हमारा प्रतीक

अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा के गठन के 85 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद महासभा के 1981 में रायपुर में आयोजित 34वें महाधिवेशन में श्री राजेन्द्र कुमार(प्रचार मंत्री, प्रकाशक, सम्पादक, कुर्मी संदेश, कन्नौज व सम्पादक कुर्मी क्षत्रिय जागरण) द्वारा यह प्रतीक प्रस्तुत किया गया। द्वितीय दिवस के खुले अधिवेशन में विस्तृत विचार विमर्श के बाद, इस प्रतीक को बिना किसी संशोधन के मूल रूप में सर्व सम्मति से स्वीकार कर लिया गया और आज सम्पूर्ण भारत वर्ष में इसे स्वजाति बंधुओं द्वारा अपना लिया गया है।
प्रतीक के पृष्टभूमि में भूमि को दर्शाया गया है जो हमारे व्यापक भूमिपति होने का द्योतक है, गेंहूं की बालियां हमारे गौरवपूर्ण कृषक होने को प्रदर्शित करती है। दो तलवारें हमारे शौर्य व क्षत्रियत्व की द्योतक है। बालियों एवं तलवारों के मध्य ज्योति, मानव ज्योति है अर्थात इसका सम्पूर्ण आशय है कि हम सर्वप्रथम सभ्य समाज के रूप में इस धरा के स्वामी बनें व हमारी दोनों भुजाओं-बायीं भुजा में हल तथा दाहिनी भुजा में तलवार के मध्य मानव जीवन सुरक्षित है। हम मानव जाति को सुरक्षा एवं पोषण दोनों ही प्रदान करते हैं अर्थात कुर्मी बांधव रक्षक एवं पोषक दोनों है।
सभी स्वजाति बंधुओं से निवेदन है कि अपने प्रतीक को मकान, वाहन, व्यावसायिक साईन बोर्ड, कॉलर पिन, टाईपिन आदि पर प्रदर्शित करें जिससे हम अपने बंधुओं, उनके निवास व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को स्वतः ही पहचान सके। अपने लेटर पेड व विजिटिंग कार्ड पर इसका उपयोग किया जा सकता है।
साभार –
स्मारिका, 40वां राष्ट्रीय महाधिवेशन, अखिल भारतीय कूर्मी क्षत्रिय महासभा







रक्त में पायी जाने वाली बिमारी है। रक्त में हीमोग्लोबीन नामक प्रोटीन पायी जाती है जो ऑक्सीजन के परिवहन में मदद करती है। हर प्रोटीन में अमीनो एसिड का एक निश्चित क्रम होता है जो उसे संरचना एवं कार्य प्रदान करता है। रक्त में स्थित इस प्रोटीन में अमीनो एसिड के क्रम में सातवें स्थान पर विद्मान ग्लूटॉमिक एसिड के बदले में वैलाईन आ जाता है जिससे प्रोटीन की संरचना बदल जाती है। इस संरचना में बदलाव के कारण लाल रक्त कण का आकार हंसिये का आकार का हो जाता है। इस आकार के कारण रक्त में ऑक्सीजन का परिवहन कम हो जाता है।











