहुजन हिताय की ओर जाती हैं। उस समय कला प्रेमी दो भागों में बट कर दोनों विपरीत धाराओं में बहने लगते हैं। उस समय दोनों धाराओं के संरक्षक अपने-अपने विचारधारा के अनुसार राजे महराजे और मालगुजार ही होते थे। यह कला नृत्यागंनाओं के माध्यम से कोठे से उठकर राजाओं, जमीदारों और मालगुजारों के महलों तक पहुंची, जहां मुजरे लुटाये जाते थे, जिनका विरोध किया डॉ.खूबचंद बघेल और उनके साथियों ने और उन्होंने इस प्रथा को खत्म कर ही दम ली। इसके सामानन्तर दूसरी धारा मंदिरों से प्रभावित होकर भजन कीर्तन रामलीला के रूप में मालगुजारों, जमीदारों और राजाओं की चौपालों तक पहुंची, जो जन आधारित बन नाचा गम्मत कीर्तन के रूप में जन साधारण के जागरण का साधन बना। जिससे समाज भक्ति भावना में डूब कर अपने दूखों को थोड़ी देर भूल जाता था और जीने का साहस मिलता था एवं रावण और कंस के वध द्वारा अन्याय के प्रतिकार की भावना जागृत करता था साथ ही सत्य की विजय पर विश्वास जगाता था। भोला प्रसाद जी ने अपनी सम्पत्ति का इस जागरण के लिए पूरी तरह उपयोग किया। उनका ग्राम गिरौद राम और कृष्ण लीला के लिए प्रसिद्ध था। वे स्वयं कला प्रेमी ही नहीं कलाकार भी थे, और लीलाओं में पात्र भी बनते थे। वह कला प्रेम इतनी गहराई से जनता के मन में खरी उतरी की रावण और कंस का स्वरूप उन्हें अंग्रेजी सत्ता में दिखाई देने लगा और वे राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रियता से भाग लेने लगे। उनकी लीला मंडली जब शिक्षित पात्रों की जरूरत पड़ी तब वे शिक्षा की ओर झुके। गांव के बच्चों को शिक्षित करने पहले वे अपने खर्च से अपने बाड़ा में स्कूल प्रारंभ किया और आगे चलकर अपने गांव में प्राथमिक स्कूल शासन से खुलवाया व साथ ही अपने गांव के विद्यार्थियों को आगे की शिक्षा के लिए अपने खर्चे पर रायपुर भेजते रहे और वही आगे चलकर भोला कुर्मी क्षत्रिय छात्रावास कहलाया। यह छात्रावास उस समय मात्र कुर्मी बच्चों का छात्रावास नहीं रह गया बल्कि आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का एक प्रमुख केन्द्र हो गया। आगे भोलाप्रसादजी महात्मा गांधी की अध्यक्षता में कलकत्ता में आयोजित अधिवेसन रेल से न जाकर अपनी कार से जाते और महात्मा गांधी को रायपुर आगमन का आंमत्रण देकर गांधीजी की त्याग और भाषण पर अपनी कार कांग्रेस का दान कर फकीरों का बाना लेकर रेलगाड़ी से वापस आते।
गांधीजी सन् 1920 में धमतरी तहसील के कंडेल गांव में चल रहे सत्याग्रह के निर्मित पहली बार छत्तीसगढ़ आते हैं। उस समय पूरे देश में असहयोग आन्दोलन की तैयारी चल रही थी, विद्यार्थियों ने शासकीय स्कूलों की पढ़ाई और शिक्षकों ने शासकीय नौकरी छोड़ी। इन विद्यार्थियों के लिए जगह-जगह राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना हुई, कुर्मी समाजे के अनेक छात्रों ने सरकारी स्कूलों की पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय विद्यालयों में दाखिला लिया। शिक्षक के रूप में सर्वप्रथम नौकरी छोड़ने वालों में एवं राष्ट्रीय विद्यालय में सेवा देने वाले माधवप्रसाद परगनिया रहे और राष्ट्रीय विद्यालयों में दाखिला लेने वालों का छात्रावास भोलाप्रसाद का बाड़ा बना। अब तो भोला जी का मन अपने बाड़ा को अपने समाज के बच्चों के लिए छात्रावास में परिवर्तित करने का बन गया और उन्होंने विधिवत 1924 में समाज को छात्रावास के लिए दे दिए। इस छात्रावास ने अनेक स्वतंत्रता सेनानी पैदा किए जो छात्रावास में रहकर सत्याग्रह कर जेल गए। सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी डॉ.दुर्गासिंह सिरमौर, रामाधारसिंह चंद्रवंशी, मोतीलाल वर्मा, भुजबलसिंह, हरिप्रेम बघेल, श्रीमती बेलाबाई, जगन्नाथ बघेल, रूखमलाल चंद्रवंशी, इसी छात्रावास की देन है। भोलाप्रसाद का गांव गिरौद भी उनके जीवन काल में भी एक आदर्श गांव था जिसके संबंध में अपनी पत्रिका दुलरूआ में पं.सुन्दरलाल शर्मा लिखते हैं – गिरौद इस अंचल का एक आदर्श ग्राम है वहां के लोगों में अधिकांश पढ़े लिखे है उनमें से अधिकतर शिक्षक तथा कला प्रेमी है उसी प्रकार उनकी दानवीरता की प्रशंसा करते हुए कहते हैं – भोलाप्रसाद जी ने राजिम के ब्रम्हाचर्य आश्रम की स्थापना के लिए 500 रुपये का अर्थदान दिया तथा अर्थ संग्रह के लिए दौरा करने हेतु अपनी बैल तथा गाड़ी दे दिये।
भोलाप्रसाद जी की दानवीरता किसी जाति तक सीमित नहीं थी। सन् 1920 के आने तक कुर्मी समाज में जगह-जगह राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक एवं सेवा की त्रिधारा बहने लगी। तीसरा महत्वपूर्ण केन्द्र बना ग्राम-पथरी जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण तक चला। उस गांव ने डॉ.खूबचंद बघेल जैसे पराक्रमी महापुरूष को जन्म दिया। उनके परिवार से 8 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए जो अपनी विशेषता लिए हुए थे। उनमें बहिन भी थी। मां, बेटा, भाई, चाचा, पति-पत्नि एक ही समय जेल में बंद रहे। इतना ही नहीं आज भी वह बलिदान गांव कारगील के युद्ध के समय देश की रक्षा के लिए अपने बेटे विजय बघेल के शहादत का गौरव अर्जित किया हैं। ग्राम-पथरी ने राष्ट्रीय आंदोलन के समय पूरे अंचल को प्रभावित कर रखा था। उसके आस-पास का ऐसा कोई गांव नहीं हैं जहां कोई न कोई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी न हो। कई गांव ऐसे भी हैं जिसने पथरी की तरह अपना इतिहास बनाया है। मेरा अनुमान जो पथरी गांव के लिए है वह सच के नजदीक है, उस सुसंस्कृत एवं वीरों की जननी पथरी निवासी लोग बघेलखण्ड से यहां आकर बसे हैं। वे नागपुर के भोसला राजा के सेनापति भास्कर पंत के फौज के सिपाही के रूप में यहां आये। उसकी सेना बुंदेलखण्ड, बघेलखण्ड होते हुए रतनपुर फतह करते उड़ीसा, बिहार होते हुए बंगाल तक पहुंची थी। वापस लौटते समय रतनपुर, रायपुर होते नागपुर वापस गयी। इस बीच जहां भी गये वहां के लोगों को अपने फौज में भरती करते चले। उनमें सभी जाति और समाज के थे। चूंकि छत्तीसगढ़ तब मराठों के आधीन राज्य हो गया। जहां जिस समाज के लोग निवास करते थे उसके आस-पास वे बस जाते थे। भोसला शासन अपने फौजियों को वहां की जागिरी भी दे दी। जैसे बिहार में मराठा फौज में सैनिक के रूप में भर्ती हुए ब्राम्हणों को रायपुर में बसाकर आजू-बाजू के गांव की जागिरी दे दी। वह मिश्र परिवार आज भी अपने को मधुबनी का मिश्र कहता है।
उसी प्रकार बघेलखण्ड के निवासी कुर्मी युवक जो मराठा फौज में सम्मलित हुए वे पथरी के आस-पास के अपने बिरादरियों के साथ जुड़ गये छत्तीसगढ़ का संबंध पूर्व से ही बुंदलखण्ड से था। अमरकंटक जो उस समय छत्तीसगढ़ में था वह दोनों अंचल का प्रधान तीर्थ था। घने जंगल के बीच होने के कारण वह तपोभूमि था धनी धरमदास और संत कबीर की गहन चर्चा हुई थी जो कबीर चौरा के नाम से आज भी प्रसिद्ध है, संत कबीर के प्राचीन शिष्य धनी धरमदास बांधवगढ़ के निवासी थे जिन्होंने 42 वंश के लिए गुरूत्व का आशीर्वाद पाकर पूरे छत्तीसगढ़ को आध्यात्मिक दृष्टि से सुसंस्कृत कर दिया। उस बघेलखण्ड का सैनिक परिवार वापस बघेलखण्ड न जाकर पथरी में बस गये, वे आगे फैलते हुए कठिया, भलेसर आदि गांवों में बस गये। वे फौजी आगे चल कर शिवनाथ नदी के दोनों किनारों पर विस्तारित हो गए वे सब मनवा कुर्मी कहलाते है इनकी बिरादरी आज भी चित्रकोट से लेकर बांधवगढ़ तक बघेलखण्ड में है। वहां के धार्मिक संस्कार आज भी छत्तीसगढ़ के मनवा कुर्मी समाज में है। उसी के साथ-साथ फौजी परिवार के वंशधर होने के कारण अन्याय का प्रतिकार करने की शक्ति भी उनमें है। जिसे हम राष्ट्रीय आंदोलन में देख चुके है। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के समय भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही डॉ. खूबचंद बघेल उनके साकार मूर्त रहे। डॉ. बघेल साहब पर किनका प्रभाव पड़ा बता नहीं सकता, उनके पिता जुड़ावनप्रसा का स्वर्गवास दो वर्ष की आयु में हो गया था, उनकी मां केतकी बाई बहुत ही सुशील और साध्वी वृति की थी, उस परिवार में सामाजिक चेतना तो कबीरपंथ, सतनामी पंथ और आर्यसमाज जागृत कर रखा था। उनके दोनों चाचा अर्जुनप्रसाद और नकुलप्रसाद राष्ट्रीय जागरण से प्रभावित थे। 1930 के सत्याग्रह में अर्जुनप्रसाद जेल यात्रा कर चुके थे। नकुलप्रसाद बघेल राधास्वामी मठ से यानि प्रगतिशील धारा से जुड़े थे। पर जागीरदारी परिवार की आन-बान-शान भी उनकी अपनी थी। मां की सात्विक जीवन का प्रभाव डॉ. साहब पर बचपन से पड़ना शुरू हो गया था। वही बालक आगे चलकर छत्तीसगढ़ के दलित पीड़ित एवं डरे सहमों को स्वाभिमानी बनाने संघर्ष का राह पर चलने वाला योद्धा के रूप में जाना गया डॉ.खूबचंद बघेल के नाम से। डॉ. बघेल को छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं संस्कार को समेट कर राष्ट्रीय धारा में प्रवेश कराने का श्रेय जाता है। उनके कामों का प्रभाव कुर्मी समाज पर सबसे ज्यादा पड़ा है चाहे वह सामाजिक चेतना का हो या राष्ट्रीय जागरण का हो। कुर्मी समाज की उपजातियों को मेल कराने का श्रेय डॉ. साहब को जाता है। अंचल में व्याप्त अस्पृश्यता को जड़मूल से समाप्त करने के प्रयत्न में भी अग्रणी रहे। छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय नेता में वे एकमात्र ऐसे नेता थे जिनके घर दलित वर्ग की बेटी रसोई बनाकर खाना खिलाती थी। घर के लोग उसे मां के रूप में सम्मान देते थे। उसके समाज ने उसे पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया था। सामन्तशाही का विकृत रूप जिसमें वेश्याओं का नाच कराया जाता था उन नाचने वालों की एक ही जाति बन गई थी। वह प्रथा डॉ. साहब के लिए बहुत ही पीड़ादायी थी जिसे लोग किसबिन नाच कहा करते थे। इसे जड़मूल से समाप्त करने का श्रेय डॉ.साहब व उनके साथियों को जाता है। क्या खादी, क्या ग्रामीण उद्योग, क्या कौमी एकता सभी प्रवृत्ति में डॉ. बघेल की भूमिका अग्रणी रहीं। किसानों के हित (धान आंदोलन) में संघर्ष कर स्वतंत्र भारत में जेल जाने छत्तीसगढ़ के प्रथम नेता थे। डॉ. साहब छत्तीसगढ़ का कमजोरियों को भी खूब जानते थे वे कहा करते थे – सत्य, प्रेम, करूणा के अवतार है छत्तीसगढ़ी, पर सीमा से अधिक भोले है, अनजान पर विश्वास करते है इतना ही नहीं दूसरों के बहकावे में जल्दी आ जाते हैं जिसके लिए परबुधिया शब्द उपयोग करते है। उन्हें दृढ़ निश्चयी बनाना चाहते थे। उसी प्रकार गुजगुजहा छत्तीसगढ़ियों को जटिल बनाना चाहते थे। जिसके लिए डॉ. साहव मन, वचन, कर्म से प्रयास करते रहें। शारीरिक श्रम के अलावा उन्होंने कलम और वाणी का भी भरपूर उपयोग किया। उनका उद्वोधन दिल को छू जाता था और वे कलम के धनी तो थे ही उन्होंने जो भी लिखा जन-जागरण को लिखा मनोरंजन के लिए नहीं। ऊंच-नीच और जनरैलसिंह नाटकों का उद्देश्य वही था। वे मंच से खेले जाते थे इन्हीं नाटकों से प्रेरित होकर दाउ रामचंद्र देशमुख ने छत्तीसगढ़ की सर्वागीण विकास के लिए लोकनाट्य नाचा, गम्मत को माध्यम बनाकर चंदैनी गोंदा जैसे हृदयस्पर्शी प्रहसन तैयार किये। जिसने संपूर्ण छत्तीसगढ़ समाज में जागृति ला दी। उसके पहले नाचा, गम्मत मात्र मनोरंजन के माध्यम था। रामचंद्र देशमुखजी ने अपने कला के माध्यम से शोषणमुक्त छत्तीसगढ़ राज्य की भूमिका बनाई। छत्तीसगढ़ के कलाकारों को पहचान कराई। जो आगे चलकर अखिल भारतीय ही नहीं विश्व में छत्तीसगढ़ की कला को स्थापित किया। इन सबका श्रेय बाबू रामचंद्र देशमुख को जाता हैं, जो आज कहीं दिखाई नहीं देते भले आज वे नींव के पत्थर बन चुके है। राष्ट्रीय जागरण के युग में कुर्मी समाज में अनेक लेखक और गीतकार हुए। उनमें डॉ. बघेल के अतिरिक्त श्री जगन्नाथ बघेल जो अपने समय के पत्र पत्रिकाओं में विचार प्रधान लेख लिखते रहे। साथ ही आंदोलन के समय अनेक परचे एवं बुलेटिन निकालते रहे। हरिप्रेम बघेल राजनीति के साथ विचारक भी रहे। पुरूषोत्तम लाल कृषक ने 1930 में कांग्रेस आल्हा की रचना की। उनके गीतों ने स्वतंत्रता संग्राम के संदेश घर पहुंचाया। उदयराम वर्मा भी उच्चकोटि के कवि एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन सबकी कलम स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किये जा रहे आंदोलन के समय भी वे अपने कला का भरपूर उपयोग किये।
छत्तीसगढ़ राज्य के लिए आंदोलन का सूत्रपात डॉ.खूबचंद बघेल किये, तो उसे पूर्णतः तक पहुंचाने का श्रेय चन्दूलाल चन्द्राकरजी को जाता है। उनके नेतृत्व के कारण ही सर्वदलीय मंच बन सका, वे देश के मुर्धन्य पत्रकारों में से एक थे। राज्य बनने के बाद जो छत्तीसगढ़ को संवारने में अपने कलम का उपयोग किया उनमें कुर्मी समाज के साहित्यकारों की अग्रणी भूमिका आज भी हैं। हीरालाल काव्योपाध्याय कुर्मी समाज के पहले साहित्यकार हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखकर अत्यधिक ख्याति अर्जित की। उनके इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद प्रख्यात अंग्रेज लेखक ग्रियर्सन ने किया था। काव्योपाध्याय उपाधि बंगाल के शासकों द्वारा उन्हें दी गई थी। कपिलनाथ कश्यप, डॉ.नरेन्द्रदेव वर्मा भी कुर्मी समाज के उच्चकोटि के साहित्यकार हुए हैं। डॉ.परदेशीराम वर्मा, बसंत देशमुख, डॉ.सत्यभामा आडिल, श्री सुशील वर्मा भोले, डॉ. महेन्द्र कश्यप राही तथा अनेक साहित्यकार बिना थके, बिना रूके सतत् प्रवाहित है। इस समाज के लोग हर विधाओं में अपना स्थान बनाते जा रहें हैं। राजनीतिज्ञों में श्री पुरूषोत्तमलाल कौशिक की अलग पहचान हैं, अनेकों बार विधायक एवं केन्द्रीय मंत्री रहने के बाद भी अपनी ईमानदारी की छवि बनाने में सफल रहें हैं। उनके लिए कहा जाता हैं काजल की कोठरी में रहकर भी बेदाग निकले।
छत्तीसगढ़ मे राष्ट्रीय धारा प्रस्फूटित करने वाले प्रमुख केन्द्रों में एक चन्दखुरी भी था जिसके प्रणेता थे सेठ अनंतराम बर्छिहा। शायद कुर्मी समाज में वे अकेले थे जो सेठ कहलाते थे। एक छोटे किसान के घर में पैदा होने वाले कृषक पुत्र व्यापार की ओर कदम बढ़ाते कांवर में सौदा ले जाकर बाजार घूमकर बेचने वाला युवक एक दिन उस अंचल का बड़ा व्यापारी बन गया, वह भी ईमानदारी के साथ। उसे उसका पराक्रम ही कहा जा सकता हैं। सेठ की जन उपाधि तभी मिली वह सेठ स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर फकीर के रूप में परिवर्तित हो गया। उनका पूरा घर उसके अतिरिक्त गांव के लोग सब के सब तो स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित हो गये। बाप बेटा भाई एक साथ बंदी रहे। साथ में घर के 8 लोग। लूट लिया गया उनका दुकान अंग्रेज फौज के द्वारा पर हार नहीं मानी। उनका गांव चंदखुरी स्वतंत्रता संग्राम के समय किला के रूप में परिवर्तित हो गया था। छोटे बच्चे से लेकर बूढ़े तक उसमें सम्मिलित थे। जहां जमी फौजी टुकड़ी जो घुड़सवारों की थी उन्हें उस गांव के लोगों ने पानी तक नहीं दिया, एक माचिस की तिली को भी उन्हें दूसरे गांव से मंगानी पड़ती थी। छुआछूत की बीमारी को सबसे पहले अंत करने वाले गांवों में चंदखुरी प्रथम रहा, मंदिरों में प्रवेश स्वयं अनंतराम बर्छिहा के द्वारा कराया गया, पूरा गांव उनके साथ रहा। कुंआ, घाट सब कुछ सबके लिए रहा। डॉ. बघेल का ऊंच-नीच नाटक वहीं खेला गया। जब उनकी बेटी की ब्याह में सारा समाज और राजनेतागण मौजूद थे उसी शादी में पंक्ति भेद समाप्त हुआ। सभी जाति व सभी धर्म के लोग एक साथ पंगत में बैठकर भोजन किये। पत्तल उठाने वालों में डॉ.बघेल व उनके साथी थे। आडम्बर शून्य बिना दहेज की शादी पहली बार हुई, वह भी अनंतराम बर्छिहा की पुत्री की जिसे उन्होंने मात्र खादी की साड़ी व खादी के पोलखा में घर से विदा किया था। उनके इस सिद्धांतनिष्ठा से केवल कुर्मी समाज ही नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के सभी समाज के विचारवान लोग भी प्रभावित हुए।
19वीं. शताब्दी के प्रारंभ से जिस गांव ने शिक्षा एवं सहकारिता की ज्योति जलाई वह गांव है, सिलघट। जिसने सेवाराम टिकरिहा जैसे कृषि वैज्ञानिक, टिकेन्द्र टिकरिहा जैसे साहित्यकार एवं श्रीमती छाया वर्मा जैसी सुशील नारी को जन्म दिया। एक समय ग्राम सिलघट शिक्षकों का ग्राम कहलाता था। अलखराम टिकरिहा, उजियार सिंह टिकरिहा, रामकृष्ण टिकरिहा, श्यामलाल टिकरिहा सब शिक्षक ही थे। सम्पूर्ण गांव राष्ट्रीय आजादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ था। यहां की रामकोठी प्रसिद्ध थी। लोग मुनाफाखोरी और साहूकारों के शोषण से मुक्त थे। आगे चलकर इस गांव के लोग अपना निजी बैंक की स्थापना की। उस बैंक से ही उनका लेन-देन चलता था। विकास के कार्य के लिए उन्हें किसी का मुंह ताकना नहीं पड़ता था। इसलिए शासकीय योजना सबसे पहले इसी ग्राम में प्रारंभ होता था। वे अपने कोष से कार्य प्रारंभ कर देते थे। राष्ट्रीय जागरण में इस गांव का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सेठ अनंतराम बर्छिहा की प्रतिज्ञा अपनी बेटी उसी परिवार को दूंगा जो दहेजमुक्त हो, पंक्तिभेद से मुक्त हो उस बेटी को स्वीकार करने वाला सिलघट का टिकरिहा परिवार ही था। इस शिक्षकों की गांव की अगली पीढ़ी डॉक्टर, इंजीनियर एवं प्रथम श्रेणी के अधिकारियों की कतार प्रारंभ कर दी।
वही स्थिति बिलासपुर जिले के राछापौरी के कश्यप परिवार का हैं। धरमलाल कश्यप जैसे संगीतज्ञ के साथ ही एक्साईज कमिश्नर के ऊंचे पद पर पहुंचने वाले प्रतिभाओं का जन्म उस पोड़ी गांव में हुआ। वे सब कुर्मी समाज के रत्न हैं जिनका राष्ट्रीय योगदान भुलाया जा नहीं सकता।
स्वामी आत्मानंद का उदय छत्तीसगढ़ में ध्रुवतारा की तरह हुआ। गुरू घासीदासजी के बाद अगर किसी संत का इस अंचल में प्रभाव पड़ा है तो वे हैं स्वामी आत्मानंदजी। वे इस अंचल को आध्यात्मिक मार्गदर्शन के अतिरिक्त सेवा का पाठ पढ़ाकर चले गये। रायपुर का विवेकानंद आश्रम जीता जागता प्रमाण प्रस्तुत हैं। वनवासी क्षेत्र की ओर किसी संत का ध्यान गया तो वे स्वामी आत्मानंद ही थे। सेवा और शिक्षा के लिए उनकी संस्था आज भी अग्रणी भूमिका निर्वहन कर रही हैं। महत्वाकांक्षा की दिशा बदल देने का काम स्वामी आत्मानंद ने ही किया हैं। स्वतंत्रता के बाद वे एकमात्र उदाहरण है। उसी तरह जैसे स्वतंत्रता संग्राम के युग में नेताजी सुभाषचंद्र बोस, श्री एच.व्ही.कामत, श्री मोरारजी देसाई एवं श्री आर.के.पाटिल ने किया था। वे सब आई.पी.एस. थे। उनके मां बाप उन्हें ब्रिटिश सत्ता के सर्वोच्च अधिकारी बनाने के लिए डिग्री लेने हेतु लंदन भेजे थे। उस डिग्री को प्राप्त करने के बाद उसे त्रिणवत छोड़ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। वही उदाहरण स्वामी आत्मानंद जी ने प्रस्तुत किया वे आई.ए.एस. की उपाधि प्राप्त कर उसे त्रिणवत छोड़कर अपना जीवन सेवा के लिए समर्पित कर दिये। सेवा ही उनकी पूंजी थी। वही उनका आध्यात्म था। उनके साथ कुछ दिनों तक साथ रहने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था, जब वे जातीय दंगों के समाधान करने के लिए सद्भावना यात्रा पर निकले थे। उस समय प्रातः से अर्धरात्रि तक व्यक्तिगत संपर्क के साथ ही बड़ी-बड़ी सभाओं को संबोधित करते हुए चलते थे। तब मैंने उन्हें कहीं पर भी पूजा-पाठ करते नहीं देखा न ही कहीं परहेजी खाना खाते जो मिलता वही खा लेते। जो देता उसी के यहां खा लेते। जैसा बिछौना मिलता उसी पर सो जाते। चिंता थी तो केवल शांति स्थापना की।
राजवाड़ों के अत्याचार के खिलाफ बगावत करने वालों में तिलक राम चंद्रवंशी थे जिन्होंने कवर्धा स्टेट में स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल फूंका था। वह 1920 के आस-पास का है जिसे कवर्धा रियासत के सम्पूर्ण जनता ने समर्थन दिया। रजवाड़े की शक्ति नहीं थी कि उसे दबा सके, तब ब्रिटिश फौज के जरिये से बगावत का सामना किया गया। तिलकराम चंद्रवंशी अपने साथियों के साथ पकड़ लिये गये, सबको दंडित किया गया। तिलकराम चंद्रवंशी को सजा के अतिरिक्त देश निकाला भी दे दिया गया। वे रजवाड़े के बाहर रहने लगे, कुछ दिनों बाद वहीं के नासमझों ने उनकी सुराजी होने के कारण हत्या कर दी। वे देश के लिए शहीद हो गये। मुझे सन् 1942 के अगस्त क्रांति के समय कारागार में उन सजायाफ्ता रहे बंदियों से मिलने का अवसर मिला था, जिन्होंने तिलक राम चंद्रवंशी की हत्या की थी। उसके बाद भी उस गांव के लोगों से मेरी मुलाकात हुई तब मैंने उनसे पूछा तो उनका कहना था कि वह सुराजी हो गया था, मैं तो उन्हें स्वराज्य के लिए हुए शहीद मानता हूं। मुझे यह कहने में थोड़ी भी झिझक नहीं हो रही है कि आज का कुर्मी समाज भी अपने अंचल को राष्ट्रीय धारा के साथ जोड़कर रखने में अग्रणी भूमिका का निर्वहन कर रहा हैं, जिस तरह स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में उस समय के समाज ने किया था। आगे भी यह समाज राष्ट्र के नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करेगा, इस पर मुझे पूर्ण विश्वास हैं।
जिस समाज का इतिहास उज्जवल है,
उसका भविष्य भी उज्जवल रहेगा।
जिस समाज में युवक एवं महिलाएं जागृत हैं,
वह समाज उच्च शिखर पर जरूर पहुंचेगा।






















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