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The Pioneer in Raipur(Chhattisgarh)

आर.एस.पटेलआर. एस. पटेल
प्रधान सम्पादक, कूर्मि क्षत्रिय जागृति
सांईपुरम कालोनी, कटनी(म.प्र.)
टेली 07622 297769, 9926852567. 9229483567

साधारणत: भारतीय संस्कृति का प्रारम्भ वैदिक काल से माना जाता है । किन्तु सिंधु-घाटी तथा देश के अन्नयान्य स्थानों की अब तक हुई खुदाई से प्राप्त खण्डाव शेषों में इसका प्रारम्भ काल और कई हजार वर्ष पीछे आंका जाने लगा हैं । हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ों आदि स्थानों में से अवशेष खुदाई से प्राप्त हुये है उनसे एक बात तो स्पष्ट पता चलती है कि भारतवर्ष में वेदों से पूर्व भी मानवीय सभ्यता काफी विकसित हो चुकी थी। इन खोजों के परिणामस्वरूप भारतीय सभ्यता की गणना विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं जैसे सुमेर, अवकाद, बेबीलोन, मिश्र तथा असीरिया में किया जाता है जबकि वे सभी पुरानी सभ्यतायें प्राय: लुप्त हो चुकी है पर भारतीय सभ्यता में कुछ ऐसी मूलभूत विशेषता रही है कि आज भी वह विद्यमान तथा जीवंत है।

मानवशास्त्रवेत्ताओं ने मनुष्यों को मुख्यत: पांच जातियों में विभक्त किया हैं, 1. काकेशियन 2. मंगोलियन या तातार 3. हब्शी 4. मलय 5. अमेरिकन। शारीरिक रंगों के आधार पर भी इन लोगों का विभाजन प्रधानत: चार वर्गो में किया जाता हैं, क्रमश: पीले, काले, बादामी और लाल। गोरी कही जाने वाली जाति की तीन प्रधान शाखाएं है आर्य, सैमिटिक और हैमिटिक। आर्य जाति सर्वप्रधान मानी गई है इनमें हिन्दुओं जर्मनों, रूसियों, यहूदियों और फ्रांसीसियों आदि की गणना है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि अति प्राचीनकाल में हिन्दुओं, जर्मन, रूसियों, यहूदियों और फ्रांसीसियों आदि के पूर्वज एक ही क्षेत्र में रहते थे और एक ही भाषा का आपस में प्रयोग करते थे। कालान्तर में वहां से जनसमूह इधर-उधर, नये-नये स्थलों में दूर-दराज जगहों पर अपने जीवन-बसर के लिये जा बसे। उनके पूर्वजों की मूलभाषा में स्थानान्तरण के परिणामस्वरूप तथा नये-नये तरह के लोगों के सम्पर्क में आने के कारण अनेक परिवर्तन आते गये, और काफी बाद उसी मूलभाषा से संस्कृत, युनानी और जर्मन भाषा जन्मी और वे स्वतंत्र रूप में अस्तित्व में आयी। अनेक विद्वान संस्कृत को अनेक इन भाषाओं की जननी मानते है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 'वेद में आर्यो का उत्तरी ध्रुव निवास' नामक अपनी पुस्तक में योरोपियन पांडित्य के सामान्य परिणामों को स्वीकार कर लिया है परन्तु वैदिक उषा की, वैदिक गौओ के अलंकार की और मन्त्रों के नक्षत्र-विद्या सम्बन्धी तत्वों की नवीन परीक्षा के द्वारा यह स्थापना की है कि कम से कम इस बात की बहुत अधिक सम्भावना तो है ही कि आर्य जातियां प्रारम्भ में हिम-युग में, उत्तरीय ध्रुव के प्रदेशों से उतरकर आयीं। धर्मशास्त्रों में वर्णित आर्यो की, और प्राप्त अवशेषों से आंकी गई सिन्धु-घाटी के निवासियों की, जीवन-पद्धति में भी स्पष्ट अन्तर पाया जाता था। वैदिक-कालीन आर्यो की मुख्य जीविका पशुपालन और कृषि थी। वे छोटी-छोटी बस्तियों में बिखरे हुये थे। इनके विपरीत सिन्धु सभ्यता नागरिक जीवन को प्रकट करती है। अवशेषों से यह पता चलता है कि तब बड़ी-बड़ी घनी बस्तियों, उंचे पक्के मकान, छोटी-छोटी औद्योगिक इकाईयां और सामूहिक आमोद-प्रमोद के स्थल भी थे। हड़प्पा में देवी, लैंगिक चिन्ह और मुर्ति के रूप में शिव तथा पौराणिक मूर्तियों की पूजा प्रचलित थी।

किन्तु ऋग्वेद में मूर्ति पूजा का प्रत्यक्ष समर्थन नहीं मिलता । आर्यो का समुद्र के साथ विशेष सम्बन्ध पता नहीं चलता। किन्तु सिन्धु-घाटी के लोग समुद्र-मार्ग से व्यापार करते थे। हिन्द सागर, फारस की खाड़ी और उसके पार वे दूर-दूर तक जाते थे। उनकी मुद्राओं पर नाव की आकृतियां चित्रित मिली है, इसके नाव का महत्व उनके जन-जीवन में प्रकट होता है।

भारतीय परम्परानुसार वेद मंत्रों के शब्दों से ही पृथ्वी पर मौजूद सब प्रकार के पदार्थो और उनके गुणों और कर्मो के नामकरण किये गये हैं(मनुस्मृति 1-21-23)। ऐसी मान्यता है कि सूक्ष्मरूप में प्राणी तो तभी बन गए थे जब हिरण्यगर्भ में देवता इत्यादि बन रहे थे, वेद भी शब्द रूप में देवता इत्यादि बन रहे थे, वेद भी शब्द रूप में तब से ही प्रकट हुये थे। ऐसा भी वर्णन महाभारत के आदि पर्व(65-10-11) में मिलता है कि जगत पिता ब्रम्हा की जब कर्तव्य-शक्ति उत्पन्न हुई उसका वैवस्वत मनु था। उसने अथवा ब्रम्हा जी ने विराट-पुरूष से प्राणी की सृष्टि की। उनसे पहले वनस्पतियां हुई। भिन्न-भिन्न प्रकार की सृष्टि उत्पन्न करके, अन्त में ब्रम्हा जी ने दस पुत्र उत्पन्न किये, जिन्होंने मानव सृष्टि उत्पन्न की। ब्रम्हा जी के इन दस पुत्रों में छ: ऋषि थे और वे ब्रम्हा जी के मानस पुत्र कहलाये। ऋषि उनको कहा जाता था जो वेदों की ऋचाओं को सुनकर उनका अर्थ मानव-भाषा में कर सकने में सक्षम हो। अभिप्राय यह है कि इन ऋषियों ने वेद-वाणी सुनी और उनके अर्थ समझकर अन्य मानवों को उसका ज्ञान लाभ पहुंचाया। इन छ: ऋषियों में एक मरीचि ऋषि थे, उनके पुत्र कश्यप थे, जिनकी उत्पत्ति अमैथुनीय थी। और कश्यप ये ही सब प्रजा उत्पन्न हुई। कूर्म और कश्यप एक ही शक्ति और व्यक्ति के नाम है। कश्यपी वै कूर्म: - शतपथ ब्राम्हण: कश्यप ने ही शेष प्रजा उत्पन्न की। भारतीय पौराणिक साहित्य में तीन प्रकार के देवताओं का उल्लेख मिलता है। एक प्रकार के वे देवता है जिनका उल्लेख ऋग्वेद(10-72-8) में है। दूसरे प्रकार के देवता है जिसका उल्लेख मनुस्मृति(1-13) में आया है। जब हिरण्यगर्भ विखंडित हुआ तो पृथ्वी (नक्षत्रादि) और देवता बने। ये देवता सूर्य, मरूत, इन्द्र, वरूण इत्यादि थे। तीसरे देवता थे दक्षकन्या आदिति के बारह आदित्य पुत्र। इनमें इन्द्र, वरूण, विष्णु आदि थे। ये तीनों प्रकार के देवता भिन्न-भिन्न माने गये है। आदिति के पुत्र इन्द्र, विष्णु इत्यादि देवता मानवों के पूर्वज है, ऐसी पौराणिक मान्यता है।

भाष्यकार सारण वेद को अपौरूपेय तो मानते है, पर उस अपौरूपेय का अर्थ केवल यही है कि वेद मनुष्यकृत नहीं है। ऋग्वेद का मध्यकाल वह माना जाता है जब आर्यो का बिस्तार लगभग सिन्धु या सरस्वती नदी तक हो चुका था। उत्तरापथ में भी उनका विस्तार कठिनाई से गंगा तट तक ही हुआ था। तब ना तो नगर बसे थे और ना नागरिकता स्थापित हुई थी, किन्तु सभ्यता की उत्कृष्ट सीमा उनके चिंतन, विचारों और रहन-सहन में प्रकट होती थी। तब तक कुटुम्बों की प्रथा प्रचलित हो चुकी थी। और कुटुम्बों का पिता या अन्य बड़ा उसका मुखिया माना जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि जाति और वर्ण ऋग्वेद काल में नहीं बन पाये थे। कुटुम्ब अवश्य थे और पिता उसका मुखिया अथवा गृहपति माना जाता था। वैदिक काल के आर्यो के उत्कृष्ट विचारानुसार समस्त संसार के मानवगण उनके एक परिवार के अंग थे। वेदशास्त्र वाणी 'वसुधैव कुटुम्बकम्' को चरितार्थ करने की उनकी परिकल्पना थी।

प्राचीन काल में भारतवासी 'आर्य'शब्द का प्रयोग सम्पन्न, शिष्ट, सम्पूर्ण, कर्तव्य-परायणता, श्रेष्ट मानव के अर्थ में करते थे। उनके आदर्श में सम्पूर्ण मानवों को उच्च स्तर पर पहुंचाने की सहज प्रेरणा मिलती थी। प्राचीन काल के आदर्श वाक्य 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम'से यह प्रमाणित हो जाती है। डा. रांगेय राघव ने अपनी पुस्तक (प्राचीन भारतीय परम्परा और इतिहास, 1953, आत्माराम एण्ड सन्स, दिल्ली) में लिखते है, 'बहुमती टोटस (Totem)  और टैबू (Taboo) जातियों का भेद समझ लेना ठीक होगा। मुसलमान सूअर से चिढ़ते है उनके लिये सूअर टैबू है।' आचार्य क्षितिज मोहन सैन ने अपनी पुस्तक, भारतवर्ष में जाति भेद में पृष्ट 114 पर ई. थस्टर्न की 'कास्टस एण्ड ट्राइब्स आफ सदर्न इण्डिया' से टोटस जातियों की सूची दी है। उसमें कूर्म जाति सा कूर्म जन्तु टोटम वाली जाति का हिन्दी रूपातंर कूर्म बताया गया हैं।

प्रोफेसर यम. विलियम की संस्कृति-अंग्रेजी शब्दकोष में कूर्मी के अर्थ दिए है, 'अतिशक्तिमान पुरूष' वेदों के प्रख्यात भाष्यकार सायण वेदों में आये कथन, तुवि कूर्मि  की व्यवस्था करते है, एक ऐसा परमवीर पुरूष जो दुर्लभ से दुर्लभ वीरोचित निपुणता एवं कौशल युद्ध क्षेत्र में प्रदर्षित करने में सक्षम हो। यह विशेषण वेदों में देवराज इन्द्र के लिए विशेषत: प्रयुक्त हुआ है। इन्द्र को वेदानुसार परमवीर, अजेय, देवी-देवताओं का सदैव रक्षक एवं मित्र और एक सच्चे तथा आदर्श क्षत्रिय के सम्पूर्ण गुण सम्पन्न बतलाया है। आचार्य शंकर के अनुसार 'इन्द्रो मायाभि: पुरूष ईयते'- अर्थात् इन्द्र परमेश्वर है, वही माया के द्वारा नाना रूप धारण कर लेता है। सबसे पहले पराशर और वराहमिहिर ने यह उद्धाटित किया था कि भारत वर्ष नव खण्डों में विभक्त है। बाद में यह धारणा कुछ पुराणों के लेखकों ने ग्रहण की। मार्कण्डेय पुराण के कूर्म निवेश-खण्ड में भारत वर्ष का धरातल लेते हुए पूर्वाभिमुख कूर्म अथवा कच्छप के ऊपरी पृष्ठ के समान उत्तल आकार वाला बतलाया है।

यह अवधारणा भारत की भौगोलिक विशेषताओं संबंधी हमारे वर्तमान ज्ञान से पूर्णत: तर्क संगत है। इनसाइकिलोपिडिया ऑफ ब्रिटानिका (वाल्यूम 13, प्रथम संस्करण, 1929, पृष्ठ 517) के अनुसार 'कुम्बी' का अर्थ है एक गृहस्थ, 'पश्चिमी भारत की एक महान कृषक जाति' वेदोपरान्त काल का संस्कृत शब्द कुटुम्बिक:, जो कि आदि शब्द का संस्कृत रूप हो सकता है। यह नाम उत्तर भारत में कूर्मि(कुरमी) रूप में प्रचलित है, जहां इस जाति के लोग गंगा नदी के किनारे-किनारे वाले क्षेत्र में तथा इसके दक्षिणी क्षेत्रों में बहुसंख्या में बसे हुए हैं। इसी जाति के लोगों को गुजरात में कणबी, कनबी तथा महाराष्ट्र तथा मध्य प्रान्त में कुनबी कहा जाता हैं। दक्षिण भारत के कुनबी की तुलना मद्रास के तेलगु अंचल के कापू से तथा विभिन्न जगहों की अन्य जातियों से भी की जाती है। वास्तव में मराठे लोग कुनबियों से उंचे स्तर के हैं जो कि दक्खिन/महाराष्ट्र में कुल आबादी में बहुसंख्यक है।

पादरी डॉ जान विल्सन के अनुसार कुरमी, कुनबी और कुम्बी एक ही जाति के रूपान्तरित नाम हैं जो कि संस्कृत धातु कृष या कृषमी से बने हैं, जिनका अर्थ है कृषीय कार्य करने बाला जो कि बाद में हिन्दी में कुरमी गुजराती में कुलबी तथा मराठी में कुनबी हो गया। किन्तु प्रमुख समाजशास्त्री डॉ जी. ओपर्ट उपयुक्त व्याख्या से इस आधार पर सहमत न थे कि संस्कृत भाषा में कृषमी जैसा कोई शब्द नही हैं। प्रसिद्ध मानव-जातिशास्त्री सर डब्लू.विलियम क्रुक ने अपनी पुस्तक -'दि ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ दि नार्थ-वेस्टर्न इण्डिया' में कुरमी या कुनबी को इस प्रकार वर्णन किया है. 'एक बहुत ही महत्वपूर्ण कृषक जाति जो कि प्रान्त में सर्वत्र बसी हुई है। अनेक व्युत्पत्ति इस नाम के लिए बना ली गई है। कुछ की मान्यता है कि इसकी व्युत्पत्ति संस्कृत के 'कृषि' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है खेती कार्य, अन्य लोगों के अनुसार यह शब्द 'कूर्म' से उत्पन्न है जोकि विष्णु-अवतार का एक रूप है कूर्म अथवा कच्छप, जिसपर ऐसी मान्यता है कि पृथ्वी टिकी हुई है या अन्य खेतिहर जातियों द्वारा उसकी पूजा-वन्दना की जाती है।

इस संदर्भ में प्रोफेसर जे.एफ.हेविट ने कुरमी जाति का उनकी अन्य समवर्गीय जातियों सहित गूढ़ता से अध्ययन किया है, विशेष करके इनकी कुरमियों की प्राचीनकाल में क्या भूमिका रही है। उनके इस शोधकार्य को ओरियन्टल पब्लिसर्स, दरियागंज, दिल्ली ने सन् 1972 में 'दि रूलिंग रेसेज ऑफ प्रीहिस्टारिक टाईम्स' नामक अंग्रेजी भाषाकृत पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इस लेखक का मन्तव्य है कि कुरमी (Kurmis) कुरमबस (Kurambas), कुदमबस(Kudambas), कुदम्बीस(Kudambis) भारत की सिंचित(आब-पाशी) से कृषि करने वाली महान जातियां थी (were the great irrigating agricultural race of India) जो कि 'कुर' (कच्छप या कूर्म) की सन्तानें है।

प्रोफेसर हेविट ने अपनी उपर्युक्त पुस्तक में प्रागैतिहासिक-काल की कुछ प्रमुख शासक जातियों का भी विस्तार से उल्लेख किया है, जोकि उस अतीतकाल में भारत में तथा दक्षिण-पश्चिम एशिया एवं दक्षिण योरूप विद्यमान थी। इन जातियों के संबंध में प्रो. हेविट लिखते है, 'टूरानियन लोग (Turanians) व्यंजन-ध्वनि का प्रयोग नहीं करते है अत: फ्राइयानो(Fryano) अवश्य टूरानियन शब्द रहा होगा तथा वीरू-आनो(Viru-ano) एक जाति विशेष रही होगी, जिसका इष्ट-देवता वीरू है। वहां वह हिन्दू विराट के समान ईरानी समदेवता अवश्य रहा होगा, जोकि महाभारत काल में जमुना-तट पर बसे मथुरा राज्य प्रशासन करता रहा होगा। ये वैसे ही लोग है जैसे कि कुरूमबस (Kurumbas),शिकारियों और गड़रियों की एक जाति जोकि दक्षिण भारत में सर्वत्र फैली है। इन लोगों के इष्ट-देवता जैसा कि हमें माकेन्जी-ग्रन्थ से विदित होता है वीरू-भद्रा अथवा कल्याणकारी वीरू या लैगिक देवता है, और ये कबीले अमूमन यातो शक्ति-पूजक है, या उपासक है जननेंद्रिय सूचक प्रतीकों के। वे अपने को घोशित करते है। ईदाइयास (Idaiyas) अथवा भेड़-रूपीय देवता इदा (Ida) या ऐदा(Eda) की सन्तान, जोकि कुरमी या कुदुमबिस नामक महान कृषक जाति के अंश में से है (प्रोफेसर जी. ओपर्ट 'ओरिजिनल इनहबीटेन्टस ऑफ भारतवर्ष, भाग 2 पृष्ठ 237-239)। ये वे लोग है जोकि वीरू-पक्ष (Viru Paksha) या वीरू-पूजकों के कबीले के है जिनका चूला-वग्गा (Chula-Vagga) के नाम-पूजक जातियों की सूची में नामांकन किया गया है।

उपर्युक्त लिंग-देव के विवरण में, जो कि पुरूष और स्त्री सन्तानोत्पत्ति सूचक प्रतीकों के रूप में, जो शिव-लिंग से मिलते-जुलते हैं और प्रो. हेविट के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में जो इदाइयास(Idaiyas) नामक लोगों द्वारा पूजा जाता था, और कुरमी नामक महान कृषक जाति के एक अंग थे। आर्यो ने एक समुदाय नाग पूजक मतावलम्बियों का भी था और नाग-वंशी क्षत्रिय अपनी उत्पत्ति उन्हीं से मानते है। कुरमियों में भी नाग-वंशी मतावलम्बी लोग थे। इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रगैतिहासिक समय में, जब कि आर्य-वंशियों में चतुवर्ण-व्यवस्था स्थापित नहीं हो पाई थी, तब भी कुरमी नाम से जानी पहचानी जाने वाला हिन्दुओं में एक वर्ग विशेष मौजूद था, और उनका ही विस्तार से उल्लेख प्रो. हेविट द्वारा अपने शोध-ग्रंथ में यत्र-तत्र किया गया है। वे शायद शैव्य थे, शिव-लिंग या लैंगिक-देव के उपासक थे और उनमें से कुछ नाग-वंशी मतावलम्बी क्षत्रियों में से भी थे।

प्रोफेसर हविट अपनी उपर्युक्त पुस्तक के पृष्ठ 282 पर वर्णन करते है, 'अस्सीरिया(Assyria) और मिश्र (Egypt) का धार्मिक इतिहास यह प्राय: स्पष्ट कर देता है कि इन दोनों देशों के देवताओं का आगमन समुद्र मार्ग से हुआ। दक्षिणी अक्काडियनों के लिए मा (Ma) या जलपोत था देवताओं को जन्म देने वाला गर्भाशय, और वह जलपोत था जिसमें ईरा (Ira) को जन्मा जो कि मत्स्य-देवता था और मत्स्य-त्वचा मंडित था, और जो इरीदू (Eridu) बन्दरगाह के रूप में अवतरित हुआ, उस ज्ञान को जो कि अपने जन्म-स्थल में ग्रहण किया था, समुद्राटन कर सारे देश में फैलाया। वह देश अवश्य भारत वर्ष रहा होगा, जहां के नदी-देव घड़ियाल (Alligator) है, जो कि मेघादास लोगों का टोटम है और जो सप्ताहों को चक्र-बन्धन में बांधे है जिसका एक सम्पूर्ण चक्र ने कुश(Kush) और (Kur) के वर्ष की रचना की। यह अन्तिम नाम जिसका उल्लेख अवकाडियन कुर (Akkadian Kur) में है और जिसका मतलब है पूर्व की पर्वतीय भूमि तथा कूर्म कच्छप भूमि दोनों से। वहां से अक्काडियन लोग सूती कपड़े को प्राप्त करते थे, जो कि पुरातन बेबीलोनियन उल्लेखों में, 'सेपत कुर्री (Sepat Kurri) या कूर का कपड़ा कहा जाता था। यह कपास उगाई गई होगी, जैसा कि अभी भी उगाई जाती है खानदेश में बसे कुरमियों द्वारा (By the Kurmis living in Kandesh), कस्बे की खाड़ी के तट पर, वह अचल जो कि महाभारत में करपासिका (Karpasika) कहीं गई थी और जो इरीदू के बन्दरगाह पर जल-पोतों द्वारा अवश्य लायी जाती रही होगी।'

कूर्मावतार भगवान विष्णु का कूर्म या कच्छप रूप में हुआ अवतार हिन्दुओं के लिए धर्म-मतानुसार एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पौराणिक घटना है। प्रो. हेविट के उपर्युक्त विवरण से इस बात की पुष्टि होती है कि पुरातन काल में किसी जाति विशेष के लोग भगवान के कूर्मवतार के उपासक थे और वे लोग अपने इष्ट देव, कूर्म भगवान के उपासक होने के कारण अन्यों द्वारा बाद में कूर्मि या कुरमी जाति बोधक नाम से जाने पहचाने जाने लगे थे।

प्रोफेसर हेविट अपनी उपर्युक्त पुस्तक के पृष्ठ 324 पर कुरमियों के बारे में अन्य महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए लिखते है, 'परम पवित्र और परम पुरातन, जैन पूजा-स्थल उन जिलों में स्थित है जिन्हें प्राचीन काल में सिन्धु सुवर्ण और सौराष्ट्रकहा जाता था। उत्तर में जिसके सतलज नदी है और जो कि पश्चिमी तट के बन्दरगाहों के आस-पास का क्षेत्र है। इन सबको महाभारत में भागादत्ता (Bhaga datta) कहा गया था। भागा (Bhaga) जो कि खाद्य फलों का देवता है, द्वारा दिया हुआ कुरमी कृषकों (Kurmi Cultivators) की उद्यान भूमि, जो कि कपास, नील, गन्ना पुरातन सौराष्ट्रके काठियावाड़ और गुजरात की उर्वरा भूमि में उगाते थे'

यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि आधुनिक गुजरात राज्य और सौराष्ट्र अंचल के पटेल बन्धु जोकि अपने कृषि कार्य में अद्वितीय परिश्रम क्षमता तथा निपुणता तथा आज के व्यावसायिक सूझबूझ के लिए प्रसिद्ध है, जो कि कुछ दशक पूर्व तक, यानी प्रसिद्ध बारदौली किसान सत्याग्रह के दौरान में भी, पाटीदार और कनबी या कण्बी नाम से जाने पहचाने जाते थे, उन्हीं के पूर्वजों को प्राचीन काल में कूर्मि या कुरमी जाति बोधक नाम से तथा एक महान सिंचित खेतिहर जाति के नाम से प्रो. हेविट ने जो अपनी उपर्युक्त् पुस्तक में विस्तार से उल्लेख किया है, वह तथ्य प्रमाणित हो जाता है। यह भी सर्वमान्य है कि गुजरात तथा सौराष्ट के तटों से समुद्र मार्ग से सुदूर देशों से व्यापार, जिसमें कच्चे तथा तैयार माल का आयात-निर्यात किया जाता रहा है। जिस प्रकार कालीकट (Calicut) का उत्पन्न सूती कपड़ा विदेशों में प्राचीन काल में केलिको(Calico) कपड़े के नाम से प्रसिद्ध था उसी प्रकार खानदेश में उपजाई गई कुरमियों द्वारा कपास से बना कपड़ा 'सेपत कुर्री' के नाम से परदेशों में विख्यात हो गया था।

यह निष्कर्ष निकालना उचित ही है कि प्रोफेसर हेविट ने बड़ी लगन तथा अथक परिश्रम से, एक विदेशी होते हुए अत: अनेकानेक प्रकार की विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी सतत् शोध द्वारा प्राचीन कालीन कुरमियों के इतिहास को खोज निकालने की अति प्रशंसनीय कार्य किया है। इनसे प्रेरणा लेना चाहिए उन भारतीय इतिहासकारों को जिनकी पैठ कुरमियों के बारे में इतनी विस्तार से तथा प्राचीन काल सम्बन्धी नहीं रही है।

प्रो. हेविट इसी संदर्भ में, अपनी पुस्तक के पृष्ठ 429 पर कुरमियों के बारे में प्राचीन काल में प्रचलित एक विशेष रीति-रिवाज का वैवाहिक अवसरों पर इन शब्दों में व्यक्त करते हैं, 'यह आम, या आभ्र-वृक्ष रूपी मां की पूजा-वन्दना करते हुए, उसी वृक्ष के साथ पहले कुरमी जाति के वरों, जोकि कुर या कच्छप की सन्तान है, का अपनी-अपनी बंधुओं से पहले, विवाह-संस्कार सम्पन्न कराये जाते हैं, और अम्बा तथा महाभारत के राजकुलों की माताओं अम्बिका और अम्बालिका के नाम उससे सम्बधित है। ..... ये नाम, जैसा कि मैने पौराणिक किवदन्तियों से उद्धाटित किया है, उन माताओं के है जो कि मायावी मेघादास, कोरवों अर्थात् कूर(Kur) या कच्छप के पुत्रों और उनके विरोधी तथा उत्तराधिकारी पाण्डवों या श्वेत पांडु (pandu) की सन्तति की जननी है।

हम सब जानते है कि आम को आम्र और अम्ब नामों से भी जाना जाता है। पुरातनकाल में आम के पेड़ में अथवा अम्ब-वृक्ष में माता अम्बा की परिकल्पना की गई होगी। यद्यपि समय के साथ-साथ न केवल कुरमियों के बल्कि हिन्दुओं की प्राय: अन्य जातियों के वैवाहिक रीति रिवाजों में बदलते समय में पहले से अब के में मूलभूत परिवर्तन हो चूके हैं, फिर भी कुछ रसमें पहली की अब भी कांट-छांट कर या परिवर्तित रूप में उन अवसरों पर सम्पन्न की जाती है। समय के अभाव में अब विवाह समारोह तीन दिन के स्थान पर केवल एक दिन मात्र का रह गया है। पर पहले लोगों के पास समय की कमी न थी अत: तरह-तरह के संस्कारों के अभिन्न अंग थे जोकि आज के परिवेश में हास्यापद लगना स्वाभाविक है। पर वे एक समय में प्रचलित थे इस तथ्य को नकारा भी नहीं जा सकता। प्रो. हेविट् ने उसी संस्कार का विवाहोत्सव के समय कुरमियों द्वारा सम्पन्न करने का उल्लेख किया है। तब आम अथवा अम्ब वृक्ष से कुरमी वर का अपनी होने वाली वधू से पूर्व विवाह कराने का संस्कार तो अब लुप्त हो गया है जोकि इस शुभ अवसर पर कुलदेवी अम्बा के प्रति अपनी अटूट श्रध्दा एवं आदर व्यक्त करना था, पर विद्व पाठकगण ध्यान दे तो पायेंगे कि अभी भी कुरमी वर और वधू पक्षों के घरों में, उत्तरीय भारत में, विवाह समारोह के दौरान आंगन में सुन्दर-सुन्दर मंडप सजाये जाते है, जिसके मध्य मढ़े गाढ़े जाते है। जोकि लकड़ी का खम्ब या देहातों में हल के रूप में भी होता हैं इस केन्द्रीय मढ़े की लकड़ी में पूजन की तरह तरह की वस्तुओं और खिलौने के साथ आम या अम्ब वृक्ष की हरे, पत्तों सहित टहनियां बांधकर सुसज्जित किया जाता है। वर द्वारा विवाह के लिये प्रस्थान से पहले उस मढ़े की अथवा अम्ब वृक्ष की पूजा करायी जाती है। और उधर वधू पक्ष के यहां बारात पहुंचने पर उसी प्रकार के अम्ब वृक्ष की टहनियों से सुसज्जित मढ़े के सम्मुख बैठकर वर-वधू का पाणि-ग्रहण संस्कार सम्पन्न कराया जाता है। देवी अम्बा तथा पुरातनकाल में कुरमियों में वैवाहिक अवसरों पर अम्ब वृक्ष के साथ दुल्हे का पहले विवाह कराना फिर उसकी होने वाली दुल्हन से इस प्रकार की रस्मों के पीछे क्या धार्मिक पक्ष था, उनमें कब और क्या परिवर्तन अब आये है यह अपने में एक खोज का विषय है।

रिसले ने अपनी पुस्तक (ट्राइब्स एंड कॉस्ट्स ऑफ बंगाल, भाग, पृष्ठ 531) में महाभारत युद्ध की कुछ प्रमुख विभूतिओं का उललेख इस प्रकार किया है 'अम्बा, जैसा कि किवदन्ती प्रचलित है, काशी नरेश की पुत्री थी, उसे भीष्म जबरदस्ती उसकी बहिनों अम्बिका तथा अम्बालिका सहित उनके स्वयंवर से विचित्रवीर की पत्नियां बनाने हेतु ले आये थे। बाद में यह जानने पर कि वह शाल्व को मन से पति मान चुकी थी, उसके पास जाने के लिए अम्बा को भीष्म ने मुक्त कर दिया। शाल्व द्वारा भी उसे पत्नी रूप में ग्रहण करने इन्कार करने से अपमानित एवं तिरस्कृत अम्बा ने भीष्म से प्रतिशोध लेने की मन में ठान ली। अन्याय उपाय के बाद अन्त में अम्बा ने अशुतोष शिवजी की घोर तपस्या करके वर प्राप्त किया, जिससे पांचाल नरेश् द्रुपद के यहां उभयलिंगी बालिका के रूप में जन्म लिया और नाम पड़ा शिखिडिन। बाद में नपुंसक पुत्र द्रुपद का बनकर वही शिखंडी कहलाया। उसी ने भीष्म का, जोकि दसवें द‍यु (Dyu - इनको आठ वसुओं में से एक माना जाता है) और उत्तर दिशा के सूर्य देव माने जाते थे कौरवों और पाण्डवों के मध्य लड़े जाने वाले महायुद्ध में वध कर डाला। इस प्रकार वह (अम्बा) अपनी तपस्या के कारणद्ध सार्वलौकिक देवी, शिव-उमा या पार्वती के रूप में प्रतिष्ठित की गई। वे इन्ही अम्बा की बहनें (अम्बिका और अम्बालिका) थीं जोकि किवदन्तियों के अनुसार आम के पेड़ या अम्ब वृक्ष द्वारा गर्भदान कर, कौरवों और पाण्डवों के पिता क्रमश धृतराष्ट् और पांडु की माता, तथा दूसरी जरासंध की माता बनी।

अम्ब वुक्ष में अम्बा देवी की परिकल्पना की गई। अम्बा देवी की कृपा प्राप्त करने के लिये उनको विवाह योग्य स्वीकारने के लिये जोकि शाल्व और भीष्म द्वारा विवाह के लिये ठुकराई गई थी, शायद इस स्वीकृति को सांकेतिक रूप में प्रदर्षित करने के लिये कुरमी दुल्हे का प्राचीन काल में अपनी दुल्हिन से पूर्व अम्ब वृक्ष से विवाह रचाया जाता रहा हो। रिसले के शब्दानुसार इस तरह आम पेड़ को कुरमी या कच्छप जाति के पुरूषों की माता वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, जिससे वे लोग अपनी-अपनी वधुओं से विवाह करने से पूर्व विवाह रचाते है। ( They thus established the Aam or mango tree as the mother tree of the males of the Kurmis or tortoisa race, to which they are firat wedded before being married to their wives).

सिखों के गुरू श्री अर्जुनदेव जी ने अपने शब्द में श्री हरि को अनेक नामों जैसे गोपीनाथ, भक्त वत्सल वासुदेव आदि से सम्बोधित किया है। इसी शबद में वह कहते है, 'मछ कछ, कुरम, आग्या अउत्तरासी'। ये दोनों चरित्र क्रमश: मत्स्यपुराण और कूर्मपुराण से उद्धत किये गये है। कूर्म पुराण के अनुसार हरि ने कच्छप का रूप धारण किया और समुद्र मथन के समय कूर्मि-रूपी नारायण की कृपा से पराजित, हरि चन्दन, पांच कल्पवृक्ष, कौस्तभ मणि, चन्द्रमा, ऐरावत कामधेनु उच्चश्रेवा घोड़ा, लक्ष्मी, कालकूट विष आदि मिले। इसी कूर्मावतार के कारण प्राप्त अमृत के कारण देवता अमर हो गये।

सुधी पाठक गण हेविट और रिसले जैसे विद्वानों के उपर्युक्त ग्रन्थों में वर्णित पौराणिक आख्यानों से परिचित होंगे। उसकी सत्यता से सहमत वे पूर्णतया हो या न हों, पर इस विवेचना से एक बात स्पष्टत: उभरकर आती है कि भारतयुद्ध या महाभारत काल में कूर्मवंशीय लोग या यों कहिये कि आज के कुरमियों के पूर्वज, अवश्य विद्यमान थे और तब उनकी गणना शासक जातियों में की जाती थी। प्रागैतिहासिक उस काल में कुरमी जन-साधारण जाति का उल्लेख हमें सिंचित खेतिहार जाति के रूप में भी प्रमाणित मिलता हैं ।

-- इति समाप्तम् --

टिप्पणियां 

 
+4 #8 RE: प्रागैतिहासिक काल में कुर्मी जातिRAJESH KUMAR SINGH 2012-01-29 18:00
I proud to be one of the member of kurmi samaj.
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+7 #7 i am kurmiRajesh Ranjan 2011-12-03 23:29
i proud our kurmi samaj. jay hind jay kurmi
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+12 #6 etihas ki jankari desudha patel 2011-10-07 20:15
Web par etihas ki jankari de .
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+9 #5 ProudJitendra Chandrakar 2011-10-07 13:59
We are proud to be a Kurmi. Thanks for this vary interesting article.
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+25 #4 kurmiyo ko apni jati ka bhan nhiku.pooja Patel 2011-05-09 20:37
kurmi samaj ko apne etihas ka ghan nhi na hi ek he anek firko bate he
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+26 #3 RE: प्रागैतिहासिक काल में कुर्मी जातिshilpi 2011-02-11 22:29
i liked the details. it would be more helpful if it's in hindi.
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+23 #2 zsujeet 2011-01-29 10:11
jankar achchha laga
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+1 #1 need more detailsManish 2010-12-14 00:32
These days Kurmi samaj consider under OBC or SC/ST. Can I marry a brahmin girl?

Girls parents says that we belongs to a lower cast. IS IT TRUE?

Please help me.
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