| 05 अक्टूबर 2009
इतिहास साक्षी है कि जब भी देश और समाज को कूर्मवंश के सहयोग की आवश्यकता प्रतिपादित हुई उसी क्षण इस समाज के सपूतों ने आगे बढ़कर उसकी प्रतिष्ठा को कायम रखा है। आज हर क्षेत्र में हर उद्योग में और देश के आर्थिक ढांचे को सुदृढ़ बनाने में कूर्मवंश के रत्न रीढ़ की हड्डी जैसा कार्य कर रहे है। कूर्म वंश के गर्भ से जिन रत्नों का उदय हुआ हैं उनमें से कुछ का गौरवपूर्ण परिचय का प्रकाशन जागृति शुरू से करती आ रहीं हैं जो आपको बताती है कि-परिश्रम लगन प्रयत्न और पुरूषार्थ से कोई कितना बड़ा बन जाता है इसके उदाहरण हमारे मफतलाल गगनभाई- मफतलाल वस्त्रोद्योग अलेम्पिक रसायन कम्पनी स्थापित करने वाले भाईलाल भाई हाजीभाई अमीन, हिन्दुस्तान में सर्वप्रथम ट्रेक्टर निर्माण करने वाले पाशा भाई, इन्जी. क्षेत्र की ज्योति लिमिटेड के नानूभाई अमीन, अमूल दुग्धोद्योग के संगठक त्रिभुवनदास पटेल, प्रसिध्द केमिकल कम्पनी के संस्थापक अम्बाभाई साराभाई, निरमा के करसनभाई, या शून्य से अरबपति बनने का इतिहास रचने वाले, वायोप्यूल से हवाई जहाज उड़ाने व अमेरिका तरह क्रमिक बर्षा की अनुमति सरकार से मांगने वाले अप्रवासी भारतीय का नाम हैं - सेम वर्मा। बेतूल में देश के पॉचवे धाम बालाजीपुरम् की स्थापना कर कूर्मियों का मान बढ़ाने श्री वर्मा ने अमेरिका में भारत को गौरवन्वित किया हैं इन्हें राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने 1984 में टाक्स फोर्स सदस्य बनाया और अमरिकी मेयर ने फेक्ट्री लगाने पर सम्मानित किया है उनका यह साक्षात्कार अप्रेल 1992 के अंक में जागृति द्वारा प्रकाशित किया गया था, भारत के केन्द्र बिन्दु कटनी जिसे बारडोली भी कहा जाता, के आगमन पर जागृति द्वारा यह साक्षात्कार पुन: प्रकाशित किया जा रहा।
बैतूल की ग्रामीण पृष्ठभूमि में पैदा तथा जबलपुर से इन्जीनियरिंग की डिग्री प्राप्त करके आज से तीस वर्ष पूर्व एक युवक उचित रोजगार की तलाश में भटक रहा था। घर की स्थिति मध्यम होने के बावजूद वह अमेरिका जाने के लिये 14 हजार रूपये नहीं जुटा पा रहा था। इस बीच उसके एक रिश्तेदार उसे आर्थिक मदद कर अमेरिका जाने के लिये प्रोत्साहित करते है। तीस वर्ष के छोटे अन्तराल में लगन मेहनत प्रतिमा और अपने महात्वाकांक्षी जुनून से वह युवक देश के गिने-चुने अरबपतियों में से एक है। आज उस युवक के पास अमेरिका में कई उद्योग एवं भारत में टायर फेक्ट्ररी है हाल ही में उन्होंने एक हवाई जहाज खरीदा है। जिसकी कीमत 90 करोड़ रूपया है। उनके पास पांच निजी हवाई जहाज हैं। भारत में 7 जनवरी 92 को भोपाल से एयर टेक्सी के क्षेत्र में पदार्पण करते ही वे इस क्षेत्र के अग्रणी व्यवसायी बन गये। शून्य से शुरू करके अरबपति बनने का इतिहास रचने वाले इस अप्रवासी भारतीय का नाम सेम वर्मा।
उनसे हुई बातचीत के अंश ---
भारत में जन्में होने के कारण निश्चित रूप से मेरा भावनात्मक रिश्ता भारत वर्ष के साथ है और यही कारण है कि अब अन्य देशों की तुलना में भारत की स्थिति देखकर पीड़ा होती है। ऐसा लगता है कि जैसे देश के अधिकांश व्यक्ति निहित स्वार्थो के दायरों में फस गये है। किसी को देश के बारे में सोचने का समय नहीं है। राष्ट्रीय बोध के इस सीमा तक विलोपित हो जाने की कीमत आने वाले समय में हमें ही चुकाना पड़ेगी। अपनी बात जारी रखते हुए श्री सेम वर्मा बड़ी भावुकता से कहते हैं कि आज अमेरिका में अथाह पैसा कमा लेने के बाद भी सभी अप्रवासी भारतीयों की तरह मुझे भी मानसिक शांति नहीं मिलती। वे विनोदपूर्ण तरीके से कहते हैं कि मेरे पास समय छोड़ कर सब कुछ है। एक अन्य सन्दर्भ में श्री सेम वर्मा कहते हैं कि अप्रवासी भारतीयों को सदैव यह अपराध-बोध घेरे रहता है कि उन्होने देश से लिया अधिक परन्तु दिया कुछ भी नहीं। इससे अधिक पीड़ा उन्हें तब होती है जब अप्रवासी भारतीय अपने इसी अपराध बोध के प्रायश्चित स्वरूप देश के लिए कुछ करना चाहते हैं और कुछ निहित स्वार्थो एवं भ्रष्ट नौकरशाह उनके प्रस्तावों के क्रियान्वयन में अड़ंगे लगाते हैं। श्री सेम वर्मा बतलाते हैं कि पांच छह वर्ष पूर्ण अप्रवासी भारतीयों ने देश में क्रास कन्ट्री हाइवेबनाने का प्रस्ताव भारत-शासन को दिया था जिसमें कि शासन का एक पैसा तक नहीं लगना था। पूरा व्यय ये लोग वहन करने को तैयार थे परन्तु वह प्र्रस्ताव आज तक फाइलों में कैद है। इसी प्रकार उन्होंने म.प्र. के बैतूल जिले में हेलिकाप्टर दान करके एयर एम्बूलेंस की व्यक्तिगत पहल की थी परन्तु प्रदेश के अधिकारियों की अप्रत्यक्ष मंशा यह है कि वह उस हेलिकाप्टर को बैतूल की बजाय भोपाल में रखा जाये इसी प्रकार श्री वर्मा बतलाते हैं कि उन्होंने बैतूल जिले के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए बिना अनुदान या शुल्क के इन्जीनियरिंग कालेज की स्थापना का प्रस्ताव रखा था जिसे कथित तकनीकी कारणों से अधर में लटका रखा है।
तुलनात्मक दृष्टि से भारत और अमेरिका में उद्योग स्थापित करना कहां सरल है?
निसन्देह अमेरिका में क्योंकि अमेरिका में एक दो उद्योगों को छोड़कर किसी भी उद्योग के लिए लायसेंस की आवश्यकता नहीं है। सरकार ने उद्योग या फैक्ट्री स्थापित करने के नियम बना दिये है। उद्यमियों की इन नियमों का कड़ाई से पालन करना होता है सबसे अधिक ध्यान पर्यावरण की हिफाजत पर देना होता है। उद्योगपतियों पर केवल आयकर का दायित्व होता है। वित्तीय बैकों की कार्य-प्रणाली इतनी सरल है कि उद्यमी द्वारा बैंक में प्रोजेक्ट देने के दो दिन के भीतर हां या नहीं में जबाब दे दिया जाता है बैंकिग कार्य निजी क्षेत्र में है।
भारत की नौकरशाही और लालफीताशाही काफी विवादास्पद है इस व्यवस्था पर कोई टिप्पणी?
भ्रष्टाचार, नौकरशाही और लालफीताशाही के कारण ही इस देश की उन्नति तेजी से नहीं हो रही जितनी कि होनी चाहिये वैसे वे यह भी मानते है कि भारतीय नौकरशाह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ नौकरशाह है और यदि इन्हें किसी कोण से दबाये रखे जाने की प्रवृति को समाप्त कर "लिबर्टी" दी जाये तो वे अपनी योग्यता एवं क्षमता के बल पर देश की उन्नति के कई सोपान रच सकते है। श्री एम. एन. बुच के नाम का उल्लेख करते हुए श्री वर्मा कहते है कि एक ओर इस तरह के प्रशासकों को पुरूस्कृत करना चाहिए तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार एवं भाई- भतीजेवाद की प्रवृति को पनपाने वाले प्रशासकों को कड़ी सजा देना चाहिये। एक ऐसा मंच होना चाहिए जहां पर कि नौकरशाहों की विवादास्पद कार्यप्रणाली एवं दायित्व पर प्रश्न पूछें जायें ओर शासन द्वारा नौकरशाहों को बाध्य किया जाये कि वे अपने पर लगे आरोपों का सार्वजनिक स्तर पर स्पष्टीकरण दें।
देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था एवं बजट पर आपकी राय ?
पिछले कुछ माह पूर्व देश का सोना बेचा गया, इसकी सार्वजनिक रूप से समीक्षा होनी चाहिए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कि घर का जेवर बेचने वाला कभी तरक्की नहीं कर सकता। वे उल्टे प्रश्न करते हैं कि जो जनता उस सोने की मालिक है उसे आज तक यह समक्ष नहीं आया कि सोना क्यों बेचा गया? वर्तमान औद्योगिक नीति की प्रशंसा करते हुए श्री वर्मा कहते हैं कि प्रगति के दृष्टिकोण से यह नीति दरअसल 20 वर्ष पूर्व लागू की जानी थी। उद्योग में निजीकरण के पक्षधर होने के कारण वे पूछते हैं कि देश के कितने सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे हैं और हम केवल कुछ नारों को ढोने की खातिर प्रतिवर्ष देश के करदाताओं का करोड़ों अरबों रूपए का नुकसान कर रहे हैं।
दुनिया में क्या सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार भारत में हैं?
मेक्सिको में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है जबकि अमेरिका में प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार के स्थान पर लाविंग सिस्टम है। अमेरिका में ट्रिकल डाउन एकानोमो की व्यवस्था है।
अमेरिका में पत्रकारिता का स्तर कैसा और किस प्रकार का हैं
अमेरिका में प्रतिष्ठित समाचार एजेन्सियों या पत्र समूह किसी भी तरह के क्रय से परे हैं। दूसरी बात यह है कि समाचार पत्रों को प्रतिवर्ष अपने प्रति जनता के विचार लेना पड़ते हैं और यह कानूनी रूप से बाध्यता है। इस प्रक्रिया के कारण समाचार पत्र सदैव जनता के प्रति अपने दायित्व की ओर सचेत रहते है यदि जनता किसी समाचार पत्र के पूर्वाग्रह या अन्य उद्देश्य को प्रमाणित कर देती है तो समाचार पत्र की मान्यता तक समाप्त हो जाती है। यह नीति स्वयं समाचार पत्रों एवं एजेन्सियों ने तैयार करवाकर सरकार से अनुमोदित करवायी है।
अमेरिका की राजनीति में भी क्या ऐसे मुद्दे है जिन्होंने आपको प्रभावित किया हो
अमेरिका की राजनीति में एक सबसे अच्छी बात यह हैं कि प्रतिनिधि एवं जनता दोनों प्रतिनिधि के मूल सिद्धान्तों की अच्छी समझ रखते हैं। दोनों इस मायने में अपने अपने दायित्वों का भली-भांति निर्वाह करते हैं। अमेरिका में जन प्रतिनिधि को प्रत्येक तीन माह में जनता के बीच आकर तीन माह के कार्यो का लेखा-जोखा देना पड़ता है। जन प्रतिनिधि को किसी समस्या या कार्य में व्यक्तिगत विचार को बजाय सामूहिक निर्णय को मनाने की बाध्यता रहती है। चुनाव खर्च का हिसाब-किताब सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करवाना आवश्यक हैं।
आप जब बैतूल से अमेरिका गये तो आपकी उपलब्धियों की यात्रा शून्य से प्रारम्भ हुई थी और आज आप अरबों की सम्पत्ति के मालिक हैं, सफलता की इस अकल्पनीय पायदान पर आप कैसे पहुंचे ?
मैंने पहिले भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी की थी, परन्तु एक मुद्दे पर प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया और मैंने नौकरी छोड़ दी। उसके बाद मेरी अमेरिका जाने की ख्वाहिश फिर जागृत हुई और मेरे एक नजदीकी रिश्तेदार की सहायता से मैं अमेरिका पहुंचा। वहां मैंने रात-दिन एक कर दिये। अध्ययन के समय से ही नौकरी करने लगा। दस डालर प्रति घंटा। मास्टर डिग्री प्राप्त करने में औसतन दो वर्ष समय लगता है परन्तु वह डिग्री मैंने नौ माह में पूरी कर ली। इसी बीच एक अन्य स्थान पर पार्ट-टाईम नौकरी कर ली। थोड़ा बहुत पैसा होने के बाद सोचा कि किराये का मकान तो काफी मंहगा पड़ता हैं। इसलिए क्यों न स्वयं का मकान बनाया जाये। अनुमानित निर्माण राशि देखी तो पाया कि श्रम लागत तो काफी आ रहीं है पर मकान बनाने की धुन सवार तो हो ही गई थी। बस फिर क्या था निर्माण संबंधी पुस्तकें पढ़कर सत्तर प्रतिशत मकान स्यवं मैंने मेरी पत्नी जयदेवी ने अपने हाथों से बनाया। मकान पूरा होने पर हिसाब-किताब जोड़ा तो पाया कि हमारा मकान प्रचलित बाजार दर की तुलना में मात्र एक-तिहाई कीमत में बन गया, लाभ पाने की इच्छा से उस मकान को बेचकर पहिले चार और फिर आठ मकान बनाये और बेचते गये और धीरे-धीरे अनजाने कालोनाइजिंग के व्यवसाय की ओर बढ़ते गये।
चार वर्ष की इस संघर्ष यात्रा के बाद ऋण लेकर 35 एकड़ जमीन में 72 मकान बनाये। इस बार हमें करोड़ों रूपये का लाभ हुआ। इसके बाद तो ईश्वर की कृपा हम पर लगातार बढ़ती गई। बिजली के हीटर और कार्यालयों के फर्नीचर्स आदि के व्यवसाय में भी हमें भारी सफलता मिलती गई। मेरे साथ मेरे परिवार के निरन्तर संघर्ष जुनून और महत्वाकांक्षाओं के कारण हमने जिस व्यवसाय में प्रवेश किया, सफलता हमें अपने आगोश में लेती रही। तीस बर्ष के पूर्व की याद करने पर रोमांच-सा लगता हैं। आज सब-कुछ बड़ों के सम्मान, आशीर्वाद, ईमानदारी, ईश्वर के प्रति अगाध आस्था और जरूरतमंदों को सहायता करने की प्रतिफल-स्वरूप ही प्राप्त हुआ हैं।
आज इस सफलता के अकल्पनीय शिखर पर पहुंच कर आप संतुष्ठ है या किसी अन्य महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की तैयारी में हैं?
सच तो यह है कि इतना सब कुछ होते प्राप्त कर लेने के बाद मानसिक शांति से हाथ धो बैठें हैं, परन्तु फिर भी उपलब्धियों से संतुष्ठ नहीं हूं और यह शायद व्यक्तिगत मेरी राय नहीं बल्कि मानवीय कमजोरी हैं अभी-भी यह तय हैं कि मै ईश्वर की आस्था के सहारे और आगे बढ़ना चाहता हूं आगे और आगे, बहुत आगे।
श्री वर्मा का स्थाई पता - बेतूलबाजार बेतूल म प्र टेली - 07141 - 268233





















