| 05 अक्टूबर 2009
13 अप्रेल 1944 को जन्में करसन भाई पटेल ने अकेले ही हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को प्रबल चुनौती दी और देश भर में साबुन की टिकिया के बजाय डिटर्जेंट का फैशन चला दिया। करसन भाई ने छह साल तक सरकारी दफ्तर में प्रयोगशाला तकनीशियन का काम किया। रात को वे अपने घर के पिछवाड़े में डिटर्जेंट पाउडर बनाने के प्रयोग करते थे। 1969 में उन्होंने निरमा का उत्पादन शुरू किया। शुरूआती पूंजी एक हजार रूपए थी। जो उन्होंने मित्रों और रिश्तेदारों से उधार ली थी अगले तीन साल तक करसन भाई ऑफिस से आने के बाद देर रात तक डिटर्जेंट बनाते थे। रविवार को वे अपने डिटर्जेंट के पैकेट साइकल पर रखकर गली-गली घूमते थे। मंहगी टिकिया के बजाय सस्ता वाशिंग पाउउर खरीदने की इच्छुक गृहणियां उनके डिटर्जेंट को पंसद करने लगीं। 3 रूपए किलो का निरमा हाथों-हाथ बिकने लगा। करसन भाई निरमा को पसंद न आए तो पैसे वापस के आधार पर बेचते थे।
शुरूआती सफलता मिलने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और 1972 में अहमदाबाद के पास एक छोटे-से औद्योगिक शेड में निरमा का उत्पादन शुरू किया। फिर 1977 में रेडियो पर इसके विज्ञापन आने लगे। सिनेमाघरों में भी विज्ञापन की स्लाइडें दिखाई जाने लगी। इसके बाद टी.वी. पर विज्ञापन का दौर शुरू हुआ। पांच साल के भीतर निरमा देश भर में लोकप्रिय हो गया। करसन भाई कहतें हैं कि उन्होंने विजनेस या मैनेजमेंट के बारे में कभी कोई पुस्तक नहीं पढ़ी निरमा की सफलता उन्हीं की बुद्धि और लगन की देन हैं। करसन भाई पटेल की अभूतपूर्व सफलता की प्रशंसा करते हुए हिन्दुस्तान लीवर के एक शीर्ष एक्जीक्यूटिव ने एक बार कहा था उन्होंने पूरे देश की कपड़े धोने की आदतों को साबुन से डिटर्जेंट में बदल दिया।





















